19/06/2021
हमारी आस्था: गंगा- दशहरा
गंगा दशहरा जेष्ठ शुक्ल दशमी की तिथि को मनाए जाने वाला एक महा पुण्यदाई प'र्व है, हमारे मनीषियों ने तो गंगा को भारत की सुषुम्मा नाडी़ की संज्ञा दी। यह जीवन की ऊर्जा का स्त्रोत है। मोक्षदायिनी गंगा सदियों से राष्ट्र की जीवनधारा बन हमारा पोषण कर रही है।इसलिए तो, हम हिंद वासियों के जनमानस के मन प्राण में बसी हुई आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है।
मान्यता है कि गंगा (स्वर्ग की नदी) देवाधिदेव शिव की जटाओं से होती हुई धराधाम पर उतरी है किंतु, इसे स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक में लाने का श्रेय पुरुषोत्तम राम के वंशज राजा भगीरथ जैसे महापुरुषों के प्रयास से संभव हो पाया था।
जब कपिल मुनि के श्राप से सगर के साठ हजार पुत्रों को तारने के लिए भागीरथ ने गंगा को धराधाम पर अवतरित करने के लिए कठोर तपस्या किया। तब जाकर स्वर्ग की नदी गंगा देवाधिदेव शिव की जटाओं से होती हुई ब्रह्मा द्वारा निर्मित (विदुंसर सरोवर) से अवतरित सात धाराओं में विभक्त होकर पृथ्वी लोक में प्रवाहित हुई, और कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचकर महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों को श्राप मुक्त किया।
इस (बिंदुसर सरोवर) की आकृति गाय के समान दिखने के कारण इस स्थान को (गोमुख) कहा गया! इसलिए कहा जाता है कि, भागीरथ के प्रयास से गंगा स्वर्ग लोक से भूलोक में पधारी, गोमुख से निकलकर गंगासागर तक गंगा सिर्फ एक जलधारा नहीं बल्कि, यह एक अमृतधारा बन जाती है गंगाजल में अनेक औषधीय गुण होते हैं विश्व के किसी भी जलधारा में औषधीय गुण नहीं है, जो गंगा में है, इसके जल को बरसों डब्बे में रखने के बावजूद किसी भी प्रकार का विकार उत्पन्न नहीं होता है। विश्व में अनेकों नदियां है किंतु, गंगा नदी जैसी महिमा किसी की भी नहीं है देशवासी और विदेशियों ने भी इसके कीटाणु रहित जल के वैज्ञानिक महत्व को पहचाना है, गंगा हमारा जीवन दर्शन है, गंगा भारतीयता का प्रतीक है, गंगा को भारत से अलग कर देंगे तो, भारत को भारत कहना कठिन हो जाएगा। इसके प्रभाव में हमारा लोक विश्वास, हमारी आस्था, और हमारी सांस्कृतिक परंपरा जीवित है।
काशी का गंगा घाट हो या चित्रकूट का गंगा घाट अनगिनत साधु संतों ने शास्त्रार्थ किया। जो कि गंगा घाटों की सीढ़ियों पर संपन्न हुई। गंगा को गीत कारों ने गीतों में, कवियों ने कविता में, महत्वपूर्ण स्थान दिया ,मुंडन से लेकर विवाह तक के संस्कार में गंगा की सार्थकता महसूस होती है गंगा के किनारे हमारे अनेक उत्सव संपन्न होते हैं, जन्म से लेकर मृत्यु तक गंगा मां अपनी उपस्थिति की अनुभूति से हमें अनुग्रहित करती है।
गंगा एक वात्सल्यी मां है, वह बिना किसी भेदभाव के हमारी संस्कृति की श्रेष्ठता प्रदर्शित करती है। यहां चाहे अधिकारी हो या कर्मचारी, व्यापारी हो या किसान, अमीर हो या गरीब, स्त्री-पुरुष हिंदू- मुस्लिम सिख - ईसाई सभी जाति धर्म सबके साथ समान भाव रखती है, तब हमारी आस्था और धनी हो जाती है।
गंगा निरंतर प्रवहमान रहती है, और हमें प्रेरणा देती है कि जीवन में गतिशीलता बहुत जरूरी है उसकी राह में पत्थर, झड़ने, जलाशय, अवरोध डाले खड़े रहते हैं किंतु, वह किसी भी बाधा को नकारते हुए खुद को समेटते हुए निरंतर आगे बढ़ती रहती है और अपना लक्ष्य समुद्र से जाकर मिलन पूरा करती है। गंगा तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का विशेष अंग है!
जिस प्रकार हमारे शरीर का रक्त, कोशिकाओं में बेहतर रक्त जीवन का भरोसा देता है। उसी तरह मोक्षदायिनी गंगा शताब्दियों से राष्ट्र की जीवनधारा बन हमारा पोषण कर रही है। करीब 42 करोड़ आबादी की आजीविका गंगा पर निर्भर करती है, सभी भारतीयों की अंतिम इच्छा होती है कि मृत्यु के समय (गंगाजल) और मृत्यु के उपरांत (गंगातट) प्राप्त हो। मुंडन से लेकर विवाह तक के संस्कार में गंगा की सार्थकता महसूस होती है किंतु, कितनी विडंबना?? है कि (जगत कल्याणी) मां गंगा एक (कथा) नहीं एक (व्यथा )के रूप में आज हमारे सामने है, आज गंगा विश्व की छठी सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में से शुमार है। तकरीबन (ग्यारह सौ )1100 करोड़ लीटर अपशिष्ट रोजाना गंगा में गिरते हैं। कानपुर का चमड़ा उद्योग और बूचड़खाने के कारण गंगा नदी इतनी दूषित हो चुकी थी कि कानपुर में गंगा जल और नाले के जल में अंतर करना अत्यंत कठिन हो गया था। नगरों के विकास का दुष्परिणाम यह हुआ कि शहर-शहर गांव- गांव सरकारी सीवर लाइन बन गए और स्वयं के मकान में सेप्टिक टैंक समाप्त हो गए और इन मल मूत्र वाले सीवर लाइनों को गंगा जैसी पवित्र नदियों तक जोड़ दिया गया! गंगा किनारे बसे किसी भी बड़े शहर में गंदे नाले के पानी के उपचार का कोई प्लांट नहीं है। नमामि गंगे परियोजना की घोषणा हुई नए एक्शन प्लान में 2020 तक गंगा किनारे बसे सभी गांव को खुले में शौच से मुक्त मुक्त किए जाने का संकल्प भी लिया गया है।
किंतु यह तभी संभव होगा जब हम सभी हिंदू वासी भागीरथ प्रयास करेंगे!नहीं तो आने वाली पीढ़ी गंगा के वर्तमान स्वरूप को नहीं देख पाएगी | जब तक हम सनातन धर्म के पांच (ग) गंगा गीता, गायत्री, गोविंद और गौ माता को अपने जीवन दर्शन में आत्मसात नहीं करेंगे तब तक हमारी आस्था और संस्कृति जीवित नहीं रह पाएगी! हमें याद रखना होगा कि हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है और तब वैसे देशद्रोहियों को करारा जवाब मिलेगा जो फिल्म निर्माण करते समय (राम तेरी गंगा मैली) जैसे शीर्षक का चुनाव करते है (राम) और (गंगा) की संस्कृति को नष्ट करने के कुचक्र से बचाने के लिए संपूर्ण हिंद वासियों का कर्तव्य बनता है क्योंकि, गंगा हमारी पुरातन आर्य संस्कृति की परम पावन धरोहर ही नहीं बल्कि, देव लोक का महाप्रसाद या चरणामृत है। गंगा किनारे लगने वाला कुंभ मेला असंख्य श्रद्धालुओं और जनों का महामिलन पर्व (महाकुंभ) का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। जिस स्नान से मिलने वाला पुण्य इन समूची धरती की (100000) एक लाख दक्षिणाओ से बढ़कर है, (1000 )एक हजार अश्वमेध यज्ञों और (100)एक सौ बाजपेई यज्ञों के पुण्य से बढ़कर के कई गुना महत्व रखता है। (व्यक्ति से विराट) के महा मिलन का यह महापर्व कहीं स्मृतियों में शेष ना रह जाए , इसलिए सरकार और समुदायों से लेकर आम लोगों की भी अपनी सार्थक भूमिका निभानी चाहिए ।ताकि हम गंगा को स्वच्छ रख सकें तभी मां गंगा की आराधना पूरी होगी और गंगा मैया को पियरी चढ़ाने की आस्था अटूट बनी रहेगी
लेखिका
प्रियम्वदा कुमारी केसरी (महामंत्री)भारतीय जनता पार्टी (महिला मोर्चा)
(बिहार प्रदेश)