30/05/2026
सबसे पहले, किसी भी व्यक्ति पर हिंसा, हमला या प्रतिशोध की राजनीति का समर्थन नहीं किया जा सकता। कानून से ऊपर कोई नहीं है, और किसी भी मतभेद का समाधान लोकतांत्रिक एवं कानूनी तरीकों से ही होना चाहिए।
पश्चिम बंगाल: शिकारी अब शिकार बन रहे हैं
1990 के दशक की बॉलीवुड फिल्मों में एक आम कहानी हुआ करती थी। किसी गाँव का एक अत्याचारी मुखिया और उसका क्रूर भतीजा पूरे इलाके में आतंक मचाए रखते थे। उनके गुंडे लोगों को डराते-धमकाते, महिलाओं पर अत्याचार करते, लूटपाट करते और पूरे गाँव को भय के साए में जीने पर मजबूर कर देते थे। ऐसा लगता था मानो उनके अत्याचारों का कभी अंत नहीं होगा।
फिर कहानी में नायक का प्रवेश होता था। शुरुआत में उसे कुछ असफलताओं और संघर्षों का सामना करना पड़ता था, लेकिन वह हार नहीं मानता। दूसरी ओर खलनायक अपने अपराध और बढ़ा देते थे। अंततः वह क्षण आता था जब नायक अत्याचारियों को परास्त कर देता था।
और जैसे ही आतंक का साम्राज्य ढहता था, वैसे ही वे लोग भी सामने आने लगते थे जो वर्षों से डरकर चुप थे। जिनके साथ अन्याय हुआ था, वे अपना गुस्सा और विरोध खुलकर व्यक्त करते थे। जो कभी भयभीत थे, वही अब अत्याचारियों को उनके कर्मों का जवाब देते दिखाई देते थे।
पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीति को देखकर कुछ लोगों को वही फिल्मी दृश्य याद आ सकता है। उनका मानना है कि वर्षों से दबे हुए लोगों का आक्रोश अब सतह पर आ रहा है। यह उन लोगों की प्रतिक्रिया है जो स्वयं को लंबे समय तक उपेक्षित, भयभीत या पीड़ित महसूस करते रहे।
आज जो लोग सत्ता, भय और दबदबे के बल पर खुद को अजेय समझते थे, वे जनता के बढ़ते असंतोष का सामना कर रहे हैं। वर्षों से जमा हुआ गुस्सा और नाराज़गी अब खुलकर दिखाई दे रही है।
समय का चक्र बड़ा विचित्र होता है। जब सत्ता अहंकार में बदल जाती है और भय शासन का साधन बन जाता है, तब एक दिन वही भय टूटता भी है। तब इतिहास करवट लेता है और कभी शिकारी रहे लोग स्वयं को शिकार की स्थिति में पाते हैं।