19/03/2026
कुछ फैसले सैलरी देखकर नहीं, सोच और संस्कार देखकर लिए जाते हैं।
वरुण गुप्ता ने भी ऐसा ही एक साहसिक और ज़मीन से जुड़ा फैसला लिया।
लाखों के पैकेज वाली नौकरी और बड़े शहरों की चकाचौंध भरी ज़िंदगी छोड़कर वरुण अपने कस्बे पालिया लौटे। उनकी माता जी श्रीमती लक्ष्मी गुप्ता आंटी जी पहले से ही पूरी मेहनत और समर्पण के साथ काम कर रही थीं, और वरुण उनके साथ एक helping hand बनकर खड़ा हुआ — सीखते हुए, समझते हुए और जिम्मेदारी निभाते हुए।
वरुण आज का युवा है — M.Tech जैसी उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त, लेकिन सोच से पूरी तरह ज़मीन से जुड़ा हुआ।
वो सीख भी रहा है और काम करके आगे बढ़ने में विश्वास रखता है।
पालिया का इतिहास रहा है कि यहाँ अक्सर बाहर से आए लोगों को आगे बढ़ाया गया, जबकि स्थानीय नेतृत्व को वह समर्थन नहीं मिला जिसका वह हक़दार था। अब समय है कि राजनीति से जुड़े लोग और समाज, लोकल लीडरशिप को पहचानें और उसे मज़बूती दें।
एक समय था जब नगर पालिका परिषद में विकास के काम लगभग ठप थे। उस दौर में नगर के विकास के लिए ठोस और ज़मीनी कार्य वरुण के पिता, स्वर्गीय के.बी. गुप्ता अंकल जी, ने किए। आज उसी सोच और उसी विरासत को वरुण आगे ले जाने का प्रयास कर रहा है।
कहा जाता है कि राजनीति में युवाओं के आने से राजनीति, काम करने की नीति बन जाती है।
और वरुण जैसे युवाओं से यही उम्मीद की जाती है।
मैं उम्मीद करता हूँ कि पालिया के युवा वरुण को समझेंगे, उस पर भरोसा करेंगे और उसे आगे बढ़ने में पूरा समर्थन देंगे।
क्योंकि जब पढ़ा-लिखा, ज़मीन से जुड़ा युवा आगे आता है,
तो बदलाव सिर्फ़ नज़र नहीं आता — महसूस भी होता है। 🙏