21/02/2024
🌹 *मन का स्वभाव बड़ा ही चंचल है जैसे कि कोई बंदर । बंदर एक डाली से दूसरी डाली पर कूदता रहता है। अपने इसी स्वभाव के कारण ही मन विचलित रहता है ।*
हमारे छः मुख्य शत्रु हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद्य एवं मत्सर ।
जब तक हम स्वयं को इनसे शुद्ध नहीं कर पायेंगे तब तक हमें वास्तविक शांति की प्राप्ति नहीं हो पायेगी ।
और इनसे शुद्धि किसी यान्त्रिक पद्धति द्वारा नहीं मिलेगी ।
भगवान् का आश्रय लेकर हम इनसे छुटकारा पर सकते हैं ।
और इस कलियुग में भगवान् का आश्रय लेकर इनसे स्वयं को शुद्ध करने का सबसे सरल एवं प्रभावशाली *उपाय भगवान् के नामों का कीर्तन ही है ।*
कलेर्दोषनिधे राजन्न अिस्त हि एको महान् गुणः ।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परम व्रजेत ।। *(श्रीमद्भागवतम् १२.३.५१)*
यद्यपि कलियुग दोषों का सागर है किन्तु इसका एक महान् गुण यह है कि केवल भगवान् के नामों का कीर्तन करने से व्यक्ति को परम आनंद की अनुभूति हो सकती है ।
*भगवान् के नामों का कीर्तन करने से हमारी वासनाए तो समाप्त होती ही हैं साथ–साथ हम भगवान् के प्रति अपने भूले हुए प्रेममय सम्बन्ध को भी पुनः जागृत कर लेते हैं ।* और भगवान् के साथ उस प्रेममय सम्बन्ध में ही वह परमसुख है जिसकी खाेज में हम इस भौतिक जगत् में जन्म से मृत्यु तक अनेक विफल प्रयास करते रहते हैं ।
इस लिए सदा जपें👇
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*हरे कृष्ण हरे कृष्ण*
*कृष्ण कृष्ण हरे हरे*
*हरे राम हरे राम*
*राम राम हरे हरे*
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