02/06/2026
📢 ट्रेनिंग दी, काम भी लिया... फिर हमें मझधार में क्यों छोड़ दिया? सरकार से आपदा मित्रों का सीधा सवाल!
बिहार के आपदा मित्र आज एक ऐसी स्थिति में पहुंच चुके हैं जहां उनका हौसला तो बुलंद है, लेकिन जेब और घर के हालात पूरी तरह टूट चुके हैं। आपदा प्रबंधन विभाग (BSDMA और NDMA) के तहत प्रशिक्षित ये जांबाज हर विकट परिस्थिति (बाढ़, वज्रपात, अगलगी, सर्पदंश) में सबसे पहले जान जोखिम में डालकर खड़े होते हैं।
लेकिन आज सच्चाई क्या है?
🛑 हमारी जमीनी हकीकत और दर्द:
उम्र का आखिरी पड़ाव: कई आपदा मित्रों की उम्र 30 से 35 वर्ष पार कर रही है, भविष्य पूरी तरह अंधकार में है।
मजाक बनता अस्तित्व: त्योहारों (छठ पूजा, दुर्गा पूजा) और हादसों के वक्त चौबीसों घंटे ड्यूटी करने के बाद भी जब बच्चे एक अदद चॉकलेट मांगते हैं, तो उसे दिलाने की भी औकात नहीं बचती। समाज में हमें 'खतरों का खिलाड़ी' तो कहा जाता है, लेकिन बदले में खाली हाथ मिलते हैं।
सालों से बकाये का इंतजार: वैशाली और अन्य जिलों में 2023 से लगातार ड्यूटी ली गई, लेकिन आज तक एक भी पैसे का मानदेय या मेहनताना नहीं मिला।
📜 नीतीश बाबू की 'सात निश्चय योजना' के पन्नों में हमारा हक:
"मुख्यमंत्री सात निश्चय योजना की किताब के 33वें पन्ने पर साफ लिखा है कि प्रशिक्षित आपदा मित्रों को पंचायत और प्रखंड स्तर पर नियुक्त कर नियमित मानदेय और स्थायी सेवा दी जाए। फिर भी आज हम बेरोजगार की तरह भटक रहे हैं।"
🙏 माननीय मुख्यमंत्री जी और उप-मुख्यमंत्री (सम्राट चौधरी जी) से विनम्र निवेदन:
हम आपके ही सिस्टम का हिस्सा हैं। जब मानसून के बाद बाढ़ और जलजमाव की विभीषिका आएगी, तब सबसे पहले इन्हीं लाल कपड़ों वाले आपदा मित्रों को याद किया जाएगा।
हमारी सिर्फ इतनी मांग है:
नियमित रोजगार और निश्चित मानदेय की नियमावली को तुरंत धरातल पर लाया जाए।
हमें राज्य कर्मी का दर्जा देकर हमारे परिवारों को भुखमरी और इस आत्मसम्मान की लड़ाई से मुक्ति दिलाई जाए।
"विपत्ति के समय जो आपकी जान बचाते हैं, आज वे खुद अपने हक और दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं। कृपया हमारी आवाज सुनिए!"