08/01/2020
कल अचानक पता चला भुवन बिष्ट अब नहीं रहे! ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं कि इतनी जल्दी वो हमें छोड़कर चले जाएंगे. हाल के कुछ दिन पहले पता चला था कि एम्स में उनका ऑपरेशन सफल हो गया. अपनी दिक्कत परेशानी को किसी साथी को उन्होंने बताया ही नहीं, बस बाकी साथियो से उनकी दिक्कतें ही पूछते रहे. उनका ऐसे बेरुखी से चले जाना हमारे लिए बहुत दुखदायी था. गिर्दा के जाने के बाद उनके कुछ साथियो ने गिर्दा स्मृति मंच बनाया जिनमे भुवन मुख्य थे. जन की बात को पहुंचाने को भुवन ने कई नुक्कड नाटक लिखे, खेले, गीत गाए, सभाएं की. रंगकर्मी अनिल राव की आकस्मिक मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में भुवन ने कई नुक्कड नाटक किए. अपनी प्रयोगधर्मिता के लिए भुवन साथियो में सबसे आगे थे. किसी भी मुद्दे पर गीत बनाना हो, दो मिनट में तैयार हो जाता था. चाहे मामला खुले में शौच का हो या कोई होली हो,भुवन का प्रयोगधर्मी दिमाग हमेशा कुछ ना कुछ बुनने में ही रहता था. काग़ज़ के टुकड़ों में लिखी कविता के अंश, किसी डायरी में चिपककर कुछ बन जाते थे. बच्चों के साथ भी नुक्कड नाटक का उनका कार्य सराहनीय रहा. गिर्दा स्मृति मंच के लिए हमेशा तन मन धन से वो साथ रहे और गिर्दा के बाद नौ साल ये कार्यक्रम चलाए. उन्होंने यादगार नाटक "गोपुली ग़फूरन","तिल का ताड़", संस्कृत नाटक"दशकुमारचरितम" , एकल नाटक "बादशाहत का खात्मा" आदि किए. अपनी संस्था "रंगभूमि" तथा नैनीताल की अन्य संस्थाओ के साथ भी कुछ नाटक किए. गिर्दा स्मृति मंच के साथ "सम्पादक की कलम", "तस्वीर", "नया मुन्शी" आदि किए तथा लगभग सभी नाटकों में अपना सहयोग दिया .गिर्दा स्मृति मंच में अक्सर ढील होने पर वह अकेले ही मोर्चा सम्भालने की बात कर दुबारा टीम में जोश भर देते थे.उनकी बिखरी कविताओ को साथी अनिल कार्की ने संकलित किया है जो कि छापने के लिए लंबित है (भविष्य में गिर्दा स्मृति मंच इसे प्रकाशित करवाएगा). उत्तराखंड आंदोलनकारी होने के नाते जो नौकरी में वो तैनात थे, उन्होंने उसे अपनी मेहनत से पास किया. नौकरी लग जाने पर वह अपनी नौकरी से संतुष्ट नहीं थे. अवकाश के दिन मिलने पर अक्सर वह बताते थे कि हमारी सरकारी व्यवस्था ने समाज को अंदरखाने किस तरह भ्रष्ट और लालची बना दिया है. कोई ईमानदारी से नौकरी भी करे तो उसका रहना मुश्किल हो जाता है. अपनी बेरोज़गारी के दौर में ट्रैवल एजेंट का काम करके उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की व परिवार भी पाला, इसके अलावा मुंबई में "दिनमान" में भी काम किया. मनोहर श्याम जोशी (हिन्दी के पहले सोप ओपेरा लेखक) के साथ भी उन्होंने काम किया. इसके अलावा भी वो अन्य बड़े बड़े साहित्यकारों के साथ रहे और फ़िल्मों में भी काम किया. गिर्दा स्मृति मंच का अगला दसवां कार्यक्रम भुवन को समर्पित होगा.
भुवन की एक कविता का कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत है-
"लड़ाइयाँ कहाँ नहीं है
जीत कर आज तक कोई
सिकंदर नहीं बन सका.
लड़ाइयाँ ज़रूरी भी हैं और मज़बूरी भी "