27/11/2025
रात के 1 बजकर 26 मिनट।
कामा अस्पताल के बाहर अंधेरा था, पर उस अंधेरे में एक अकेला हवलदार खड़ा था।
नाम – तुकाराम गोपाल ओंबले।
उम्र – 48 साल।
कंधे पर सिर्फ तीन स्टार, पर सीने में पूरा हिंदुस्तान।
सामने थी मौत।
अजमल कसाब।
AK-47 की नाल से अभी-अभी गोलियाँ बरस चुकी थीं।
उसके साथी भाग रहे थे।
कसाब ने सोचा था – अब कोई नहीं रोकेगा।
पर तुकाराम खड़े थे।
बिना बुलेट-प्रूफ जैकेट।
बिना हथियार।
बस एक लाठी और एक हौसला।
जब कसाब ने फिर ट्रिगर दबाया,
तुकाराम ने बंदूक की नाल पकड़ ली।
गोलियाँ उनके सीने में, पेट में, कंधों में समाती गईं…
29 गोलियाँ।
पर उनका हाथ नहीं छूटा।
उन्होंने कसाब को जमीन पर पटक दिया।
साथी पुलिसवाले दौड़े, कसाब को काबू किया।
वो जिंदा पकड़ा गया।
और तुकाराम?
उन्होंने आखिरी साँस तक सिर्फ एक बात कही थी –
“पकड़ो साले को… जिंदा पकड़ो।”
जब अस्पताल ले जाया गया,
डॉक्टरों ने कहा –
“इतनी गोलियाँ खाकर भी 20 मिनट तक जिंदा रहे…
और हाथ से बंदूक नहीं छोड़ी।
ऐसा हौसला हमने पहले कभी नहीं देखा।”
तुकाराम ओंबले।
महाराष्ट्र पुलिस के असिस्टंट सब-इंस्पेक्टर।
घर में दो बेटियाँ और पत्नी इंतज़ार कर रहे थे।
उस रात वो ड्यूटी पर थे,
और ड्यूटी से ऊपर कुछ था –
वो था हिंदुस्तान।
उनकी शहादत ने कसाब को अदालत तक पहुँचाया।
उनकी शहादत ने साबित किया कि
हीरो सिर्फ फिल्मों में नहीं होते।
कभी-कभी वो खाकी वर्दी में,
तीन स्टार लगाए,
लाठी हाथ में लिए भी आते हैं।
आज जब भी कोई कहता है “26/11 का हीरो कौन था?”
तो सबसे पहले एक नाम आता है –
तुकाराम ओंबले।
जो मरकर भी जिंदा हैं।
जो गए, पर हिंदुस्तान को एक सबक देकर गए –
“अगर हौसला हो, तो बंदूक की नाल भी हाथ से छीन लो।”
सैल्यूट है आपको ओंबले साहब।
हर बार, हर साँस के साथ।
जय हिंद। 🙏🇮🇳 जय हिंद