01/03/2018
आइये, आज बिहार चलते हैं। बिहार कांग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी थे। थे यानि??? मर नहीं गए हैं! अभी ज़िंदा हैं और अपने निजी स्वार्थ की राजनीति कर रहे हैं। बेशक, जमीर उनका मर चुका है। यूँ कहें कि खुद्दारी और जमीर वगैरह उनका सदा से मरा ही हुआ था। ऐसे तो राजनीति अक्सर स्वार्थगत ही होती है मगर कुछ लोग दलगत आस्था भी रखते हैं। उनके लिए स्वार्थ का उतना महत्व नहीं होता।
तो कुछ लोग स्वार्थपरायण होते हैं, कुछ की दलगत हठधर्मिता होती है और कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनकी कोई विशेष राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं होती लेकिन वे किसी दल या व्यक्ति के वैचारिक समर्थक होते हैं। मैं भी खुद को इसी अंतिम श्रेणी में पाता हूँ। कोई राजनैतिक अभीप्सा नहीं है मेरी और न ही कभी किसी दल इत्यादि का सदस्य रहा हूँ। मैं कोई कांग्रेसी नहीं हूँ लेकिन कांग्रेसी विचारधारा का प्रशंसक अवश्य हूँ और ऐसा होने मात्र से मैं कहीं न कहीं खुद को कांग्रेस के वैचारिक संरक्षक मंडल में पाता हूँ। इस प्रकार मेरे कुछ कर्तव्य निर्धारित हो जाते हैं। बेमतलब की चापलूसी से सहज ही कोई रिश्ता नहीं बन पाता।
इस प्रकार कांग्रेस को क्षतिग्रस्त करने वाले तत्वों का घोर विरोध करना मेरा दायित्व बन गया था। बिहार का हूँ, तो शुरुआत बिहार कांग्रेस से... अशोक चौधरी का विरोध बिहार कांग्रेस का सबसे बड़ा हित है, ऐसा मेरा मानना रहा था। आज वे कांग्रेस छोड़ रहे हैं तो अब कांग्रेस के स्वास्थ्य पर उनकी बुराईयों का कोई असर नहीं पड़ने वाला। वे अब चली हुई कारतूस की तरह व्यर्थ हो गए हैं।
जगन्नाथ मिश्रा के बाद से बिहार में कांग्रेस क्रमशः मरी है। बिहार में मोदी के आघातों से पीड़ित जनता के उमड़ते कांग्रेस प्रेम को अशोक चौधरी ने जहाँ तक संभव हुआ, कम किया। विशेषकर जदयू और कमोबेश राजद को उन्होंने कांग्रेस की अपेक्षा अधिक सींचा। अध्यक्ष पद के सर्वथा अयोग्य अशोक चौधरी आज कांग्रेस छोड़कर जा रहे हैं। मेरा उनसे विनम्र आग्रह है कि बिहार कांग्रेस में उन्होंने बहुत कूड़ा-कबाड़ इकट्ठा किया है, बहुत चोर उचक्कों को सदाकत आश्रम में कुर्सियों पर और दीवारों पर चिपका दिया है, तो उस कचरे को भी स्वच्छ भारत अभियान के तहत अपने ही साथ बटोरकर ले जाएं। हमारे जैसे कांग्रेस समर्थक उनकी इस विशेष कृपा से अतिशय अनुगृहीत होंगे।
© मणिभूषण सिंह Manibhushan Singh