सर्व जागरण मंच

सर्व जागरण मंच The director of S.M Public School Naubatpur Patna

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20/08/2026

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  morning wishes
20/08/2026

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26/06/2026

बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में जून 2026 में हुए सामाजिक कार्यकर्ता भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में पुलिस की भूमिका अत्यंत विवादास्पद और संदिग्ध मानी जा रही है। एक तरफ जहां पुलिस इसे 'आत्मरक्षा में की गई जवाबी कार्रवाई' बता रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय जनता, सोशल मीडिया साक्ष्य और पीड़ित परिवार इसे 'फर्जी मुठभेड़' यानी एक सोची-समझी हत्या करार दे रहे हैं।
पुलिस की कार्यप्रणाली पर संदेह गहराने के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
* **आत्मसमर्पण बनाम एनकाउंटर:** घटना से ठीक पहले के वीडियो और चश्मदीदों के अनुसार, भरत तिवारी ने पुलिस के सामने अपनी पिस्टल फेंक दी थी और सरेंडर करने के लिए तैयार थे। इसके बावजूद उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गईं, जो पुलिस की मंशा पर गंभीर सवाल उठाती हैं।
* **मानसिक स्थिति की अनदेखी:** मृतक के पिता (जो खुद एक सेवानिवृत्त सिपाही हैं) का दावा है कि उन्होंने पुलिस को भरत की मानसिक स्थिति ठीक न होने की सूचना दी थी। ऐसे में पुलिस का काम उन्हें हिरासत में लेकर इलाज के लिए भेजना था, न कि जान लेना।
* **आवाज दबाने का आरोप:** भरत तिवारी स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास और प्रशासनिक ढुलमुल रवैये के खिलाफ मुखर रहते थे। फेसबुक लाइव के जरिए वे लगातार व्यवस्था पर सवाल उठा रहे थे। आशंका जताई जा रही है कि इसी मुखरता के कारण उन्हें रास्ते से हटाया गया।
इस मामले में चौतरफा दबाव के बाद पुलिस मुख्यालय ने सख्त कदम उठाते हुए जगदीशपुर के डीएसपी और शाहपुर के थानाध्यक्ष सहित दोषी पुलिसकर्मियों पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर उन्हें निलंबित कर दिया है। वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा उच्च स्तरीय न्यायिक जांच और सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई जांच की मांग इस बात का प्रमाण है कि प्रथम दृष्टया पुलिस की भूमिका बेहद संदेहास्पद रही है, जिसने खाकी की साख पर एक बड़ा दाग लगाया है।

24/06/2026

**जातीय राजनीति और हमारा समाज**
आज के समय में जातीय राजनीति हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है। लोकतंत्र में राजनीति का मुख्य उद्देश्य विकास, समानता और जन-कल्याण होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से वोट बैंक के समीकरणों ने जाति को राजनीति का एक प्रमुख हथियार बना दिया है। चुनाव आते ही नीतियों और विकास कार्यों के बजाय जातियों के आधार पर टिकट बांटे जाते हैं और समाज का ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया जाता है।
इस जातीय राजनीति का हमारे समाज पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है:
* **सामाजिक बिखराव:** यह राजनीति समाज को जोड़ने के बजाय उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटती है। इससे आपसी भाईचारा, सामाजिक समरसता और एकता कमजोर होती है।
* **विकास में बाधा:** जब योग्यता और समस्याओं के बजाय जाति को प्राथमिकता दी जाती है, तो वास्तविक मुद्दे जैसे—शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचा—पीछे छूट जाते हैं।
* **युवाओं की सोच पर असर:** समाज का भविष्य कहे जाने वाले युवाओं में भी अक्सर जातीय चेतना रचनात्मक सोच पर हावी होने लगती है, जो देश की प्रगति के लिए सही नहीं है।
# # # सुधार की राह
एक स्वस्थ और जागरूक समाज के निर्माण के लिए इस चक्रव्यूह से बाहर निकलना अनिवार्य है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे:
> **बदलाव का संकल्प:** हमें जातिगत पहचान से ऊपर उठकर 'नागरिक कर्तव्य' और 'योग्यता' को तरजीह देनी होगी।
>
* **जागरूकता:** जनता को नेताओं के खोखले वादों और जातिगत कार्ड को पहचानना होगा।
* **मुद्दों पर आधारित चयन:** मतदान का आधार प्रत्याशी की जाति नहीं, बल्कि उसका चरित्र, शिक्षा और समाज के प्रति उसकी जवाबदेही होनी चाहिए।
**निष्कर्ष:**
हमारा समाज तभी सशक्त और समृद्ध बन सकता है, जब हम संकीर्ण जातीय दीवारों को तोड़कर एक होकर सोचेंगे। देश का विकास और सामाजिक समरसता किसी एक जाति के उत्थान में नहीं, बल्कि 'सबका साथ, सबका विकास' की भावना में निहित है।

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23/06/2026

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