05/05/2022
सूरसागर : संकलन और अनुवाद
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आज सूर जयंती है (जन्म : वैशाख शुक्ला 5 वि.1535) और मुझे याद आ रहे हैं आदरणीय श्री भगवतीप्रसाद जी देवपुरा। उन्होंने महाकवि सूरदास कृत सूरसागर का सम्पूर्ण अनुवाद किया है। नाथद्वारा में अष्टछाप सखाओं के कीर्तन का गान होता है और हिंदी की यह कीर्तन संपदा यहां राग रागिनियों सहित नियमित गाई जाती है। यहां के कीर्तनकारों को सूर सहित सभी कीर्तनकारों के समस्त पदों की राग रागिनियां, गायन समय, अवसर, ऋतु, उत्सव, दर्शन आदि सब के सब मुखाग्र हैं।
आदरणीय देवपुरा साहब ने विट्ठल नाथ जी, छितस्वामी, कृष्णदास, नंददास, परमानंददास आदि के संग्रहों का सानुवाद संपादन किया तो एक दिन मैंने रागबद्ध आग्रह किया : अब तो बाउजी सूर उबारो...! आपको महासागर करना है! अन्य अनेक मित्रों का भी समय समय पर आग्रह था ही। अग्रज पुरुषोत्तमजी उन्हें याद दिलाते रहे और एक रात निद्रा को तिलांजलि देकर सूरसागर का संकल्प किया। पूरा ग्रंथ अनुवाद हुआ : बरस पर कई महीने और कई दिन पर घड़ियां और पल! एक दिन चौपाटी पर श्रीविष्णुकांतजी के साथ चर्चा हुई तो बोले आधा काम हो गया। साहित्य मंडल के हीरक जयंती ग्रंथ के साथ यह मेवाड़ ही नहीं देश के हिंदी साहित्य का बड़ा काम हुआ। लगभग ढाई हजार पन्नों का।
एक खंड छप कर आया। उनके पुत्र चि. श्यामजी अपना सब काम छोड़कर जुटे। और, इसी तरह दूसरा खंड तैयार हुआ। बाउजी भयंकर बीमार पड़ गए। एक दिन फोन पर रुंधे गले से बोले : पता नहीं, सूरसागर होगा कि नहीं! मैंने कहा : यह काम आपका है और आपसे ही होना है। आयुष्य इसी काम के लिए मिला है! श्यामजी उन दिनों की बातें सुनाते हुए गदगद हो जाते हैं और मैं गर्व करता हूं कि जिस मेवाड़ में सूरसागर सहित अष्ट छापसखा के कीर्तनों का रागों सहित संग्रह कृष्णानंद ने किया, उसी मेवाड़ में सूरसागर का सुवर्ण कलम चित्रांकन हुआ और हम सभी के लिए सरल, सुबोध अनुवाद हुआ!
देवपुराजी का यह योगदान अपूर्व और अद्वितीय है। उनके इस अवदान पर विश्व विद्यालयों में चर्चा अभी शेष है। मैंने डॉ. रामचंद्र शुक्ल, बाबू श्यामसुंदर दास, हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि को नहीं देखा लेकिन बाबूजी के रूप में हिंदी की विभूतियों को एकीकार देखा जिन्होंने सूरसागर का काम पूरा करके कहा था : अब कह सकता हूं : सूर सूर तुलसी ससि...! और, मैं कहता था कि आपने ''प्रसाद" नाम सार्थक कर दिया! नंदनंदन श्रीनाथजी मेवाड़ में व्रजधाम लाए और आपने ब्रजभाषा में मेवाड़ का शीर्ष योगदान तय कर दिया है।
चित्र :
श्री श्याम प्रकाश देवपुरा