10/07/2021
#अब्राहम_लिंकन_चर्मकार (अपभ्रंश....चमार) थे,उनके पिता जी जूते बनाते थे,
जब वह #राष्ट्रपति चुने गये तो #अमेरिका के अभिजात्य वर्ग को बड़ी ठेस पहुँची!
सीनेट के समक्ष जब वह अपना #पहला_भाषण देने खड़े हुए तो एक #सीनेटर ने ऊँची आवाज़ में कहा, मिस्टर लिंकन याद रखो कि तुम्हारे पिता मेरे और मेरे परिवार के जूते बनाया करते थे! इसी के साथ #सीनेट_भद्दे_अट्टहास से गूँज उठी! लेकिन लिंकन किसी और ही मिट्टी के बने हुए थे!
लिंकन ने कहा कि, मुझे मालूम है कि मेरे पिता #जूते बनाते थे! सिर्फ आप के ही नहीं यहाँ बैठे कई माननीयों के जूते उन्होंने बनाये होंगे.! वह पूरे #मनोयोग से जूते बनाते थे, उनके बनाये जूतों में उनकी आत्मा बसती है! अपने काम के प्रति पूर्ण समर्पण के कारण उनके बनाये जूतों में कभी कोई शिकायत नहीं आयी! क्या आपको उनके काम से कोई शिकायत है.??उनका पुत्र होने के नाते मैं स्वयं भी जूते #बना_लेता हूँ और यदि आपको कोई शिकायत है तो,, मैं उनके बनाये जूतों की #मरम्मत कर देता हूँ.! मुझे अपने पिता और उनके काम पर गर्व है!
सीनेट में उनके ये #तर्कवादी भाषण से सन्नाटा छा गया और इस भाषण को अमेरिकी सीनेट के इतिहास में बहुत #बेहतरीन_भाषण माना गया है,, और उसी भाषण से एक #थ्योरी_निकली_Dignity_of_Labour
( #श्रम_का_महत्व) और इसका ये असर हुआ की जितने भी कामगार थे उन्होंने अपने #पेशे को अपना #सरनेम बना दिया जैसे कि - कोब्लर, शूमेंकर, बुचर, टेलर, स्मिथ, कारपेंटर, पॉटर आदि।
अमेरिका में आज भी, श्रम को महत्व दिया जाता है इसीलिए वो दुनिया की सबसे बड़ी #महाशक्ति है।
वहीं भारत में जो श्रम करता है उसका कोई सम्मान नहीं है,, वो छोटी जाति का है #नीच है। यहाँ जो बिलकुल भी श्रम नहीं करता वो #ऊंचा है।
जो यहाँ सफाई करता है, उसे #हेय (नीच) समझते हैं और जो गंदगी करता है उसे ऊँचा समझते हैं।
ऐसी गलत मानसिकता के साथ हम दुनिया के नंबर एक देश बनने का सपना सिर्फ देख सकते है, लेकिन उसे पूरा नहीं कर सकते। जब तक कि हम #श्रम को #सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेंगे। #जातिवाद और ऊँच नीच का #भेदभाव किसी भी #राष्ट्र_निर्माण के लिए बहुत बड़ी बाधा है।
** #कर्म_ही_प्रधान_है_यहि_संपूर्ण_और_अंतिम_सत्य_है.!