हिन्दू राष्ट्र संघ

हिन्दू राष्ट्र संघ एक कदम सनातन की ओर (हिन्दू राष्ट्र की पुनः स्थापना की एक पहल)

आपकी क्या राय है भाइयों
10/04/2026

आपकी क्या राय है भाइयों

नोटबंदी हो तो कहा जाता है लोग लाइन में बेहोश हो गए। SIR लागू हो तो भी यही कहा जाता है कि लोग परेशान होकर गिर पड़े। गैस स...
14/03/2026

नोटबंदी हो तो कहा जाता है लोग लाइन में बेहोश हो गए। SIR लागू हो तो भी यही कहा जाता है कि लोग परेशान होकर गिर पड़े। गैस सिलेंडर लेने की लाइन की बात आती है तो भी बेहोश होने की कहानियाँ सामने आने लगती हैं। हर मुद्दे पर यही तस्वीर दिखाई जाती है कि लोग लाइन में खड़े-खड़े परेशान हो रहे हैं।

लेकिन एक सवाल अक्सर उठता है। जब हर महीने फ्री राशन लेने के लिए लंबी लाइन लगती है, तब शायद ही कभी सुनने को मिलता है कि लोग वहां बेहोश हो गए या हंगामा हुआ। लोग आराम से लाइन में लगते हैं, राशन लेते हैं और घर लौट जाते हैं।

यही वजह है कि कई लोग सवाल पूछते हैं कि क्या हर मुद्दे पर एक ही तरह का नैरेटिव बनाया जाता है? क्या कुछ घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है जबकि कुछ बातों पर बिल्कुल चर्चा नहीं होती?

आखिर ऐसा क्यों है कि कुछ लाइनों की तस्वीरें बार-बार दिखाई जाती हैं और कुछ लाइनों की चर्चा ही नहीं होती? यही सवाल आज कई लोगों के मन में है।

अस्वीकरण: यह पोस्ट सामाजिक चर्चा और सवाल के रूप में लिखी गई है।

आज तक आपने सुना होगा सामान्य वर्ग सामान्य वर्ग कभी आपने सोचा है सामान्य वर्ग कौन है तो आइये हम आपको दिखाते है #कौन_है_सा...
29/01/2026

आज तक आपने सुना होगा सामान्य वर्ग सामान्य वर्ग कभी आपने सोचा है सामान्य वर्ग कौन है तो आइये हम आपको दिखाते है

#कौन_है_सामान्यवर्ग ?

आओ बताता हूँ .... प्रधानमंत्री जी या मुख्यमंत्री जी ध्यान से सुनिएगा...

सामान्य वर्ग (General Category) कौन हैं ?
#सामान्य_वर्ग ( ब्राह्मण, भूमिहार, राजपुत (क्षत्रिय) लाला(कायस्थ) जैन, बनिया )

जिस व्यक्ति पर एट्रोसिटी_एक्ट 89 के तहत #बिना_जांच के भी कार्यवाई की जा सकती है, वो सामान्य वर्ग है

जिसको #जाति_सूचक शब्द इस्तेमाल करके #बेखौफ_गाली दी जा सकती है, वो सामान्य वर्ग है,

देश में आरक्षित 131 लोकसभा सीटो और 1225 विधानसभा सीटो पर #चुनाव नही लड़ सकता है, लेकिन #वोट दे सकता है, वो सामान्य वर्ग है,

जिसके #हित के लिए आज तक कोई आयोग नही बना, वो सामान्य वर्ग है,

जिसके लिए कोई #सरकारी_योजना न बनी हो,
वो सामान्य वर्ग है,

जिसके साथ देश का #संविधान_भेदभाव करता है, वो सामान्य वर्ग है,

मात्र जिसको सजा देने के लिए और का गठन किया गया वो सामान्य वर्ग है,

मात्र जिसे #सजा देने के लिए हर जिले में विशेष ्यायालय खोले गए हैं, वो अभागा सामान्य वर्ग है,

जो स्कूल में अन्य वर्गों के मुकाबले #चार_गुनी_फीस दे कर अपने बच्चों को पढाता है, वो बेसहारा सामान्य वर्ग है,

नौकरी, प्रमोशन, घर allotment आदि में जिसके साथ #कानूनन_भेदभाव वैध है वो बेचारा सामान्य वर्ग है,

सरकारों व सविधान द्वारा सबसे ज्यादा #प्रताड़ित किया जाने वाला वो सामान्य वर्ग है,
मे -40 बाला डाक्टर बनता है लेकिन +90 बाला फेल होता है वो सामान्य वर्ग है

सबसे ज्यादा वोट देकर भी खुद को #लुटापिटा ठगा सा महसूस करने वाला वो सामान्य वर्ग है

#सभाओं में फर्श तक बिछा कर एक अच्छी सरकार की चाह में आपको सत्ता सौंपने वाला वो सामान्य वर्ग है,

#देशहित मे आपका तन मन धन से साथ देने वाला वो सामान्य वर्ग है,

इतने भेदभाव के #बावजूद भी,
#धर्म की जय हो, #अधर्म का #नाश हो #प्राणियों में #सद्भावना हो,
#विश्व का #कल्याण हो की भावना जो रखता है,वो सामान्य वर्ग है,

#सबका साथ #सबका #विकास में हमारी स्थिती क्या है ? विचार अवश्य करें?

समस्त सामान्य वर्ग परिवारों की तरफ से भारत सरकार को समर्पित ...

अगर आपको उपरोक्त बातें सही लगी हो तो कम से कम शेयर जरुर करें ।
ये बात माननीय प्रधानमंत्री जी ,राष्ट्रपति जी व मुख्यमंत्री जी तक अवश्य पहुँचनी चाहिए....

🚩जय जय सियाराम🚩

क्या देश की राजनीति में अगला प्रधानमंत्री तय हो चुका है,या फिर किसी लोकप्रिय चेहरे का रथ जानबूझकर रास्ते में रोका जा रहा...
28/01/2026

क्या देश की राजनीति में अगला प्रधानमंत्री तय हो चुका है,
या फिर किसी लोकप्रिय चेहरे का रथ जानबूझकर रास्ते में रोका जा रहा है? अगर सच सामने आ गया, तो कई ‘खामोश’ चेहरे बेनकाब हो जाएंगे—इसलिए पूरा पढ़िए, कहानी अधूरी नहीं है…

देश की राजनीति इस वक्त किसी शतरंज की बिसात से कम नहीं लगती, जहाँ हर चाल सोच-समझकर चली जा रही है। एक तरफ़ 2029 की तैयारी है, दूसरी तरफ़ 2027 की ज़मीन सुलग रही है। चर्चा है कि अमित शाह को प्रधानमंत्री बनाने की रणनीति बुनी जा रही है और सत्ता का केंद्र एक बार फिर गुजरात को बनाए रखने की कोशिशें तेज़ हैं। लेकिन इसी बीच उत्तर प्रदेश से एक ऐसा चेहरा उभर कर सामने आया है, जिसे देश का बड़ा वर्ग अगला प्रधानमंत्री देखना चाहता है—योगी आदित्यनाथ।

यही बात शायद सबसे ज़्यादा चुभ रही है। योगी आदित्यनाथ आज केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्रीय राजनीति में सबसे लोकप्रिय और स्वीकार्य चेहरा बनते जा रहे हैं। जनता का रुझान, सोशल मीडिया का माहौल और ज़मीनी समर्थन—सब कुछ इशारा कर रहा है कि अगर मौका मिला तो देश की बागडोर योगी के हाथों में जा सकती है। और यहीं से राजनीति असहज हो जाती है।

इसी असहजता के बीच UGC बिल को लेकर बहस तेज़ होती है। ऊपर से देखने पर लगता है कि मामला किसी समाज या वर्ग का है, लेकिन भीतर झाँककर देखें तो तस्वीर कुछ और ही दिखती है। असली निशाना कोई जाति नहीं, बल्कि वह नेता है जिसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। 2027 के चुनाव सिर पर हैं और योगी आदित्यनाथ का कद हर दिन और ऊँचा होता जा रहा है।

डर शायद इस बात का है कि अगर योगी प्रधानमंत्री बने, तो उनकी प्राथमिकता उत्तर प्रदेश होगी। तब सत्ता और संसाधनों का संतुलन बदलेगा। गुजरात की वह केंद्रीय पकड़, जो वर्षों से बनी हुई है, कमजोर पड़ सकती है। तो सवाल उठता है—अगर सीधे रोक नहीं सकते, तो रास्ते में अड़चन कैसे डाली जाए? जवाब मिलता है—नीतियों, दबावों और मौन के ज़रिये।

योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी ताक़त ही उनकी सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। न कोई भ्रष्टाचार, न कोई आरोप, न कोई दाग। ऐसे में हमला सीधा नहीं हो सकता। मजबूरी पैदा की जाती है। राजनीति में कई बार बोल न पाना भी एक सज़ा होती है। संगठन, अनुशासन और सत्ता की सीमाएँ—इनके बीच नेता को चुप रहना पड़ता है, भले ही भीतर कितना ही असंतोष क्यों न हो।

इसी पृष्ठभूमि में प्रयागराज की घटना सामने आती है। माघ मेला, भारी भीड़ और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का रथ रोका जाना—प्रशासनिक दृष्टि से यह फैसला पूरी तरह जायज़ था। लेकिन इसके बाद जो माहौल बनाया गया, वो सवाल खड़े करता है। अचानक वही चेहरे समर्थन में दिखने लगते हैं, जो आम तौर पर हिंदू मुद्दों पर चुप रहते हैं। भाजपा के बड़े नेता मौन रहते हैं और तभी केशव प्रसाद मौर्य का बयान आता है—कि जो हुआ गलत हुआ, जांच होगी, दोषी बख्शे नहीं जाएंगे।

यह बयान सिर्फ़ बयान नहीं लगता, बल्कि संकेत देता है। और जब उसी क्रम में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी केशव प्रसाद मौर्य को अच्छा मुख्यमंत्री बताने लगते हैं, तो तस्वीर और साफ हो जाती है।

यह सब अचानक नहीं लगता, बल्कि एक क्रमबद्ध कहानी का हिस्सा नज़र आता है—जहाँ मोहरे धीरे-धीरे आगे बढ़ाए जा रहे हैं, बयान सोच-समझकर दिलवाए जा रहे हैं और माहौल इस तरह बनाया जा रहा है कि असली निशाना सामने न दिखे। प्रयागराज की घटना अब सिर्फ़ एक प्रशासनिक प्रसंग नहीं रह जाती, बल्कि सत्ता के भीतर चल रही खींचतान का प्रतीक बन जाती है। सवाल यही है कि ये घटनाएँ सच में अलग-अलग हैं या फिर उस शतरंज की बिसात का हिस्सा हैं, जहाँ अगला चाल देश की राजनीति की दिशा तय करने वाला है।

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