History of Mewat with Altaf Hussain

History of Mewat with Altaf Hussain Dr. Altaf Hussain
This page is created to explore the rich history of Mewat!
यह पेज मेवात के समृद्ध इतिहास को जानने के लिए बनाया गया है। आइए यात्रा शुरू करें.
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Meo! Mewati! History! Mewati Zindabad!

03/06/2026

1970 का मेवात — जब सादगी ही शान थी और मशक्कत ही ज़िंदगी...

इन तस्वीरों को गौर से देखिए...मिट्टी के कच्चे घर, फूस की छतें, सिर पर पानी की मटकी, चेहरे पर हया, और पैरों में चप्पल तक नहीं।

यह वह दौर था जब मेवात की ख़वातीन कई-कई कोस नंगे पाँव चलकर पानी लाना, घर-परिवार संभालना, पशुओं की देखभाल करना और खेतों में हाथ बँटाना उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी थी। उनकी सादगी में बनावट नहीं थी, उनकी मेहनत में दिखावा नहीं था। घूँघट उनका लिबास था, हया उनका ज़ेवर था और मशक्कत उनकी पहचान। ढीला-कुर्ता, सलवार, चादर और घूँघट सिर्फ़ कपड़े नहीं थे, बल्कि मेवाती संस्कृति, शराफ़त और पहचान के प्रतीक थे।

आज की पीढ़ी शायद कल्पना भी न कर सके कि जिन पैरों में चप्पल नहीं थी, उन्हीं पैरों ने आने वाली नस्लों के लिए बेहतर ज़िंदगी की राह बनाई। ये तस्वीरें सिर्फ़ लोगों की नहीं, बल्कि सब्र, क़ुर्बानी और मेवात की असली रूह की तस्वीरें हैं।

आज जब दुनिया तेज़ी से बदल रही है, तो ये तस्वीरें हमें याद दिलाती हैं कि हमारी जड़ें सादगी में थीं, हमारी ताक़त मेहनत में थी और हमारी पहचान अपनी तहज़ीब में थी।
यह तस्वीरें सिर्फ़ अतीत नहीं, बल्कि मेवात की रूह हैं। 🌾🤍

02/06/2026

मेवात की एक पुरानी बारात...

यह तस्वीर सिर्फ़ एक बारात की नहीं, बल्कि उस मेवात की है जो आज धीरे-धीरे यादों, किस्सों और पुरानी तस्वीरों में सिमटता जा रहा है।

इन बैलगाड़ियों को गौर से देखिए... इनमें सिर्फ़ बाराती नहीं बैठे हैं, बल्कि एक पूरा दौर बैठा है — वह दौर जब साधन कम थे, मगर दिल बड़े थे; जेबें हल्की थीं, मगर रिश्ते बेहद गहरे थे; गरीबी थी, मगर गैरत, अपनापन और मेहमाननवाज़ी बेमिसाल थी।

खेतों की पगडंडियों, कच्चे रास्तों और धूल भरे सफ़रों से गुज़रती यह बारात कई-कई कोस तय करके दुल्हन के गाँव पहुँचती थी। रास्ते में बैलों की घंटियाँ बजती थीं, मेवाती गीत गूंजते थे और हँसी-मज़ाक का ऐसा सिलसिला चलता था कि सफ़र कब कट जाता, पता ही नहीं चलता था। किसी को जल्दी नहीं होती थी, क्योंकि उस ज़माने में सफ़र भी रिश्तों का हिस्सा होता था।

और जब बारात दुल्हन के गाँव पहुँचती, तो कुछ घंटों के लिए नहीं, बल्कि पूरे तीन दिन ठहरती थी। तीन दिन तक चौपालें आबाद रहती थीं, गीत गाए जाते थे, पुराने रिश्ते ताज़ा होते थे, नई दोस्तियाँ बनती थीं। बाराती मेहमान नहीं, घर के अपने लोग बन जाते थे। बच्चे पूरे गाँव में घुल-मिल जाते थे और बुज़ुर्ग देर रात तक बैठकर यादों और रिश्तों की बातें करते थे। वह सिर्फ़ शादी नहीं होती थी, बल्कि दो ख़ानदानों, दो गाँवों और सैकड़ों दिलों का मिलन होता था।

आज गाड़ियाँ तेज़ हो गई हैं, सड़कें चौड़ी हो गई हैं और सफ़र कुछ घंटों का रह गया है। मगर कभी-कभी लगता है कि इस तेज़ रफ़्तार में रिश्तों की वह गर्माहट कहीं पीछे छूट गई है।

ज़रा सोचिए...

इस तस्वीर में दिखाई देने वाले कई चेहरे आज इस दुनिया में नहीं हैं। वे बैल नहीं रहे, वे गाड़ियाँ नहीं रहीं, वे कच्चे रास्ते नहीं रहे, शायद वे खेत भी पहले जैसे नहीं रहे...मगर उनकी यादें आज भी इस तस्वीर में ज़िंदा हैं।

यह तस्वीर हमें याद दिलाती है कि तरक्की ज़रूरी है, मगर अपनी जड़ों को याद रखना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। हम बहुत आगे निकल आए हैं, लेकिन शायद अपने सबसे ख़ूबसूरत दिन पीछे छोड़ आए हैं। 🌾🐂❤️

आज भी जब ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, तो लगता है जैसे पुराना मेवात हमें पुकारकर कह रहा हो— "रिवायतों को मत भूलो, क्योंकि कौमें अपनी ज़मीन और अपनी यादों से ही ज़िंदा रहती हैं।"

जब मेवात की बारातें बैलगाड़ियों पर चला करती थीं, तब रास्ते लंबे हुआ करते थे, मगर दिलों के फ़ासले बहुत छोटे होते थे। तीन दिन की बारात सिर्फ़ एक शादी नहीं, बल्कि मोहब्बत, मेल-मिलाप और रिश्तों के उत्सव का नाम थी।
An Old Wedding Procession from Mewat...
This photograph is not just of a wedding procession; it is a glimpse of the old Mewat that is slowly fading into memories, stories, and old photographs.

Look closely at these bullock carts. They are not carrying only wedding guests; they are carrying an entire era — a time when people had fewer resources but bigger hearts, lighter pockets but deeper relationships. There was poverty, but there was also dignity, hospitality, and a strong sense of belonging.

Traveling through dusty village paths and fields, this wedding procession would cover many miles to reach the bride’s village. Along the way, the bells of the bullocks would ring, Mewati folk songs would echo, and laughter would fill the journey. No one was in a hurry, because in those days, the journey itself was a part of the celebration.

And when the procession reached the bride’s village, it did not stay for just a few hours—it stayed for three whole days. For three days, village courtyards were full of life. Songs were sung, old relationships were renewed, and new friendships were formed. The guests were not treated as outsiders; they became part of the family. Children mixed freely with everyone, while elders spent long evenings sharing stories and memories. It was not just a wedding; it was the coming together of two families, two villages, and hundreds of hearts.

Today, vehicles are faster, roads are wider, and journeys take only a few hours. Yet sometimes it feels as if the warmth of relationships has been left behind in this fast-moving world.

Just think...

Many of the people seen in this photograph are no longer with us. The bullocks are gone, the carts are gone, the dirt roads have disappeared, and even the fields may no longer look the same. But their memories are still alive in this picture.

This photograph reminds us that progress is important, but remembering our roots is even more important. We have moved far ahead, but perhaps we have left some of our most beautiful days behind.

🌾🐂❤️

Even today, when we see a photograph like this, it feels as if old Mewat is calling out to us:

“Never forget your traditions, because communities stay alive through their land, their memories, and their heritage.”

When Mewat’s wedding processions traveled on bullock carts, the roads were long, but the distance between hearts was very small.

A three-day wedding procession was not just a marriage ceremony—it was a celebration of love, togetherness, friendship, and the true spirit of Mewat. ❤️🌾🐂
🎤 Mewati Baba
Copyright...History of Mewat with Altaf Hussain

'दलबदलू' – लार्ड सन्नू मवाती की नज़र मेंमेवात की मिट्टी हमेशा से बेबाक शायरों और लोककवियों की धरती रही है। यहाँ के शायर ...
02/06/2026

'दलबदलू' – लार्ड सन्नू मवाती की नज़र में

मेवात की मिट्टी हमेशा से बेबाक शायरों और लोककवियों की धरती रही है। यहाँ के शायर सिर्फ़ इश्क़ और मोहब्बत की बातें नहीं करते, बल्कि समाज और सियासत की सच्चाइयों को भी खुलकर बयान करते हैं। ऐसे ही लोकशायर थे लार्ड सन्नू मवाती, जिन्होंने 1990 के दशक में मेवात की सियासत में बढ़ते दलबदल और मौक़ापरस्ती पर यह तीखी और मशहूर कविता लिखी।

उस दौर में कई नेता अपनी सियासी फ़ायदे के लिए पार्टियाँ बदल रहे थे। जनता जिन पर भरोसा करके वोट देती थी, वही लोग सत्ता और कुर्सी के लिए अपना रास्ता बदल लेते थे। लार्ड सन्नू ने ऐसे नेताओं को सीधे-सीधे "दलबदलू" और "नमक हराम" कहा। उनकी नज़र में जो नेता अपने उसूल, अपने वादे और अपनी अवाम को छोड़ देता है, वह किसी भरोसे के काबिल नहीं रहता।

दलबदलू

हाथी घोडा अर गधा दिल्ली जै पर जाँय।
सब मंडी में जा बिकें जै कोई दाम लगाय।।

दलबदलू कम जात हैं निकलें नमक हराम।
कोण जितावे जंग में, आय किनके काम।।

कुछ तो ऐसा भेजियों जो लें राज चलाय।
बंध घोड़ा की पूंछ के, घणा गधा रिढ़ जाय।।

टट्टी में पैसो पड़ो, मुंह सू लेय उठाय।
दलबदलू कमजात हैं, तनक नहीं सरमाय।।

दो दिन तो इज्जत मिले, दलबदलू को खूब।
तीजे दिन धक्का पड़े सब दल जावें ऊब।।

दलबदलू के पड़े हैं दोनूं घां सू लात।
जैसे धोबी को गधो घरे रहे ना घाट।।

जनता सू धोको करें जा होवें नीलाम।
दलबदलू कमजात हैं, निकले नमक हराम।।

टांग खीचणा में सदा लगा रहें दिन रात।
इन के लेखे भाड़ में जावे सब मेवात।।

दो नेता मेवात का तय्यब अर खुरसेद।
इन सू कोई काम की मत करियो उम्मेद।।

गुन्नीस सो पिच्चाणवे और छियाणवे साथ।
बेमारी अर बाढ़ ने तभा करी मेवात।।

भारत देश महान में आयो ऐसो राज।
सेब और अंगूर सू मंहगी होगी प्याज।।

दलबदलू धोको करे जो जाके बिक जाए।
'सन्नू' हांडी काठ की एक बेर चढ़ पाय।।

*********लार्ड सन्नू************"

लार्ड सन्नू कहते हैं कि सियासत कोई मंडी नहीं होनी चाहिए जहाँ लोग अपनी क़ीमत लगवाकर बिक जाएँ। लेकिन जब नेता अपने ज़ाती फ़ायदे, कुर्सी या ताक़त के लिए पार्टी बदलते हैं, तो वह जनता के भरोसे का सौदा करते हैं। लार्ड सन्नू का मानना है कि ऐसे लोगों को कुछ दिनों तक इज़्ज़त और पद मिल सकता है, लेकिन आख़िर में न पुरानी पार्टी उन पर भरोसा करती है और न नई पार्टी। इसी लिए वे लिखते हैं—
"दलबदलू के पड़े हैं दोनूं घां सू लात,
जैसे धोबी को गधो घरे रहे ना घाट।"

यानी ऐसा आदमी आख़िर में कहीं का नहीं रहता। कविता में सन्नू साहब बार-बार मेवात का ज़िक्र करते हैं, क्योंकि उन्हें फ़िक्र थी कि जब नेता सिर्फ़ अपनी सियासत चमकाने में लगे रहेंगे, तो मेवात की तरक़्क़ी, तालीम, रोज़गार और अवाम के मसले पीछे छूट जाएँगे लार्ड सन्नू का सबसे बड़ा पैग़ाम यह है कि वोट सिर्फ़ पार्टी को नहीं, बल्कि किरदार को देना चाहिए। जो शख़्स आज एक झंडे के नीचे है और कल दूसरे झंडे के नीचे सिर्फ़ अपने फ़ायदे के लिए पहुँच जाए, उस पर अवाम को सोच-समझकर भरोसा करना चाहिए।

मेवात के बहुत से लोगों को लगता है कि हाल के वर्षों में कुछ बड़े मेवाती नेताओं और विधायकों के दल बदलने के बाद लार्ड सन्नू की यह कविता फिर ज़िंदा हो उठी है। 1990 के दशक में जिस सियासी मौक़ापरस्ती और दलबदल पर सन्नू ने तंज़ किया था, वही बहस आज भी सुनाई देती है। लोगों के ज़हन में उनकी पंक्तियाँ गूंजती हैं—
"जनता सू धोको करें जा होवें नीलाम,
दलबदलू कमजात हैं, निकले नमक हराम।।"

मेवात की अवाम का एक बड़ा तबका मानता है कि नेता किसी भी पार्टी में जाए, लेकिन उसे अपने वोटरों के भरोसे, अपने वादों और अपने इलाक़े के हितों के साथ वफ़ादार रहना चाहिए। लार्ड सन्नू की यह नज़्म आज भी यही याद दिलाती है कि सियासत में सबसे बड़ी दौलत कुर्सी नहीं, बल्कि जनता का एतमाद होता है।

मेवात की लोक-शायरी में यह कविता सिर्फ़ एक तंज़ नहीं, बल्कि अवाम की आवाज़, उनकी नाराज़गी और सियासी शऊर का एक ज़िंदा दस्तावेज़ है।"जनता सू धोको करें जा होवें नीलाम..." शायद यही मिसरा पूरी कविता का ख़ुलासा है। लार्ड सन्नू के मुताबिक़, सबसे बड़ा जुर्म पार्टी बदलना नहीं, बल्कि अवाम के भरोसे को बेच देना है।
Sources: Meo Darpan

01/06/2026

आजकल लोग ग़रीबी से कम, फ़िक्र से ज़्यादा टूट रहे हैं..." 💔🌿

मेवाती बुजुर्ग और शायर ने बहुत गहरी बात कही है—
"फिकर सू फाको भलो, फिकर फकीरी खाय
जैसे आलो ऊपला सिलग सिलग रह जाय!"

इस दोहे में ज़िंदगी का बड़ा सबक छुपा हुआ है।

बुजुर्ग कहते थे कि फ़िक्र से तो फाका बेहतर है। क्योंकि भूख इंसान को कुछ वक़्त तक तकलीफ़ देती है, लेकिन फ़िक्र इंसान को हर रोज़, हर पल अंदर ही अंदर खाती रहती है। मेवाती बुजुर्ग कहते थे कि फिक्र अच्छे-अच्छे फ़क़ीरों, दरवेशों और मज़बूत इंसानों को भी कमज़ोर कर देती है। जिस तरह गीला ऊपला आग में पड़कर एकदम नहीं जलता, बल्कि देर तक सुलगता रहता है, धुआँ देता रहता है और धीरे-धीरे ख़त्म हो जाता है, उसी तरह फ़िक्र भी इंसान के दिल, दिमाग़ और सुकून को धीरे-धीरे खा जाती है।

मेवात के बुजुर्ग समझाते थे कि— रिज़्क़ की कमी उतना नहीं थकाती, जितना फ़िक्र थका देती है। ग़रीबी उतना नहीं तोड़ती, जितना बेवजह की फिक्र तोड़ देती है।
याद रखिए.......इंसान की सबसे बड़ी दौलत माल नहीं, सुकून है।
और इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन ग़रीबी नहीं, बेवजह की फ़िक्र है।
मेहनत कीजिए, कोशिश कीजिए, दुआ कीजिए, मगर फ़िक्र में अपनी ज़िंदगी मत जलाइए।
क्योंकि...
फ़िक्र करने से मसले हल नहीं होते,
लेकिन सुकून ज़रूर छिन जाता है।
🌿 फाका पेट को खाता है, मगर फ़िक्र पूरे इंसान को खा जाती है।

नोट: इस रील में दिखाई गई तस्वीरें दो अलग-अलग बुजुर्ग की हैं, जिन्हें केवल मेवाती पहनावे, संस्कृति और परंपराओं के प्रतिनिधित्व के उद्देश्य से शामिल किया गया है। इन तस्वीरों के माध्यम से किसी प्रकार की पारिवारिक, व्यक्तिगत या पहचान संबंधी समानता दर्शाने का उद्देश्य नहीं है।



"

30/05/2026

मेवात की शाम — जहाँ खेतों के ऊपर चाँद उगता है, और वक़्त ठहर सा जाता है। 🌙🌾✨
Mewat after sunset — where the moon rises over the fields, and time stands still. 🌙🌾🎬✨”
🎤Mukkadar Kotiya❤️
❤️🥀💫🤟

30/05/2026

शाम ढल रही थी...
अरावली की चोटियाँ ख़ामोशी से सूरज को विदा कर रही थीं,
और मेवात सुनहरी रौशनी की चादर ओढ़े किसी फ़िल्मी मंज़र सा लग रहा था। 🌅✨

कुदरत जब अपनी सबसे ख़ूबसूरत तस्वीर बनाती है,
तो उसका कैनवास अक्सर मेवात होता है। ❤️
🎤rajeshbansal_1
❤️🥀💫🤟

29/05/2026

दादा शाह चोखा: मेवात की रूहानी और ऐतिहासिक विरासत

दादा शाह चोखा, जिन्हें हज़रत सैय्यद अकबर अली शाह चोखा रहमतुल्लाह अलैह के नाम से भी जाना जाता है, मेवात के सबसे मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्गों में से एक हैं। उनकी दरगाह हरियाणा के नूंह (पूर्व मेवात) ज़िले में फ़िरोज़पुर झिरका-पुन्हाना मार्ग पर स्थित शाह चोखा गाँव की अरावली पहाड़ियों पर बनी हुई है। यह दरगाह मेवात की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और रूहानी विरासतों में गिनी जाती है।

स्थानीय रिवायतों के अनुसार, दादा शाह चोखा का असली नाम अबुल फ़तह सैय्यद अहमद बिन मुहम्मद ख़ुरासानी था। उनका जन्म लगभग 1530 ईस्वी में ख़ुरासान में हुआ माना जाता है। उनके पिता सैय्यद मुहम्मद एक प्रतिष्ठित आलिम और क़ाज़ी थे। बाद में दादा शाह चोखा प्रसिद्ध सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन नरनौली के मुरीद बने और उनके प्रमुख ख़लीफ़ाओं में शामिल हुए।

लगभग 1564 ईस्वी में अपने पीर की इजाज़त से वे मेवात आए और वर्तमान शाह चोखा गाँव की पहाड़ियों पर अपनी ख़ानक़ाह स्थापित की। धीरे-धीरे यह ख़ानक़ाह मेवात में रूहानियत, इल्म, इंसानियत और ख़िदमत का एक बड़ा मरकज़ बन गई। दूर-दूर से लोग यहाँ दुआ, सलाह और रूहानी मार्गदर्शन के लिए आने लगे।

दादा शाह चोखा से जुड़ी कई लोक-रिवायतें मुग़ल बादशाह अकबर के दौर से भी संबंधित हैं। माना जाता है कि उनकी शोहरत अकबर तक पहुँची थी और उनकी ख़ानक़ाह को शाही सरपरस्ती भी प्राप्त हुई। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, ख़ानक़ाह के रख-रखाव के लिए ज़मीन भी प्रदान की गई थी।

शाह चोखा की दरगाह का परिसर मुग़लकालीन स्थापत्य कला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। पहाड़ी की चोटी पर बने इस विशाल परिसर में मक़बरा, मस्जिद, हुजरे, बावली, मेहमानख़ाने और उनके ख़ुलफ़ा व मुरीदों की अनेक मजारें मौजूद हैं। यह पूरा परिसर इस बात की गवाही देता है कि कभी यह स्थान मेवात का एक प्रमुख धार्मिक और सामाजिक केन्द्र रहा होगा।

कई सदियों तक यहाँ जमादी-उल-अव्वल के महीने में भव्य उर्स आयोजित होता था। मेवात, राजस्थान और आसपास के इलाक़ों से हज़ारों ज़ायरीन और अकीदतमंद यहाँ पहुँचते थे। यह उर्स केवल धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि मेवात की लोक-संस्कृति, सामाजिक मेल-जोल और साझा विरासत का भी बड़ा केन्द्र था।

दादा शाह चोखा आज भी मेवात की लोक-स्मृति में विशेष स्थान रखते हैं। उनके बारे में अनेक लोककथाएँ, रिवायतें और करामातें प्रचलित हैं, जो लोगों की अकीदत और मोहब्बत को दर्शाती हैं। मेवात के कई इलाक़ों में आज भी किसी शुभ कार्य की शुरुआत पर बुज़ुर्गों की ज़ुबान से यह जुमला सुनने को मिल जाता है—

"या अल्लाह, या दादा चोखा।"

यह केवल एक पुकार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक है। चार सौ से अधिक वर्षों के बाद भी दादा शाह चोखा मेवात की रूहानी, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का एक अहम हिस्सा बने हुए हैं। उनकी दरगाह आज भी मेवात की सूफ़ी परंपरा, साझा संस्कृति और गौरवशाली विरासत की एक जीवंत निशानी है।
उनकी प्रशंसा में एक प्रसिद्ध मेवाती दोहा आज भी सुनाया जाता है:
"चिश्त घराने औलिया कायम दुरुस्त ईमान,
आठों थांबे रोशनी, शाह चोखा बड़े मकान।"

Dada Shah Chokha: The Spiritual Heart of Mewat

Nestled atop the Aravalli hills on the Firozpur Jhirka–Punhana road in present-day Nuh (Mewat), Haryana, the shrine of Hazrat Syed Akbar Ali Shah Chokha (Rahmatullah Alaih) stands as one of the most important symbols of Mewat's Sufi heritage.

According to local historical traditions, Shah Chokha's original name was Abul Fateh Syed Ahmad bin Muhammad Khurasani. Born in Khurasan around 1530 CE, he later became a disciple and leading khalifa of the renowned Sufi saint Hazrat Nizamuddin Narnauli. Around 1564 CE, he settled in the hills of present-day Shah Chokha village, where he established a Khanqah that gradually became a major centre of spirituality, learning, hospitality, and public service.

For centuries, Shah Chokha's influence extended far beyond the hills of Mewat. Local traditions associate him with the reign of the Mughal Emperor Akbar, who is believed to have recognized his spiritual authority and patronized the development of the Khanqah. The magnificent shrine complex, built in Mughal architectural style, includes a mausoleum, a mosque with three domes, guest chambers, residential quarters, a baoli (stepwell), and numerous graves of his disciples and successors.

The annual Urs of Shah Chokha, held during the first seven days of Jamadi-ul-Awwal, was once among the largest gatherings in Mewat. Thousands of devotees, travelers, and visitors from across Haryana, Rajasthan, and neighbouring regions would gather here, transforming the hilltop into a vibrant centre of faith, culture, and social interaction.

Shah Chokha occupies a unique place in the collective memory of the Meo community. Numerous oral traditions and miracle narratives are associated with his name, including stories of the "false moon," his blessings to local communities, and his reputation as a saint whose prayers brought hope and guidance to ordinary people.

Even today, in many parts of Mewat, older generations can still be heard beginning an important task with the words:

"Ya Allah, Ya Dada Chokha."

More than four centuries after his passing, Dada Shah Chokha remains not merely a Sufi saint, but a living symbol of Mewat's history, spirituality, folklore, and shared cultural heritage.

"Chisht Gharane Auliya Qaim Durust Iman,
Aathon Thanbe Roshni, Shah Chokha Bade Makan."

A name that still echoes through the hills, memories, and identity of Mewat.
دادا شاہ چوکھا: میوات کی روحانی دھڑکن

اراولی کی پہاڑیوں کی بلندیوں پر، فیروزپور جھِرکہ سے پُنہانہ جانے والی سڑک پر واقع حضرت سید اکبر علی شاہ چوکھا رحمۃ اللہ علیہ کا مزار میوات کی عظیم صوفیانہ وراثت کی ایک نمایاں علامت ہے۔

مقامی تاریخی روایات کے مطابق، دادا شاہ چوکھا کا اصل نام ابوالفتح سید احمد بن محمد خراسانی تھا۔ آپ کی ولادت تقریباً 1530ء میں خراسان میں ہوئی۔ بعد ازاں آپ مشہور صوفی بزرگ حضرت نظام الدین نارنولی کے مرید اور خلیفۂ اکبر بنے۔ تقریباً 1564ء میں آپ میوات کی ان پہاڑیوں میں تشریف لائے اور یہاں ایک خانقاہ قائم کی، جو وقت کے ساتھ روحانیت، علم، مہمان نوازی اور خدمتِ خلق کا اہم مرکز بن گئی۔

صدیوں تک شاہ چوکھا کا فیض صرف میوات تک محدود نہیں رہا بلکہ دور دور تک پھیلا۔ مقامی روایات انہیں مغل شہنشاہ اکبر کے عہد سے بھی جوڑتی ہیں، جس نے ان کی روحانی عظمت کو تسلیم کیا اور خانقاہ کی سرپرستی کی۔ پہاڑی کی چوٹی پر قائم یہ عظیم الشان کمپلیکس آج بھی مغلیہ طرزِ تعمیر کا خوبصورت نمونہ ہے، جس میں مزار، تین گنبدوں والی مسجد، حجرے، مہمان خانے، باولی اور ان کے خلفاء و مریدین کی متعدد قبریں شامل ہیں۔

ہر سال جمادی الاول کی پہلی سے ساتویں تاریخ تک یہاں عظیم الشان عرس منعقد ہوتا تھا، جس میں میوات، راجستھان، ہریانہ اور اطراف کے علاقوں سے ہزاروں زائرین اور عقیدت مند شریک ہوتے تھے۔ یہ صرف ایک مذہبی اجتماع نہیں بلکہ میوات کی ثقافتی اور سماجی زندگی کا بھی ایک اہم مرکز تھا۔

دادا شاہ چوکھا میو قوم کی اجتماعی یادداشت میں ایک منفرد مقام رکھتے ہیں۔ ان سے منسوب متعدد روایات، حکایات اور کرامات آج بھی عوام میں مقبول ہیں، جن میں "جھوٹے چاند" کا واقعہ اور عام لوگوں کے لیے ان کی دعاؤں اور برکتوں کے قصے شامل ہیں۔

آج بھی میوات کے بعض علاقوں میں بزرگ کسی نیک یا اہم کام کی ابتدا کرتے وقت یہ الفاظ ادا کرتے ہیں:

"یا اللہ، یا دادا چوکھا"

چار صدیوں سے زیادہ عرصہ گزر جانے کے باوجود دادا شاہ چوکھا صرف ایک صوفی بزرگ نہیں بلکہ میوات کی تاریخ، روحانیت، لوک روایات اور مشترکہ ثقافتی ورثے کی ایک زندہ علامت ہیں۔

"چشت گھرانے اولیا قائم درست ایمان،
آٹھوں تھانبے روشنی، شاہ چوکھا بڑے مکان"

ایک ایسا نام جو آج بھی میوات کی پہاڑیوں، یادوں اور شناخت میں گونجتا ہے۔

❤️🥀💫🤟

क्या आप जानते हैं कि नारनौल की कुछ ऐतिहासिक इमारतों पर सिर्फ तुगलक और मुग़लों की नहीं, बल्कि मेवातियों की भी अमिट छाप मौ...
28/05/2026

क्या आप जानते हैं कि नारनौल की कुछ ऐतिहासिक इमारतों पर सिर्फ तुगलक और मुग़लों की नहीं, बल्कि मेवातियों की भी अमिट छाप मौजूद है?
नारनौल सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि मेवात और उत्तर भारत की सदियों पुरानी साझी तहज़ीब, सियासत और विरासत का ज़िंदा दस्तावेज़ है। यह शहर कभी सूफ़ियों, फ़ौजी सरदारों, व्यापारिक काफ़िलों और सल्तनती सियासत का अहम मरकज़ रहा। लेकिन इतिहास के पन्नों में एक नाम अक्सर धुंधला कर दिया गया — आलम ख़ान मेवाती।

14वीं सदी में मेवाती सरदार आलम ख़ान मेवाती ने प्रसिद्ध शाह विलायत (पीर तुर्कमान) परिसर के पूर्वी स्तंभयुक्त हिस्से (कोलोनेड) और गुम्बद का निर्माण करवाया। यह निर्माण 760 हिजरी (1358–59 ई.) में हुआ था। इसकी पुरानी इमारत अपनी सादगी, रोबदार ख़ूबसूरती और मध्य पठान स्थापत्य शैली के लिए मशहूर मानी जाती है। इसकी वक्राकार ओजी मेहराबें आज भी उस दौर की शानदार फ़न-ए-तामीर की गवाही देती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि शाह विलायत परिसर में आज भी तुगलक, अफ़ग़ान और स्थानीय स्थापत्य का खूबसूरत संगम दिखाई देता है। इसकी मेहराबें और खामोश बरामदे जैसे सदियों पुरानी कहानियाँ अपने भीतर छिपाए बैठे हैं।

हम अक्सर मेवातियों को सिर्फ लड़ाइयों और प्रतिरोध की कहानियों से जोड़ते हैं, लेकिन मेवाती सिर्फ तलवार चलाने वाले नहीं थे — वे शहर बसाने वाले, इमारतें खड़ी करने वाले और अपनी विरासत छोड़ने वाले लोग भी थे।

शायद इतिहास के बहुत से पन्ने अभी भी खुलने बाकी हैं...मेवात की कहानी अभी बाकी है...

Did you know that some of Narnaul’s historic monuments carry not only the legacy of the Tughlaqs and Mughals, but also the enduring imprint of the Mewatis?

Narnaul is not just a city — it is a living document of the shared heritage of Mewat and North India. For centuries, it remained a center of Sufis, warriors, rulers, and important trade routes. Yet one name is often overlooked in mainstream history — Alam Khan Mewati.

The eastern colonnaded structure and the dome were constructed by Alam Khan Mewati in 760 Hijri (1358–59 CE). The older portion of the monument is renowned for its simplicity and grandeur, which are considered key characteristics of the Middle Pathan architectural style. Its arches are designed in the elegant ogee style, featuring distinctive double-curved forms.

Even today, the Shah Wilayat complex reflects a remarkable blend of Tughlaq, Afghan, and local architectural traditions. Its silent arches and old corridors still seem to preserve stories from centuries ago.

Mewatis are often remembered only through tales of resistance and battles. But the truth is — the Mewatis were not only warriors with swords; they were also builders of cities, creators of monuments, and keepers of a rich historical legacy.

Perhaps many pages of Mewat’s history are still waiting to be opened...

کیا آپ جانتے ہیں کہ نارنول کی بعض تاریخی عمارتوں پر صرف تغلقوں اور مغلوں ہی نہیں بلکہ میواتیوں کی بھی گہری چھاپ موجود ہے؟

نارنول صرف ایک شہر نہیں بلکہ میوات اور شمالی ہند کی مشترکہ تہذیبی وراثت کی زندہ داستان ہے۔ صدیوں تک یہ شہر صوفیوں، جنگجوؤں، حکمرانوں اور تجارتی راستوں کا اہم مرکز رہا۔ لیکن تاریخ کے صفحات میں ایک نام اکثر نظر انداز کر دیا جاتا ہے — عالم خان میواتی۔

چودھویں صدی میں میواتی سردار عالم خان میواتی نے مشہور شاہ ولایت (پیر ترکمان) کمپلیکس کے مشرقی حصے اور گنبد کی تعمیر کروائی۔ یہ صرف اینٹ اور پتھر نہیں تھے بلکہ میواتی طاقت، فنِ تعمیر اور شناخت کی علامت تھے۔

آج بھی شاہ ولایت کمپلیکس میں تغلق، افغانی اور مقامی طرزِ تعمیر کا حسین امتزاج دکھائی دیتا ہے۔ اس کی خاموش محرابیں اور پرانے برآمدے صدیوں پرانی کہانیاں اپنے اندر سموئے ہوئے محسوس ہوتے ہیں۔

ہم اکثر میواتیوں کو صرف مزاحمت اور جنگوں کی داستانوں سے جوڑتے ہیں، لیکن حقیقت یہ ہے کہ میواتی صرف تلوار چلانے والے لوگ نہیں تھے — وہ شہر بسانے والے، عمارتیں تعمیر کرنے والے اور اپنی تاریخ چھوڑ جانے والے لوگ بھی تھے۔

شاید تاریخ کے کئی اوراق ابھی کھلنا باقی ہیں...

ईद-उल-अज़हा की दिली मुबारकबाद! 🌙यह मुबारक मौक़ा हमें हज़रत इब्राहीम (अ.स.) की कुर्बानी, सब्र, रहमदिली और अल्लाह पर अटूट ...
28/05/2026

ईद-उल-अज़हा की दिली मुबारकबाद! 🌙
यह मुबारक मौक़ा हमें हज़रत इब्राहीम (अ.स.) की कुर्बानी, सब्र, रहमदिली और अल्लाह पर अटूट यक़ीन की याद दिलाता है।

दुआ है कि यह ईद हमें इंसानियत, इंसाफ़, हमदर्दी, भाईचारे, अमन, मोहब्बत और हमारी साझी तहज़ीब की क़द्र करने की तौफ़ीक़ दे।

अल्लाह तआला हमारी दुआओं और कुर्बानियों को क़ुबूल फ़रमाए और हर इंसान की ज़िंदगी को ख़ुशी, सुकून, मोहब्बत, इज़्ज़त और तरक़्क़ी से भर दे।
डॉ. अल्ताफ़ हुसैन
History of Mewat with Altaf Hussain

25/05/2026

कल तक एक छोटा बच्चा भपंग लेकर घर-घर आटा माँगता फिरता था…आज उसी कलाकार को भारत की राष्ट्रपति ने पद्मश्री से सम्मानित किया।

25 मई 2026 का दिन सिर्फ गफरुद्दीन मेवाती जोगी साहब का नहीं, बल्कि पूरी मेवात की तहज़ीब, लोक-संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत का दिन बन गया।

गफरुद्दीन मेवाती जोगी का सफर किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं है। राजस्थान के कैथवाड़ा से निकलकर एक छोटे से बच्चे ने सिर्फ़ 4 साल की उम्र में अपने वालिद के साथ भपंग उठाई। उस समय संगीत शोहरत का रास्ता नहीं था, बल्कि पेट भरने का सहारा था। वे घर-घर जाकर भपंग बजाते थे और बदले में लोग आटा देते थे। कई बार पेट भरता था, कई बार नहीं। लेकिन उस बच्चे ने सिर्फ़ भूख नहीं देखी, उसने अपनी मिट्टी की आवाज़ को मरते हुए भी देखा। जिस दौर में लोग आधुनिकता की तरफ़ भाग रहे थे, उस दौर में उन्होंने एक ऐसी कला को अपने सीने से लगाए रखा जिसे लोग भूल रहे थे — भपंग।

भपंग सिर्फ़ एक वाद्य यंत्र नहीं है; यह मेवात की धड़कन है। यह उन लोक कथाओं, वीरगाथाओं और सदियों पुरानी यादों की आवाज़ है जो किताबों में नहीं, लोगों के दिलों में ज़िंदा रहती हैं।

गफरुद्दीन साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी "पंडून का कड़ा" को ज़िंदा रखने में लगा दी — मेवात की वह महान लोक-महाभारत जिसे अब शायद बहुत कम लोग जानते हैं। कहा जाता है कि आज वे इसके आख़िरी बड़े जीवित गायकों में से हैं। उन्हें 2500 से ज़्यादा दोहे और लोक रचनाएँ याद हैं। उन्होंने 2800 से अधिक लोकगीतों और परंपराओं को अपनी आवाज़ में सँजोया। उन्होंने सिर्फ़ गीत नहीं गाए, उन्होंने एक पूरी सभ्यता को याद रखा।

उन्होंने इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, दुबई और दुनिया के कई देशों में मेवात की आवाज़ पहुँचाई। लेकिन दुनिया घूमने के बाद भी उनके हाथ से भपंग नहीं छूटी, क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ़ संगीत नहीं था — यह उनकी पहचान थी।

उन्होंने एक सरकारी नौकरी तक छोड़ दी, सिर्फ़ इसलिए कि कहीं यह कला दम न तोड़ दे। और शायद सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि उनकी कला हमेशा गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल रही — जहाँ महाभारत की कथाएँ, कृष्ण भजन, लोक दोहे और सूफ़ियाना रंग एक ही आवाज़ में सुनाई देते हैं।

आज जब राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री उनके गले में सजा, तो यह सिर्फ़ एक मेडल नहीं था.....यह उन दिनों का जवाब था जब एक कलाकार घर-घर आटा माँगता था। यह उन अनगिनत रातों का जवाब था जो उन्होंने अपनी कला को बचाने में बिताईं। यह उस संघर्ष की जीत थी जो अक्सर इतिहास की किताबों में नहीं लिखा जाता।
गफरुद्दीन मेवाती जोगी सिर्फ़ एक कलाकार नहीं हैं — वे मेवात की चलती-फिरती विरासत हैं। पूरी मेवात के लिए फ़ख़्र का लम्हा। ❤️

जिसने अपनी पूरी उम्र अपनी मिट्टी की आवाज़ बचाने में लगा दी, आख़िरकार पूरी दुनिया ने उसकी आवाज़ सुन ली।

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