14/02/2025
#कोरोना_महामारी के समय
महासंकट में यही ज़रूरी है।
पद्म पुराण में एक कथा आती है। लीलावती नामक एक गणिका को शिवकृपा से दान की इच्छा हुई। उसने अपनी सारी संपत्ति से ख़ूब धनदान किया और अन्नदान किया। उसके दो नौकर थे उन्हें भी अपनी मालकिन से देखकर बड़ी प्रेरणा हुई लेकिन उनके पास था ही क्या दान को! सो उन्होंने रसोई में श्रमदान का निर्णय किया जिसके लिए उन्होंने कोई पारिश्रमिक नहीं लेने का फैसला किया। वह दानकार्य इतना महत्वपूर्ण रहा कि स्वयं वशिष्ठ जी दान स्वीकारने को आए। दोनों नौकर सोचते थे कि उनकी मालकिन ने जितने भी पापकर्म किए होंगे उनसे वह मुक्त हुई और स्वर्ग में उच्च स्थान प्राप्त करेगी। वे इसी संतुष्टि के साथ श्रमदान करते रहे।
मरने के बाद गणिका और दोनों सेवक भी स्वर्ग पहुँचे। गणिका की अगवानी को तो देवताओं के सामान्य सेवक आये पर उन दोनों के स्वागत के लिए देवताओं ने देवपुत्रों को भेजा। वे स्वयं चकित थे। वशिष्ठ ने उन्हें उनके दान का महात्म्य समझाया और बताया कि चूंकि उन्होंने अन्नदान में सेवा दी थी इसलिए उनका पुण्य उनकी मालकिन से अधिक है। वशिष्ठ जी ने विभिन्न दान के महत्वों की तुलना यज्ञों से की है और अन्नदान को पुष्कर यज्ञ जैसा बताया है।
देश अभी महामारी से जूझ रहा है। रोज़ कमाकर खाने वालों या भिखारियों के लिए पेट पालने का संकट है। नवरात्र शुरू हो रहे। ज़्यादातर लोग व्रत-पूजा आदि करते हैं। लेकिन वर्तमान स्थिति में बाहर निकलना सम्भव नहीं तो घर में उपलब्ध सामग्री से ही पूजा करनी है। याद रखिये भाव महत्वपूर्ण है, कर्मकांड नहीं। यदि सेहत ज़रा सी भी गड़बड़ लगती हो तो व्रत न करें क्योंकि शरीर की रोग निरोधी क्षमता, इम्युनिटी मजबूत रखनी है। उसके लिए अन्न का पोषण चाहिए। तो क्यों न आप हर दिन 1,5 या 10 या जितने सम्भव हों उतने वंचित परिवारों के पेट भरने का प्रबंध कर दें। उनकी प्राण रक्षा करें। इसका फल किसी भी व्रत से कहीं ज़्यादा होगा।
देश-काल-परिस्थिति, सनातन में नियमों में बदलाव की पूर्ण अनुमति देते हैं। इसलिए तो सनातन एक आदर्श जीवन जीने की कला है। ज़रा सा भी लगता हो कि शरीर कमजोर है तो कृपया व्रत की जगह दूसरे किसी व्यक्ति की जीवनरक्षा में हाथ बंटा दें, वही बेहतर है।
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#राजूसिंह_लोटोती