BSP Nagpur Mayor Create Campaign

Directions Contact the organization

BSP Nagpur Mayor Create Campaign बाबासाहब की धम्मचक्र परिवर्तन नगरी न?

BSP Youth Nagpur पेज का उद्देश्य
उद्देश्य बाबासाहब की धम्मचक्र परिवर्तन नगरी नागपुर के साथ-साथ महाराष्ट्र और अन्य राज्यो तथ केंद्र में भी बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार लाना ।
पेज बसपा वालंटियर्स द्वारा चलाया जा रहा है , प्रदेश एवं केंद्र सरकार की गलत नीतिओं को उजागर करना और एकमात्र उद्देश्य पंजाब अवं अन्य राज्यों और केंद्र में भी बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार लाना ।
आप से अनुरोध है बसपा की विचारधारा और बहन कुमारी मायावती जी के पूर्व शासनकाल में अपराध मुक्त , भय मुक्त वातावरण को जन जन तक पहुँचाने के लिए ज़रूर लाइक करे इस पेज को। जयभीम जय भारत ।
- अभिलेश वाहाने बसपा

प.पू. डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या आंबेडकरी चळवळीत सहयोगी सहभागी समाजसेवक राजकारणी राज्यसभा खासदार बॅरिस्टर राजाभाऊ खोब्...
25/09/2026

प.पू. डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या आंबेडकरी चळवळीत सहयोगी सहभागी समाजसेवक राजकारणी राज्यसभा खासदार बॅरिस्टर राजाभाऊ खोब्रागडे यांच्या 101 व्या जयंती दिनानिमित्त विनम्र अभिवादन...
चंद्रशेखर कांबळे, नागपूर

पूना पैक्ट धिक्कार दिन!पूना पैक्ट ने हमारे लोगों को मताधिकार से वंचित किया. हम जिसे चुनना चाहते है, उसे हम चुन नहीं सकते...
23/09/2026

पूना पैक्ट धिक्कार दिन!
पूना पैक्ट ने हमारे लोगों को मताधिकार से वंचित किया. हम जिसे चुनना चाहते है, उसे हम चुन नहीं सकते. और जिसे हम चुनना नहीं चाहते, वही हमारा प्रतिनिधि बन जाता है.
-डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर.
(वॉट कांग्रेस एण्ड गाँधी हैव डन टू द अन्टचेबल्स?)
#चंद्रशेखर कांबळे,नागपूर

राव तुलाराम: भारत की आजादी के लिए दर-दर भटकता एक महानायक23 सितंबर को वीर शहीद दिवस मनाता है क्योंकि 1863 में आज ही के दि...
22/09/2026

राव तुलाराम: भारत की आजादी के लिए दर-दर भटकता एक महानायक
23 सितंबर को वीर शहीद दिवस मनाता है क्योंकि 1863 में आज ही के दिन राव तुला राम की मृत्यु हुई थी.

राव तुलाराम: भारत की आजादी के लिए दर-दर भटकता एक महानायक
हवाई मार्ग से दिल्ली आने और जाने वाले जिस सड़क का इस्तेमाल करते हैं उसका नाम है राव तुला राम मार्ग. शांति पथ से आगे बढ़ते हुए जैसे ही आप आरकेपुरम के ट्रैफिक-सिग्नल को पार करते हैं, राव तुला राम मार्ग शुरू हो जाता है, जो इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास से होते हुए गुरुग्राम (गुडगांव) की ओर बढ़ जाता है और दिल्ली-अजमेर एक्सप्रेसवे से जुड़ जाता है.

इसका मतलब ये हुआ कि दुनियाभर से दिल्ली आने वाले और दिल्ली से दुनिया भर में जाने वाले बिना राव तुला राम मार्ग पर आए अपनी यात्रा पूरी नहीं कर सकते. लेकिन भागती-दौड़ती जिंदगी में शायद ही कभी आप यह जानने की कोशिश करते होंगे कि आखिर राव तुला राम थे कौन?

हरियाणा का वीर शहीद

हो सकता है कि आज इस नाम की अहमियत लोगों के लिए सिर्फ एक साइन-बोर्ड से ज्यादा न हो लेकिन रेवाड़ी, हरियाणा का यह सपूत 1857 की क्रांति का महानायक था. 23 सितंबर को हरियाणा वीर शहीद दिवस मनाता है क्योंकि 1863 में आज ही के दिन राव तुला राम की मृत्यु हुई थी. देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में पहला योगदान हरियाणा के सपूतों का है. इसकी पहली चिंगारी अंबाला में ही भड़की थी जो बाद में मेरठ को केंद्र बनाकर पूरे देश में फैली.

रामपुरा, रेवाड़ी के जागीरदार राव पूरन सिंह और रानी ज्ञानकौर के यहां 9 दिसंबर 1825 को एक बच्चे ने जन्म लिया जिसका नाम उन्होंने बड़े प्यार से तुला राम रखा. राव तुला राम की शिक्षा-दीक्षा में मां-बाप ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

बचपन में ही वह हिंदी, उर्दू, फारसी में निपुण हो चुके थे और अंग्रेजी में भी उनका ज्ञान अच्छा-खासा था. लेकिन क्षत्रियता उनमें कूट-कूट कर भरी थी. इसीलिए जब पिता की मौत के बाद सिर्फ 14 बरस की उम्र में उन्हें रामपुरा की जागीर संभालनी पड़ी तो उनके कौशल में कहीं कोई कमी नहीं थी.

चिंगारी भड़काने वाला क्रांतिकारी

पढ़े-लिखे और विश्व-पटल पर हो रही हलचलों से पूरी तरह होशियार तुला राम अंग्रेजों के अत्याचार और संसाधनों की लूट देख रहे थे और अपने आक्रोश को अर्थ देने का वातावरण तौल रहे थे. दरअसल, 1857 की शुरुआत ही में अंग्रेजी ज़ुल्म के खिलाफ जन-मानस की बेचैनी अपने चरम पर पहुंच चुकी थी. माहौल को बस एक हलकी सी चिंगारी की जरूरत थी. इतिहास बताता है कि हरियाणा के इस होशियार देशवासी ने अपनी योजना के लिए इस समय को गंवाना उचित नहीं समझा.

17 मई 1857 को तुला राम ने अपने एक कजिन भाई राव गोपाल देव और कुछ सौ साथियों के साथ रेवाड़ी के तहसीलदार को गद्दी से उतारकर रेवाड़ी का संचालन अपने हाथ में ले लिया. देखते ही देखते पांच हजार सैनिकों का एक समूह राव तुला राम के नेतृत्व में आकर खड़ा हो गया. इस ताकत को हथियार बनाने के लिए उन्होंने पहला काम ये किया कि शस्त्र-निर्माण का एक कारखाना खोल लिया जहां गोला-बारूद और बंदूकें बनाई जाने लगीं.

राव तुला राम का अगला पड़ाव था दिल्ली, जहां बहादुर शाह ज़फर के पास जमा होकर विद्रोही रियासतें अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए मैदान में आ चुकी थीं. तुला राम ने जनरल बख्त खान के जरिए दिल्ली-पतन से दस दिन पहले 45 हजार की रकम भेजी, साथ ही दो हजार गेहूं के बोरे और दूसरी जरूरी सुविधाओं को रवाना किया और खुद दिल्ली के साय में बसे रेवाड़ी की नाके बंदी कर ली.

अंग्रेजों से लिया लोहा

16 नवंबर 1857 को दिल्ली से महज डेढ़ सौ किलोमीटर दूर नसीबपुर, नरनौल, रेवाड़ी में राव तुला राम का सामना अंग्रेजों से हुआ. इतिहास बताता है कि राव के सिपाहियों का पहला हमला इतना रणनीतिक और जोरदार था कि बात अंग्रेजी फौज के अनुमान से आगे निकल गई, नतीजा ये हुआ कि ब्रिटिश सेना की कमान संभालने वाले कर्नल जॉन ग्रांट गेरार्ड और कैप्टन वालेस को जान से हाथ धोना पड़ा जबकि लेफ्टिनेंट ग्रेजी, केनेडी और पियर्स बुरी तरह जख्मी हुए. लेकिन इससे पहले कि राव तुलाराम के हाथों कर्नल गेरार्ड की मात होती, ब्रिटिश समर्थक नाभा, कपूरथला, जींद और पटियाला की फौजें, मदद के लिए पहुंच गयीं.

देखते ही देखते दृश्य बदल गया और राव तुला राम का लश्कर टूट गया. उनके सेनापति राव किशन सिंह, राव रामलाल और शहजादा मोहम्मद आजम और दूसरे शीर्ष-सैनिक मारे गए. अंग्रेजों के लिए ये बड़ी जीत थी. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे महत्वपूर्ण मानते हुए लेफ्टिनेंट फ्रांसिस डेविड मिलेट ब्राउन को इस लड़ाई में विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया, जो कि उस जमाने में गौरव की बात थी.

रेवाड़ी अंग्रेजों के पास दुबारा चले जाने पर तुलाराम अपनी बची खुची ताकत के साथ राजस्थान में तात्या टोपे की सेना के साथ हो गए. ये साथ भी साल भर का था क्योंकि अंग्रेज तात्या पर भी भारी पड़ गए. इतिहास में तुलाराम के बारे में शोध करते जाइए और आप यकीनन इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि तुलाराम सच्चे देश-प्रेमी थे वर्ना दूसरी ब्रिटिश-समर्थक पड़ोसी-रियासतों की तरह वह भी ऐश की पराधीनता स्वीकार कर लेते और रेवाड़ी के शासक बने रहते.

रूस के लिए हुए रवाना

1857 की क्रांति में अपने कौशल दिखा चुके तुलाराम का दूसरा रूप 1959 के आस-पास नजर आता है जब लगभग 34-35 बरस के तुलाराम, एक बड़ी मुहिम के लिए खुद को आगे करते हैं. राव तुलाराम की जीवनी लिखने वाले के.सी.यादव लिखते हैं कि ‘19वीं सदी के मध्य में, मध्य-एशिया में रूस की हलचल में तेजी आई जिसका असर ब्रिटिश-साम्राज्य और किसी उपाय की बाट जोह रहे भारतीयों को, प्रभावित किए बिना नहीं रह सका. सेंट पीटर्सबर्ग, भारतीयों पर हो रहे जुल्म से अनजान नहीं था.

भारत की ब्रिटिश विरोधी रियासतें जिन्होंने 57 के संग्राम में मुंह की जरूर खाई लेकिन अंग्रेज उन्हें नए मंसूबे बनाने से नहीं रोक सके. गदर के बाद इन रियासतों के स्व-घोषित शासकों के एक समूह ने तय किया कि रूसी जार के पास उनमें से कोई दूत बनकर जाए और मदद की दरख्वास्त करे. रेवाड़ी के नरेश ने इस दुर्गम और तकलीफदेह यात्रा के लिए खुद को पेश किया और मारवाड़, बीकानेर और जयपुर के जार के नाम लिखे गए अलग-अलग पत्रों के साठ, एक दस्ते समेत, रूस का रुख किया.

सेंट-पीटर्सबर्ग के संग्रहालय में सरदार सिंह बहादुर राजा बीकानेर का पत्र आज भी सुरक्षित है. जो ये साबित करने के लिए काफी है कि दरअसल तुलाराम भारत के पहले राजदूत हैं जो अपनी आजादी के लिए रूसी मदद के लिए रूस गए. इस लंबी और यातना भरी यात्रा में तुलाराम का सबकुछ छूट गया और उनके साथी गिरफ्तार हो गए, इस पर कुछ संशय है कि तुलाराम रूस पहुंचे या नहीं लेकिन वह रूस के जार तक अपने पत्र पहुंचाने में कामयाब हुए, इसके साक्ष्य मौजूद हैं.

रेवाड़ी में राम तुलाराम चौक.

अस्पताल और मार्ग के नामकरण से ज्यादा के हकदार

19वीं सदी का मध्यकाल यात्राओं के लिए इतना भी सुगम नहीं था कि आसानी से इसे पूरा किया जा सकता. लेकिन पूरे हिंदुस्तान की आजादी का जो ख्वाब हरियाणा के इस क्षत्री अहीर ने देखा था उसे पूरा करना के लिए वह निकल पड़ा था. अपने इस मिशन में पहले वह इरान गए या रूस इस पर भी संशय है लेकिन जब वह काबुल पहुंचे तो उनका गिरता स्वास्थ्य गंभीर स्थितियों में पहुंच गया था और 23 सितंबर 1862 या 63 में काबुल में उनकी मृत्यु हो गई.

राव तुलाराम ने 57 से 62 तक महज 6 साल में भारत की आजादी के लिए जो जिम्मेदारी निभाई और जिन यातनाओं के चलते उन्हें अपने प्राण गंवाने पड़े, आजाद-भारत को उनके सम्मान में अस्पताल और मार्ग के नामकरण से आगे बढ़कर कुछ ऐसा करना चाहिए था कि राष्ट्र उन्हें नमन करता. हां हरियाणा उन्हें ‘राज-नायक’ कहता है उनकी पुण्यतिथि को वीर शहीद दिवस के रूप में मनाता है.

हरियाणा में अहीर समुदाय के लिए एक कहावत बड़ी मशहूर थी- ‘यूं आकर कही अज़ीम ने सुनो भई बस्ती गांव, बचना मर्द अहीर से वर्ना लड़कर कर लो नाम’. राव तुलाराम बेशक इसी बहादुर समुदाय के थे लेकिन क्या उनका योगदान सिर्फ हरियाणा या रेवाड़ी तक ही सीमित था?
शहिद दीवस पर शत्-शत् नमन।
अभिवादन:- चंद्रशेखर कांबळे नागपूर

बहुजन समाजात शिक्षणाचे वटवृक्षाचे बीज रोवणारे,गोर-गरिब  कष्टकरी शेतकरी मजुरांपर्यंत शिक्षणाचे हक्क अधिकार पोहोचविण्यासाठ...
22/09/2026

बहुजन समाजात शिक्षणाचे वटवृक्षाचे बीज रोवणारे,गोर-गरिब कष्टकरी शेतकरी मजुरांपर्यंत शिक्षणाचे हक्क अधिकार पोहोचविण्यासाठी अहोरात्र परिश्रम घेणारे थोर शिक्षणमहर्षी पद्मभूषण कर्मवीर भाऊराव पाटील यांच्या 139 व्या जयंती निमित्त कोटी-कोटी नमन विनम्र अभिवादन.....
अभिवादक:-चंद्रशेखर कांबळे,नागपूर

भारत की समृद्ध संत परंपरा के महान विचारक सिख धर्म के संस्थापक, सतनाम सतगुरु वाहेगुरु गुरु नानक देव जी  के 487 वे महापरिन...
22/09/2026

भारत की समृद्ध संत परंपरा के महान विचारक सिख धर्म के संस्थापक, सतनाम सतगुरु वाहेगुरु गुरु नानक देव जी के 487 वे महापरिनिर्वाण दिवस पर्व पर उन्हें कोटि-कोटि नमन प्रणाम.....
अभिवादक:-चंद्रशेखर कांबळे,नागपूर

आप सभी बहुजन समाज के भाई-बहनों को विश्व शांती दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएं.....
21/09/2026

आप सभी बहुजन समाज के भाई-बहनों को विश्व शांती दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएं.....

महान समाजसुधारक दार्शनिक एवं मानवता के प्रखर पुरोधा राष्ट्र संत श्री. नारायणा गुरु जी के 98 वे स्मृती दिन पर उन्हे शत् श...
20/09/2026

महान समाजसुधारक दार्शनिक एवं मानवता के प्रखर पुरोधा राष्ट्र संत श्री. नारायणा गुरु जी के 98 वे स्मृती दिन पर उन्हे शत् शत् नमन....

महान संत महापुरुष श्री नारायण गुरु जी : समतावादी आधुनिक केरल के प्रथम वास्तुकार*****************************************...
19/09/2026

महान संत महापुरुष श्री नारायण गुरु जी :
समतावादी आधुनिक केरल के प्रथम वास्तुकार
********************************************
महान संत महापुरुष श्री नारायण गुरु स्वामी को उनके 97 वे परिनिर्वाण दिन के मौके पर याद कर रहे हैं पुण्य पावन स्मृतीयोको शत् शत् नमन प्रणाम वंदन...lll
महान संत महापुरुष स्वामी श्री नारायण गुरु ने आधुनिक केरल के निर्माण की नींव रखी, जिसे अन्य अनेक व्यक्तित्वों, संगठनों एवं सामाजिक आंदोलनों ने आगे बढ़ाया....

महान संत महापुरुष श्री नारायण गुरू जी स्वामी जी
(20 अगस्त, 1856 – 20 सितंबर, 1928) पर विशेष
‘यह है एक आदर्श निवास,
रहते हैं जहां मनुष्य बंधुवत्,
मुक्त हो धार्मिक द्वेषभाव और
जातिगत संकीर्णताओं से’

– महान संत महापुरुष श्री नारायण गुरु जी

आज से करीब सौ वर्ष से अधिक पहले महान संत
श्री नारायण गुरु जी ने धर्म और जाति की संकीर्णता से मुक्त एक आदर्श निवास की चाहत प्रकट की थी और वे उसके लिए आजीवन कार्य भी करते रहे। भले ही उनके आदर्श समाज की कसौटी पर आज का केरल पूरी तरह खरा न उतरता हो, लेकिन वह काफी हद तक उनके आदर्श के करीब है।

इसके प्रमाण हैं आज केरल के बारे में कुछ खास तथ्य। मसलन, केरल भारत का एक ऐसा प्रदेश है, जो मानव विकास सूचकांक के पैमाने पर दुनिया के शीर्ष देशों की बराबरी करता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा वर्ष 2020 में जारी सूची में मानव विकास सूचकांक में दुनिया के 189 देशों में भारत 129 वें स्थान पर है, लेकिन केरल दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है और भारत के राज्यों में वह पहले स्थान पर है। केरल मॉडल दुनिया भर में विभिन्न समयों पर सुर्खियों बटोरता रहा है। अभी हाल में कोविड-19 संकट से निपटने के मामले में केरल मॉडल की दुनिया भर में चर्चा हुई। कोविड़-19 महामारी से बेहतर तरीके निपटने के मामले में केरल की तुलना दक्षिण कोरिया व न्यूजीलैंड जैसे उन चंद देशों से की जाने लगी, जो इस वैश्विक महामारी से सबसे बेहतर तरीके से निपट रहे हैं।

महामारी के दौरान और इसके पहले भी आरएसएस व भाजपा द्वारा वहां मजहबी फसाद फैलाने व धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिशें की गयीं लेकिन केरल में उन्हें नाकामी मिली। यह इसके बावजूद कि 2011 की जनगणना के मुताबिक केरल में मुसलमानों की आबादी 26.56 प्रतिशत और ईसाईयों की 18 प्रतिशत है। यानि गैर-हिंदू करीब 45 प्रतिशत हैं। यदि सांप्रदायिक ताकतें असफल रहीं तो जाहिर तौर पर इसकी ठोस वजहें हैं श्री नारायण गुरु जी की शिक्षा और संस्कार। जब-जब केरल मॉडल और केरल की मानवीय उपलब्धियों का जिक्र आता है तो स्वाभाविक तौर पर केरल के बाहर के लोगों के मन में यह प्रश्न उभरता है कि आखिर ऐसे केरल का निर्माण कैसे हुआ?

महान संत महापुरुषश्री नारायण गुरु जी
(20 अगस्त, 1856 – 20 सितंबर, 1928)

यह सर्वविदित है कि जब किसी देश या प्रदेश के समाज में एक गहरी उथल-पुथल मचती है और वह अपने मध्यकालीन जड़ विचारों से मुक्त होता है तथा आधुनिक बौद्धिक, तार्किक एवं विवेकसंगत विचारों को अपनाता है, तभी वह एक आधुनिक देश या प्रदेश बनता है। किसी देश-प्रदेश के आधुनिक उन्नत एवं समृद्ध देश-प्रदेश में तब्दील होने के लिए वहां के लोगों के मन-मस्तिष्क में बुनियादी बदलाव और उनके सोचने-देखने के तरीके का मानवीय एवं वैज्ञानिक होना जरूरी होता है। यानि उनकी विश्व-दृष्टि बदलनी चाहिए। इसके साथ ही वहां के सामाजिक-आर्थिक संबंधों में परिवर्तन आना चाहिए, जिसके अनुसार ही अक्सर वहां की राजनीति अपना आकार ग्रहण करती है। यह सब कुछ मिलकर एक ऐसे नागरिक समाज का निर्माण करते हैं, जिसे आधुनिक समाज कहा जा सकता है। भारत में केरल एक ऐसा ही प्रदेश है। इस संबंध में सारे उपलब्ध तथ्य इसके साक्षी हैं।

इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि केरल भारत का एक ऐसा प्रदेश है, जिसका काफी हद तक आधुनिकीकरण हुआ है और वहां एक आधुनिक नागरिक समाज का निर्माण हुआ है। वहीं यह भी सच है कि वर्ण-जाति व्यवस्था एवं पितृसत्ता के बहुत सारे अवशेष आज भी शेष भारत की तरह केरल में भी अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। इसके बावजूद भी केरल भारत का सबसे आधुनिकीकृत प्रदेश है और शीर्ष आधुनिक देशों से बहुत सारे मामलों में बराबरी करता है।

क्या केरल हमेशा से ऐसा ही रहा है? क्या केरल भारत को एक बीमार समाज बनाने वाली वर्ण-जाति, पितृसत्ता और धार्मिक घृणा (सांप्रदायिकता) की बीमारी से ग्रसित नहीं रहा है? अगर ग्रसित रहा तो वह उनसे मुक्त कैसे हुआ? वे कौन थे जिन्होंने आगे बढ़कर वर्ण-जाति, पितृसत्ता एवं धार्मिक घृणा की घातक बीमारियों से केरल को मुक्त किया और आधुनिक केरल की नींव डाली?

ऐसे व्यक्तियों में पहला नाम श्री नाराणय गुरु स्वामी का है। वे इजावा समुदाय से थे. उनके व्यक्तित्व और आधुनिक केरल के निर्माण में उनकी भूमिका को इन शब्दों में रेखांकित कर सकते हैं- “केरल के सबसे निर्णायक ऐतिहासिक काल में एक सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक सुधारक के रूप में उन्होंने करीब चार दशकों तक अपनी भूमिका निभाई। किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में, अपने व्यक्तित्व एवं कार्यों से एक नृजातीय समूह (मलयाली) को आधुनिक समूह में रूपान्तरित करने वाले व्यक्ति के श्री नारायण गुरु स्वामी मूर्त प्रतीक हैं। राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा उन्हें एक जाति विशेष के क्षेत्रीय नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया और तो दूसरी ओर ‘निम्न जातीय’ लेखकों द्वारा उन्हें एक इजावा धार्मिक सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया गया। दोनों धारणाएं गंभीर रूप से त्रुट्टिपूर्ण हैं। पहली और सबसे प्रमुख बात यह है कि वे आधुनिक केरल के पहले वास्तुकार थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। एक उन्नत बुद्धिजीवी और योग्य संगठनकर्ता थे। एक सुगठित समाज के रूप में केरल की सचेतन दावेदारी और उसके निर्माण में नारायण गुरु की अथक गतिविधियों और बहुत सारी संस्थाओं के निर्माण ने अहम भूमिका निभाई। इसने केरल के बहुस्तरीय विकास एवं राजनीतिकरण की जमीन तैयार की।”

महान संत महापुरुष श्री नाराणय गुरु के जन्म के समय केरल भी उसी तरह आकंठ जातिवाद के जहर में डूबा हुआ था, जैसा कि शेष भारत। पूरा समाज ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण की अल्लंघ दीवार से बंटा हुआ था। गैर-ब्राह्मणों के बीच भी बहुस्तरीय श्रेणीगत बंटवारा था। पवित्र-अपवित्र और सछूत-अछूत की ऐसी रेखाएं खींची हुई थीं, जिन्हें कोई पार नहीं कर सकता था। सारे अधिकार एवं कर्तव्य इन्हीं रेखाओं से तय होते थे, जो कि इन रेखाओं का उल्लंघन करने की कोशिश करता, शंबूक की तरह उसका वध कर दिया जाता। करीब 1803-04 में इजावा समुदाय के कुछ लोगों ने वायकम मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की। लेकिन उनका निर्ममता से वध कर दिया गया हत्या कर दी गई और मंदिर के उत्तर पूर्वी कोने में एक तालाब में दफना(लाशों को गढ़ा दीया गया) दिया गया। इस तालाब को आज “दलवा कुलम” के नाम से जाना जाता है और दफनाए गए लोगों को आधुनिक नागरिक समाज के निर्माण के पहले शहीद एवं संस्थापक के रूप में कृतज्ञतापूर्वक याद किया जाता है।

ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के शीर्ष पर विराजमान और सब कुछ तय करने वाले नंबूदरी ब्राह्मणों ने यह भी तय कर रखा था कि किस गैर-ब्राह्मण को उनसे कितनी फीट की दूरी पर रहना है। इजावा लोगों को नंबूदरी ब्राह्मणों से कम से कम 20 से 36 फीट की दूरी पर, चेरूमन और पुलाया लोगों को 64 फीट की दूरी पर और नायडी लोगों को 72 फीट की दूरी पर रहना था। इससे कम दूरी होने पर नंबूदरी अपवित्र हो जाते थे। कुछ जनजातियां ऐसी थीं, जिनके देखने मात्र से नंबूदरी ब्राह्मण अपवित्र हो जाते थे। सिर्फ नायर ऐसे गैर-ब्राह्मण थे, जिनके छूने पर ही ब्राह्मण अपवित्र होते थे।

केरल में गैर-ब्राह्मणों के बड़े हिस्से के लिए छाता, जूता, सोने के आभूषण आदि के इस्तेमाल की सख्त मनाही थी। इसका उल्लंघन करने वालों को सख्त आर्थिक एवं शारीरिक दंड दिया जाता था। गैर-ब्राह्मणों का घर एक मंजिल से अधिक ऊंचा नहीं हो सकता था, वे गाय का दूध नहीं पी सकते थे, महिलाएं स्तन नहीं ढंक सकती थीं, वे ऊंची जाति की महिलाओं की तरह अपने सिर पर पानी का घड़ा नहीं रख सकती थीं। अधिकांश गैर-ब्राह्मणों को सरकारी नौकरियों में प्रवेश की इजाजत नहीं थी। मंदिरों में प्रवेश की मनाही थी। दलित-आदिवासियों की कौन कहे, शूद्र कही जाने वाली जाति इजावा भी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती थी, ऐसा करने की कोशिश करने वालों का वध कर दिया जाता था।

वायकम सत्याग्रह : जातिवाद और छूआछूत के खिलाफ स्वत:स्फूर्त अहिंसक मुक्ति-संग्राम
इस प्रकार गैर-ब्राह्मणों का एक बड़ा हिस्सा बहुत सारी सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल नहीं कर सकता था, इसमें मुख्य रास्ते भी शामिल थे, जिन पर गैर-ब्राह्मणों का एक बड़ा हिस्सा नहीं चल सकता था। यहां तक कि गैर-ब्राह्मणों की पत्नियों को पहली रात नंबूदरियों के साथ बिताने का प्रावधान भी था।

केरल में चार वर्णों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र- का आदर्श घोषित रूप लागू नहीं था। वहां पूरे समाज का बंटवारा ब्राह्मण-गैर-ब्राह्मण में था। नंबूदरी ब्राह्मणों के पास जमीन का मालिकाना हक था था और वे मंदिर एवं मदिरों की संपत्ति के भी मालिक थे। राज्य और राजाओं पर उनका कड़ा शिंकजा था। वे महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों की तरह ही थे। नायर काश्तकार कहे जाते थे और सैन्य भूमिका का भी निर्वाह करते थे। लेकिन वर्ण-व्यवस्था के अनुसार वे शूद्र ही थे। वे खेतों के मालिक थे, लेकिन वे उत्तर भारत के ऊंची जाति के लोगों की ही तरह खेतों में काम नहीं करते थे। उनके खेतों में सारा काम अन्य गैर-ब्राह्मण-विशेषकर दलित करते थे। बीच का एक स्तर था, जिसमें इजावा भी शामिल थे, जिन्हें एक निश्चित समय के लिए लगान पर खेती करने को मिलती थी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर थी। कुछ दलित और आदिवासी इससे भी वंचित थे, जिन्हें अछूतों में भी अछूत का दर्जा प्राप्त था। इन दलितों को कुरावा, पुलाया और परिया आदि के रूप में जाना जाता था। इसके साथ आदिवासी भी थे, जिन्हें दलितों से भी बदतर दर्जा नंबूदरी ब्राह्मणों ने दे रखा था।

उत्तर भारत के विपरीत केरल में ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य तीनों तथाकथित उच्च वर्णों का विशेषाधिकार नंबूदरी ब्राह्मणों ने अपने हाथ में ले रखा था। फिर भी समझने की आसानी के लिए कहा जा सकता है कि विभिन्न समुदायों द्वारा संपन्न किए जाने वाले कार्यों और आर्थिक हैसियत के आधार पर देखें तो नायरों की स्थिति उत्तर भारत के क्षत्रियों जैसी थी, लेकिन शास्त्रीय एवं सामाजिक हैसियत शूद्र जैसी। इजावा जाति को आर्थिक हैसियत और सामाजिक बंटवारे के श्रेणीक्रम के आधार पर उत्तर भारत की अन्य पिछड़ी वर्ग या ओबीसी की तरह देख सकते हैं, लेकिन बहुत सारे मामलों में उनकी हैसियत भी दलितों के जैसी थी, जैसे मंदिर प्रवेश एवं सरकारी नौकरी में निषेध आदि। ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण के बंटवारे के हिसाब से ही सारे अधिकार एवं कर्तव्य निर्धारित होते थे। इस तरह केरल में अपने शास्त्रीय आदर्श (मनु संहिता) के अनुरूप ब्राह्मण ही भू-देवता था।

इस पूरी स्थिति को बदलने और मानवीय समता, न्याय एवं बंधुता आधारित समाज बनाने के लिए श्री नाराणय गुरु स्वामी ने खुद को समर्पित कर दिया। इसके लिए उन्होंने ईश्वर एवं धर्म का भी सहारा लिया, क्योंकि मुट्ठी भर नंबूदरी ब्राह्मणों ने बहुसंख्य गैर-ब्राह्मणों पर वर्चस्व कायम करने के लिए धर्म की वैचारिकी का ही इस्तेमाल किया था।

श्री नारायण गुरू ने “ओरु जाति, ओरु मदम्, ओरु दैवम् मनुष्यन्” का नारा दिया, जिसका अर्थ है- “एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर मनुष्य।” यह नारा ईश्वर और धर्म को नंबूदरी ब्राह्मणों के चंगुल से निकालने का नारा बना। इसने केरल के पूरे समाज के एक सूत्र में जोड़ने की जमीन तैयार की। इसे स्वामी जी ने सर्वप्रथम 1914 अपनी रचना “जातिनिर्णयम्” में शामिल किया और बाद में 1920 में गुरु ने इसे अपने जन्मदिन के संदेश के रूप में घोषित किया। यहां जाति शब्द का अलग अर्थ है। यहां इसका मतलब हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था नहीं, बल्कि संसार के सारे मनुष्यों को बिना किसी भेदभाव के एक प्रजाति के रूप में देखने की बात है। इस नारे का दूसरा हिस्सा भी है जो मनु संहिता पर आधारित वर्ण-जाति व्यवस्था की बुनियाद को ही चुनौती देता है। “ओरु योनि, ओरु आकारम् ओरु भेदावुम् इल्ला इतिल्” यानि सारे इंसान योनि (कोख) से पैदा होते हैं, मनुष्य के आकार भी एक समान है, इसमें कोई भी भेद नहीं है। तो फिर जाति के आधार पर भेद क्यों?

आधुनिक केरल के निर्माण के संगठित आंदोलन की शुरूआत 1903 में महान संत श्री नारायण गुरु जी स्वामी ने “श्री नारायण धर्म प्रतिपालन योगम्” (एस.एन.डी.पी.) की स्थापना के साथ की। इस कार्य में महाकवि कुमारन आशान और डॉ. पाल्पू की भी अहम भूमिका थी। एक तरह से आधुनिक केरल की बुनियाद रखने वाली यही त्रयी थी।

महान संत महापुरुष श्री नारायण गुरु स्वामी के बचपन का नाम नाणु था। उनके पिता मदन अशान उनके पहले शिक्षक थे। उनके पिता मलयालम और तमिल के साथ पाली भाषा के अच्छे ज्ञाता थे। ये तीनों भाषाएं नाणु को विरासत में मिली थीं। बाद में श्रीनारायण गुरु संस्कृत एवं अंग्रेजी में भी महारत हासिल की। बचपन से नाणु के भीतर प्रखर जिज्ञासा भाव और गहरी संवेदनशीलता थी। प्रकृति के विविध रूप उन्हें अपनी ओर खींचते थे। जीवन के करीब 35 वर्ष उन्होंने प्रकृति के सान्निध्य में घने जंगलों, नदियों और समुद्र के किनारे विचरण करते हुए बिताए। उन्होंने बुद्ध की तरह ज्ञान की साधना भी की। धर्म का आध्यात्मिक तत्व उनमें गहरे पैठा हुआ था। वे किसी भी ऐसे धर्म और ईश्वर को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे जो मानव के बीच भेद करता हो और उनमें बंधुता का भाव न भरता हो। मंदिर उनके लिए प्रेम, बंधुता, करूणा और सामाजिक भाईचारा विकसित करने के केंद्र थे। वे अक्सर कहा करते थे कि भगवान और इंसान दोनों उनके गुरु हैं। वे विभिन्न धर्मों की वैश्विक एकता में विश्वास करते थे। वे पूरी मानव जाति को एक मानते थे । उन्होंने 1921 में विश्व भाईचारा सम्मेलन आयोजित किया। इसके लिए उन्होंने जो संदेश लिखा उसका निहितार्थ यह था कि मनुष्यों में संप्रदाय, पहनावा, भाषा आदि के अंतर के बाद भी वे सब एक ही सृष्टि के हैं। सबका सबके साथ खान-पान और वैवाहिक संबंध होने चाहिए। उनका कहना था कि मनुष्य की एक जाति है, और वह है- मानव जाति।

महान संत महापुरुष श्री नारायण गुरु जी स्वामी ने मानव जाति को मानवता के सूत्र में बांधने के लिए जीवन भर प्रयास किया। वे भले ही पूरी मानव जाति को बंधुता के सूत्र में न बांध पाएं हों, लेकिन वे आधुनिक केरल के पहले व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने बंधुता आधारित आधुनिक केरल की नींव डाली, जिसे बहुत सारे अन्य व्यक्तित्वों, संगठनों एवं सामाजिक आंदोलनों ने आगे बढ़ाया।
महान संत महापुरुष श्री नारायण गुरु जी स्वामी की 98 वे परिनिर्वाण दिन पर उनके स्मृति पावन चरणों में कोटि-कोटि वंदन प्रणाम नमन....lll
अभीवादक = #चंद्रशेखर #कांबळे,नागपूर

गोंडवाना साम्राज्य के विर शहिद योद्धा राजा शंकर शाह मडावी व राजकुमार रघुनाथ शाह जी मडावी के 169 वे बलिदान दिवस पर उन्हें...
17/09/2026

गोंडवाना साम्राज्य के विर शहिद योद्धा राजा शंकर शाह मडावी व राजकुमार रघुनाथ शाह जी मडावी के 169 वे बलिदान दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन प्रणाम.....!
अभिवादक:-चंद्रशेखर कांबळे, नागपूर

अंधविश्वास , रूढ़िवाद और सामाजिक असमानता पर कुठाराघात करने वाले युगपुरुष महान समाज सुधारक द्रविड़ आंदोलन के प्रणेता पेरि...
17/09/2026

अंधविश्वास , रूढ़िवाद और सामाजिक असमानता पर कुठाराघात करने वाले युगपुरुष महान समाज सुधारक द्रविड़ आंदोलन के प्रणेता पेरियार इ.वी.रामासामी नायकर जी के 147 वे जन्म जयंती दिवस पर उनके चरणों में शत्-शत् नमन कोटी-कोटी प्रणाम...........
अभिवादक:- चंद्रशेखर कांबळे,नागपूर

Address

Nagpur
440013

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when BSP Nagpur Mayor Create Campaign posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to BSP Nagpur Mayor Create Campaign:

Shortcuts

Share