24/06/2026
**जातीय राजनीति और हमारा समाज**
आज के समय में जातीय राजनीति हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है। लोकतंत्र में राजनीति का मुख्य उद्देश्य विकास, समानता और जन-कल्याण होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से वोट बैंक के समीकरणों ने जाति को राजनीति का एक प्रमुख हथियार बना दिया है। चुनाव आते ही नीतियों और विकास कार्यों के बजाय जातियों के आधार पर टिकट बांटे जाते हैं और समाज का ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया जाता है।
इस जातीय राजनीति का हमारे समाज पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है:
* **सामाजिक बिखराव:** यह राजनीति समाज को जोड़ने के बजाय उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटती है। इससे आपसी भाईचारा, सामाजिक समरसता और एकता कमजोर होती है।
* **विकास में बाधा:** जब योग्यता और समस्याओं के बजाय जाति को प्राथमिकता दी जाती है, तो वास्तविक मुद्दे जैसे—शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचा—पीछे छूट जाते हैं।
* **युवाओं की सोच पर असर:** समाज का भविष्य कहे जाने वाले युवाओं में भी अक्सर जातीय चेतना रचनात्मक सोच पर हावी होने लगती है, जो देश की प्रगति के लिए सही नहीं है।
# # # सुधार की राह
एक स्वस्थ और जागरूक समाज के निर्माण के लिए इस चक्रव्यूह से बाहर निकलना अनिवार्य है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे:
> **बदलाव का संकल्प:** हमें जातिगत पहचान से ऊपर उठकर 'नागरिक कर्तव्य' और 'योग्यता' को तरजीह देनी होगी।
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* **जागरूकता:** जनता को नेताओं के खोखले वादों और जातिगत कार्ड को पहचानना होगा।
* **मुद्दों पर आधारित चयन:** मतदान का आधार प्रत्याशी की जाति नहीं, बल्कि उसका चरित्र, शिक्षा और समाज के प्रति उसकी जवाबदेही होनी चाहिए।
**निष्कर्ष:**
हमारा समाज तभी सशक्त और समृद्ध बन सकता है, जब हम संकीर्ण जातीय दीवारों को तोड़कर एक होकर सोचेंगे। देश का विकास और सामाजिक समरसता किसी एक जाति के उत्थान में नहीं, बल्कि 'सबका साथ, सबका विकास' की भावना में निहित है।