02/03/2021
मैं नारी, बीते कुछ दिनों में समाज की विकृत मानसिकता का उदाहरण साक्षात् मेरे समक्ष रहा, मै चाहकर भी अपनी आवाज बुलंद ना कर पाई , अंततः मुझे बोध हुआ कि मैं अपने शब्दों को अपने कलम की ताकत दे अपने विचार समाज के समक्ष रख सकती हूँ, अतः मैं अपनी कलम से अपने व्यक्तिगत विचारों को पंक्तिबद्ध कर समाज के समक्ष रख रही हूँ एवं समाज के विचार जानने के लिए उत्सुक रहूँगी
"नारी का सम्मान, उसका अधिकार है या पुरुष समाज द्वारा भिक्षाटन"
सम्मान शब्द अपने आप में सम्पूर्ण शब्दकोश धारण किए हुए है।
प्रश्न है आखिर सम्मान है क्या?
सम्मान प्रतिष्ठा है, मान है, आबरू, इज्ज़त, गौरव, आदर, तुलना, सत्यकार, अदब,ध्यान रखना, साधुवाद, वाहवाही, सतीत्व, स्तृति, प्रशंसा, जय-जयकार, अभिनंदन, कद्रकरना, महत्त्व प्रदान एवं पगड़ी भी है।
हमारे सभ्य समाज में नारी को यह सब कब और कैसे मिलेगा।
"सम्मान एक अमूर्त अवधारणा है जो योग्यता और प्रतिष्ठा का आवेश है"
वेदों में, ग्रंथों में, संविधान में नारी एवं उसके सम्मान के बारे में बहुत कुछ कहा और सुना जाता है। मंच से, कलम से भी नारी एवं उसके सम्मान पर अनगिनत सभायें, संगोष्ठीयां आयोजित होती आई है और होती रहेंगी। आज़ादी के 74 साल बाद भी नारी की स्थिति जस की तस बनी है, कहने को हम इक्किसवीं सदी में जी रहे हैं पर खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि मानसिकता में कोई उत्थान नजर नहीं आता।
नारी आज अपने बल बूते एवं संघर्ष की बदौलत आसमां की नई उंचाई छू रही है, कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां हमारी उपस्थिति दर्ज नहीं है।
मगर क्या पुरुष प्रधान समाज स्वयं के समकक्ष नारी को ग्रहण कर पाया है? चाहे वह कार्यक्षेत्र हो या अन्य क्षेत्र, समाज उस पर कटाक्ष करने से नहीं चुकता।
आज भी स्त्री के अवतरण से लेकर उसकी मृत्युशय्या तक उसके प्रत्येक क्षण पर उसका अधिकार ना के बराबर है। वह जन्म लेगी या नहीं यह तक निश्चित नहीं होता वरन् अगर वह नीयती को मात दे, इस संसार में अवतरित हो भी जाती है तो आज भी वह क्या पहनेगी,क्या खाएगी, किस से बात करेगी, कैसे चलेगी, क्या पढ़ेगी , कहाँ पढ़ेगी, कैसा जीवन साथी होगा आदि...इस प्रकार के अनेक महत्वपूर्ण पलों का निर्णय में उसका अपना मत ना के बराबर होता है। जन्म से नारी के जीवन से संबंधित निर्णय पर उसके स्वयं के अलावा उसके परिवार का, समाज एवं राष्ट्र का योगदान उससे ज्यादा रहता है। कुछ परिवारों में (जो अपवाद है) नारी को स्वयं से संबंधित प्रश्न में निर्णय का अधिकार है परन्तु वहां भी समाज के कर्णधार और ठेकेदार उत्पन्न हो जाते है यह बताने के लिए की नारी के लिए समाज में अमुक चीजें सही हैं एवं अमुक गलत ।
नारी को समानता देने के प्रश्न पर इनके विचार कुछ यूं होते हैं- "नारी को समानता देने के साथ सुरक्षा की जवाबदेही और जिम्मेदारी पुरुष समाज पर है"
मेरा प्रश्न है कि यह जिम्मेदारी किसने दी पुरुष समाज को? पुरुष समाज स्वयं ही अपना महामंडलेश्वर गान कर लेता है । उसने कभी जानने की कोशिश की कि एक नारी के स्वयं के क्या विचार है?
और रही सुरक्षा का प्रश्न तो नारी अवश्य जानना चाहेगी कि सुरक्षा किस से? समाज में व्याप्त कुंठित एवं घृणित मानसिकता से ग्रसित पुरुष समाज से ही ना। नारियों का अपमान, तिरस्कार, शारीरिक व मानसिक बलात्कार, उनको जलाने, दहेज के लिए कष्ट देने,उनको भोग की वस्तु समझने आदि जैसे कुंठित विचार पुरुष समाज की ही देन है। कार्य क्षेत्र में या समाज में नारी का व्यवहार कैसा होगा, इसका निर्णय भी समाज स्वयं लेना चाहता है। नारी अपने विचार, हल्के-फुल्के अनुभव मुस्कुरा के अपने कार्य क्षेत्र या समाज के कुछ मंच पर व्यक्त करती है तो यही कर्णधार नारी पर कटाक्ष एवं असंवैधानिक टिप्पणी करने से नहीं चुकते।
एक प्रश्न जो अक्सर प्रत्येक नारी को कचोटता है वह यह है कि क्या इस सभ्य समाज में कभी नारी के लिए बनी सोच में बदलाव आ पाएगा?
पुरुष-स्त्री को समान अधिकार होते हुए भी लिंगभेद के आधार पर पुरुषों का अपने आपको श्रेष्ठ समझना न केवल गलत बल्कि असंवैधानिक है। कोई भी विभाजन क्षमताओं एवं गुणों के आधार पर किया जाए वही बेहतर , न्यायिक एवं संवैधानिक होता है। इसके लिए सबसे पहले बदलना होगा हमें स्वयं को। जिस दिन नारी खुद को बदलेगी उस दिन बदलाव आएगा।
नारी की दयनीय एवं जटिल परस्थितियों की जिम्मेदार, मैं स्वयं नारी को ही मानती हूंँ क्योंकि वो नारी ही है जो अपने स्वाभिमान की लड़ाई स्वयं ना लड़ अपने लिए सहारा खोजती है वह भी पुरुष के रूप में, जीवन में हमें कोई परेशानी, समस्या, विपत्ति आती है तो हम अपने पिता, पती, पुत्र, भाई या अपने पुरुष सहकर्मी के पास दौड़ कर जाते हैं आखिर क्यों?
या तो हम अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने में सक्षम नहीं है या हमें अपने भीतर व्याप्त असीम नारी शक्ति का बोध या यूं कहें की विश्वास नहीं है। जिस दिन नारी अपने भीतर की असीम नारी शक्ति का बोध कर लेगी एवं अपने निर्णय स्वयं लेने लगेगी एवं किसी पुरुष पर आश्रित ना हो कर अपने सही एवं गलत की जिम्मेदार खुद को मान लेगी उस दिन निश्चित बदलाव आयेगा।
एक नारी की गलती पर जब दूसरी नारी खड़ी होगी उस दिन बदलाव आएगा। शिक्षा और स्वावलम्बन की जागरूकता जितनी जरूरी है उससे कहीं अधिक जरूरत मानसिक उत्कर्ष को बढ़ावा देने की है। हमारे सभ्य समाज में कुछ वर्षों में नारी उत्पीड़न चाहें वह शारीरिक अथवा मानसिक का आंकड़ा हर पल बढ़ा है मगर क्यों ? प्रत्येक पल एवं दिन नारी के मन का, अस्तित्व का, विचार का, शब्दों का, उसकी भावनाओं का शोषण होता है।
नारी के उत्थान में सबसे बड़ी बाधा स्वयं नारी ही बनी हुई है । जब नारी ही नारी के प्रति संवेदनशील नहीं होगी तो नारी उत्थान कैसे संभव होगा। उसे समानता का अधिकार कैसे मिलेगा? नारी समाज के उत्थान का तात्पर्य है उसे उसके प्रति निरंकुशता,क्रूरता, अमानवीय व्यवहार से मुक्ति मिले, लिंग भेद से छुटकारा मिले उसे एवं उसके विचारों को समुचित सम्मान मिले । नारी उत्थान का अर्थ यह कदापि नहीं है कि समाज नारी प्रधान हो जाय और नारी समाज, पुरुषों का शोषण करने लगे या प्रताड़ित करने लगे ।
समाज में नारी को यथोचित स्थान दिलाने के लिए स्वयं महिलाओं को ऐसी बातों पर ध्यान देना होगा और वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास करना होगा ।
आजादी के 74 सालों के पश्चात क्या आज भी नारी सुरक्षित हो पायी है? क्या नारी को आज भी खेलने की वस्तु या छेड़ने का सामान नहीं समझा जाता? उसे उपभोग की चीज मान कर विज्ञापनों में प्रदर्शित नहीं किया जाता? समारोह में आगंतुकों के आदर सत्कार के लिए महिला को ही क्यो ? समाज हमें प्रत्येक क्षेत्र में विफल साबित करने में प्रयत्नशील रहेगा, परन्तु हमारा मजबूत मनोबल हमें हारने से रोकता है और हमें निरंतर आगे बढ़ने को प्रेरित करता है।
नारी को नारी के समर्थन, संबल व आश्वासन की जरूरत है। एक नारी पर अन्याय के समय उसी क्षण एक की जगह दस नारियां एकता के परचम में नज़र आएंगी तो अन्याय के बढ़ते हाथ खुद-ब-खुद पीछे हट जाएंगे। एकता की अखण्ड शक्ति ही हर नारी की आत्मशक्ति बन जाएगी।
आज की नारी अपने कर्तव्यों को गृहकार्यो की इतिश्री ही नहीं समझती है, अपितु अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति भी सजग है। स्वयं के प्रति सचेत होते हुए अपने अधिकारों के प्रति आवाज़ उठाने में सक्षम है। कोई सिर्फ यह कहकर हमारे आत्मविश्वास को नहीं हिला सकता कि वह एक नारी है।
नारी का सम्मान उसका अधिकार है जिसे नारी को एकजुट हो अर्जित करना पड़ेगा ना कि पुरूष समाज द्वारा प्राप्त भिक्षाटन।