07/07/2021
शहीद पीर अली खां... 1857 क्रांति का योद्धा, जिससे खौफ खाते थे अंग्रेज
पीर अली खां के बारे में जो सबसे चौंकाने वाली बात पता चली वो ये कि अंग्रेजी हुकूमत उनसे इतना खौफ खाती थी कि उन्हें गिरफ्तार करने के दो दिन के अंदर बिना कोई मुकदमा चलाए उन्हें सरेआम फांसी दे दी गई.
शहीद पीर अली खां... 1857 क्रांति का योद्धा, जिससे खौफ खाते थे अंग्रेज
1857 की क्रांति ने देश की आजादी के रास्ते खोल दिए थे. हजारों लोग तब भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने की जंग में कूद पड़े थे. इतिहास की किताबों में आज भी ऐसे नायकों की शौर्य गाथा मौजूद है, लेकिन उस लड़ाई के कुछ ऐसे हीरो भी थे, जिनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिखा गया.आज हम ऐसे ही एक जांबाज सिपाही की कहानी लाए है। आजादी के दीवाने इस नायक का नाम शहीद पीर अली खां था.
महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, मंगल पांडे और पीर अली खां. आजादी के सिपाहियों की फेहरिस्त में एक नाम सुनकर आप चौंक गए होंगे क्योंकि ये वो क्रांतिकारी हैं, जिनका जिक्र इतिहास की किताबों में भी नहीं मिलता. देश के लिए उनकी कुर्बानी, उनकी शौर्यगाथा वक्त के पन्नों में कहीं खोकर रह गए हैं नाम है शहीद पीर अली खां.
बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से सटा एक छोटा सा पार्क, शहर से हवाई अड्डे को जोड़ने वाली एक सड़क और पटना का एक मोहल्ला. इन सभी जगहों पर शहीद पीर अली खां का नाम दर्ज है. लेकिन इस पार्क के सामने से, या फिर इन सड़कों से हर रोज गुजरने वाले ज्यादातर लोग इस नाम से अनजान हैं. जो लोग ये जानते हैं कि पीर अली खां आजादी की लड़ाई के सिपाही थे, वो भी इस बात से बेखबर हैं कि आखिर पीर अली ने आजादी की किस लड़ाई में हिस्सा लिया था.
1857 से शुरू हुआ स्वतंत्रता संग्राम 1947 तक चला, लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ किसी जंग में पीर अली खां का नाम नहीं मिलता. आखिर क्यों। इसी का जवाब तलास करने की हमने कोसिस की है।
इतिहास का ग़ुमनाम योद्धा: शहीद पीर अली खां
पीर अली खां का जन्म 1820 में आजमगढ़ के एक गांव मोहम्मदपुर में हुआ था. किशोरावस्था में वो घर से भागकर पटना आ गए थे. पटना के जमींदार नवाब मीर अब्दुल्ला ने उनकी परवरिश की और पढ़ाया-लिखाया. बड़े होने पर नवाब साहब की मदद से उन्होंने किताबों की एक दुकान खोल ली. आगे चलकर वही दुकान बिहार के क्रांतिकारियों के जमावड़े का अहम ठिकाना बन गया. क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आने के बाद पीर अली खां दुकान पर क्रांतिकारी साहित्य मंगाकर रखने लगे.
पीर अली ने अंग्रेजों की गुलामी से देश को आज़ाद कराने की मुहिम में अपने हिस्से का योगदान देना अपने जीवन का मकसद बना लिया. उनका मानना था कि गुलामी की जिंदगी से मौत बेहतर होती. समय के साथ उनका दिल्ली और अन्य स्थानों के क्रांतिकारियों के साथ संपर्क में आए. दिल्ली के प्रमुख क्रांतिकारियों में एक अजीमुल्लाह खान उनके आदर्श थे, जिनके सुझाव और दिशा निर्देश पर वो चलने लगे.
पटना गांधी संग्रहालय के अध्यक्ष रजी अहमद के मुताबिक 1857 की क्रांति के वक्त पीर अली खां घूम-घूमकर लोगों में आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए जागरूक करने लगे. 3 जुलाई 1857... ये वो तारीख है जब पीर अली ने आजादी के आंदोलन को धार देते हुए अंग्रेज हुकूमत को सीधी चुनौती दी, और उसकी गूंज इंग्लैंड तक महसूस की गई.
तब पीर अली की अगुवाई में कई टुकड़ियों में बंटकर इन हथियारबंद युवाओं ने पटना के गुलजार बाग में अंग्रेजों के एक प्रशासनिक भवन को चारों तरफ से घेर लिया. यह वही भवन था जहां से प्रदेश के लोगों की क्रांतिकारी गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी और उनपर कार्रवाई की रूपरेखा तैयार होती थी.
वहां तत्कालीन कमिश्नर विलियम टेलर ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलवाईं. कई क्रांतिकारी मौके पर ही शहीद हो गए. लेकिन पीर अली खां और कुछ क्रांतिकारी वहां से बच निकलने में कामयाब हो गए.
लेकिन 5 जुलाई 1857 को पीर अली को 14 साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. पीर अली पर बगावत का आरोप लगाकर उन्हें यातनाएं दी गईं.
7 जुलाई 1857 को पीर अली को उनके कई साथियों के साथ फांसी पर लटका दिया गया. अंग्रेज अधिकारी पीर अली से उनके सभी साथियों के नाम जानना चाहते थे, लेकिन पीर अली ने देश से गद्दारी करने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा.
फांसी के फंदे पर झूलने के पहले पीर अली के आखिरी शब्द थे 'तुम हमें फांसी पर लटका सकते हो, लेकिन हमारे आदर्श की हत्या नहीं कर सकते. मैं मरूँगा तो मेरे खून से लाखों बहादुर पैदा होंगे जो एक न एक दिन तुम्हारे ज़ुल्म का खात्मा कर देंगे.'
देश की आजादी के लिए शहीद होने वाले पीर अली खां ने क्रांति की ऐसी अलख जगाई जो अगले सौ सालों तक धधकती रही. उनकी कुर्बानी क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा बन गई और उनकी कहानी मौजूदा पीढ़ी के लिए भी देशभक्ति का नायाब सबक