04/09/2018
*बेटियां निर्भय हों निर्भया नहीं*
सेलिना का रिजर्वेशन जिस बोगी में था, उसमें लगभग सभी लड़के ही थे ।शायद किसी केंप या किसी कंपनी के कार्य से जा रहे थे। टॉयलेट जाने के लिए सेलिना गई , तो देखा कि मुश्किल से चार या पांच औरतें होंगी पूरी बोगी में। अनजाने भय से काँपने सी लगी सेलिना । ये हमारे समाज में अकेली लड़की के हालात, पर दोषी कौन? प्रश्न अपने में पुरुष समाज की निचली मानसिकता पर करारा तमाचा है ।
खुद को सहज रखने के लिए चुपचाप अपनी सीट पर मोबाइल पर तो कभी किताबें तो कभी खिड़की से झाकने लगती थी सेलिना ।
उधर लड़के हँसी - मजाक , चुटकुले उसकी हिम्मत को और भी तोड़ रहे थे ।
सेलिना के भय और घबराहट रात के अंधेरे के साथ धीरे - धीरे बढ़ने लगे ।
सहसा सामने के सीट पर बैठे एक लड़के ने कहा --
" हेलो , मैं निरंजन हूं, वनारस जा रहा हूं और आप ? "
भय से गले को सुखा चुकी सेलिना ने कहा --" जी मैं ........."
"कोई बात नहीं , मत बताइये । वैसे कहाँ जा रहीं हैं आप ?"
सेलिना ने धीरे से कहा--"लखनऊ"
" लखनऊ... ?
वो तो मेरा बुआ का घर है। इस रिश्ते से तो आप मेरी बुआ जी की बेटी यानी बहन लगीं ।" खुश होते हुए निरंजन ने कहा ।और फिर लखनऊ की अनगिनत बातें चलती रहीं कि उसके फूफा जी काफी अच्छे व्यक्ति हैं , उसके दोनों फूफा के बेटे सेना के सिपाही हैं और ढेरों नई - पुरानी बातें ।
सेलिना धीरे - धीरे सामान्य हो गई और उसकी बातों में रूचि लेती रही ।
रात जैसे भय से आई थी , वैसे ही पवित्र भयमुक्त गुजर गई ।
सुबह सेलिना ने कहा - " लीजिये मेरा पता रख लीजिए , कभी बुआ जी के घर आइये तो जरुर मिलने आइयेगा ।"
" कौन सी बुआ बहन ? वो तो मैंने आपको डरते देखा तो झूठ - मूठ के रिश्ते गढ़ता रहा । मैं तो अनाथ हूं मेरा दुनियां में कोई नहीं ।"
"क्या..... ?" -- चौंक उठी सेलिना ।
" ऐसा नहीं है कि सभी लड़के बुरे ही होते हैं,
हम में से ही तो कल पिता और भाई भी होते हैं ।"
कह कर प्यार से उसके सर पर हाथ रख मुस्कुराकर चला गया निरंजन।
सेलिना निरंजन को देखती रही जैसे कि कोई अपना भाई उससे विदा ले रहा हो सेलिना की आँखें गीली हो चुकी थी
काश इस संसार मे सब की मानसिकता ऐसी ही हो जाये
न कोई अत्याचार ,न दुराचार ,भय मुक्त रहे समाज हमारा देश, हमारा शहर,हमारा गांव हमारी गली
जहाँ सभी बहन ,बेटियों,खुली हवा में सांस ले सकें ।
*बेटियां निर्भय हों निर्भया नहीं*