18/11/2025
हॉस्पिटल के शुरुआती दिनों में मैंने देखी अपने करियर की पहली मौत।
चालीस साल का वह हृष्ट-पुष्ट आदमी,
जो अब बर्फ से भी ज्यादा ठंडा हो चुका था।
और सामने दहाड़ मारकर रोती
उसकी माँ, उसकी पत्नी और उसके बच्चे।
उन्हें रोता देख मेरी आँखों से भी दो बूँद आँसू निकले।
सोचा, उन्हें दिलासा दूँ, चुप करा दूँ!
पर शायद, कभी-कभी रोते इंसान को चुप नहीं कराना चाहिए।
मैंने अपने सीनियर डॉक्टरों को बुलाया,
शायद वे कोई चमत्कार कर दें,
जैसा फिल्मों में होता है।
उन्होंने समझाया—
"इतना पैनिक मत करो, मौत हमारे जीवन का हिस्सा है।
हम भगवान नहीं हैं, हम सबको नहीं बचा सकते!"
पूरे दिन मैं सोचता रहा—
हम सबको क्यों नहीं बचा सकते?
उस रात मुझे नींद नहीं आई,
मेरा बिस्तर भी बहुत ठंडा लगा।
और आँखों के सामने वही आदमी नाचता रहा।
लगा, शायद मैं कुछ और कर पाता, तो वह बच सकता था!
मेरा करियर आगे बढ़ा, मैंने कई मौतें देखीं,
और धीरे-धीरे मेरी आँखों के आँसू सूखने लगे।
धीरे-धीरे मौत मुझे जीवन का हिस्सा लगने लगी।
एक दिन, अत्यधिक भीड़ में,
मेरे मुँह से निकला—
"देखो, अगर कोई मरीज डी कर गया हो तो हटा दो,
मरीज बहुत हैं, बेड खाली कराओ!"
धीरे-धीरे मैं वह डॉक्टर बनता गया,
जो मैं कभी बनना नहीं चाहता था।
रोते-बिलखते लोगों को देखकर भी सामान्य रहने लगा।
कई बार CPR देकर उन्हीं हाथों से नाश्ता किया।
धीरे-धीरे मैं पत्थर होता गया...
और अंत में—
न भगवान बन पाया,
न इंसान बचा रहा।