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गिरिराज की छठ्ठ करके सात यात्रा अर्हम विनीत शाह उम्र 12 वर्ष बहुत बहुत अनुमोदना
07/01/2026

गिरिराज की छठ्ठ करके सात यात्रा
अर्हम विनीत शाह
उम्र 12 वर्ष

बहुत बहुत अनुमोदना

❤श्री शंखेश्र्वर पार्श्व नाथ परमात्मा  भारत भर में   विद्यमान जिन-प्रतिमाओं में प्राय: सबसे अधिक  प्राचीन "श्री शंखेश्वर...
04/01/2026

❤श्री शंखेश्र्वर पार्श्व नाथ परमात्मा भारत भर में विद्यमान जिन-प्रतिमाओं में प्राय: सबसे अधिक प्राचीन "श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ" की प्रतिमा है, जो करोड़ो देवताओं और मनुष्यों के द्वारा पूजी गयी है| जिसके दर्शन-वंदन-पूजन और भक्ति और हजारो-लाखो आत्माओं ने सम्यगदर्शन को प्राप्त किया है-प्राप्त सम्यगदर्शन को निर्मल बनाया है और अपने चरित्र के अंतरायो को तुडवाया है|💛

💜 शंखेश्वर गाँव में सात फनों से अलंकृत श्वेतवर्णीय अत्यंत ही मनोहर यह प्रतिमाजी ७१” ऊँचे है| दर्शक के मन को प्रसन्नता से भर देनेवाले है| अनेक पूर्वाचार्य महर्षियों ने अपने ग्रंथो के मंगलाचरण के रूप में श्री शंखेश्वर पार्श्वप्रभु को याद किया है|💛

💚अजोड महिमावंत इस प्रतिमा का इतिहास भी रोमांचित कर देने वाला है|❤

❤जंबुद्वीप का यही भरत क्षेत्र !
गत उत्सर्पिणी काल में हुए नौवे तीर्थंकर परमात्मा दामोदर प्रभु का शासन |💚

💜एक बार अष्ट महाप्रातिहार्य और चौतीस अतिशयो से युक्त दामोदर परमात्मा पृथ्वीतल को पावन करते हुए एक नगर में पधारे|प्रभु के आगमन के साथ ही चारो निकाय के असंख्य देवताओं का आगमान हुआ…रत्न-सुवर्ण और राजमय गढ़ से मुक्त समवसरण की रचना हुई| प्रभु की देशना सुनने के लिए हजारो नर-नारी और पशु-पंखी भी समवसरण में पधारे|❤

💚प्रभु ने जगत के जीवों के उद्धार के लिए धर्म देशना दी| उस देशना को सुनकर हजारो आत्माओं में सम्यगज्ञान का प्रकाश पैदा हुआ…मिथ्यातत्व का अंधकार दूर हुआ|💜

💜उसी समय मानव-पर्षदा में रहे अषाढा श्रावक ने प्रभु को पूछा, “मुझे यह संसार अत्यंत ही भयंकर लग रहा है|
"हे प्रभो! मेरी आत्मा इस भव बंधन से कब मुक्त बनेगी ?”अषाढ़ी श्रावक के इस प्रश्न को सुनकर दामोदर परमात्मा ने कहा ” हे भाग्यशाली ! आगामी चौबिसी के तेविसवे पार्शवनाथ प्रभु के गणधर बनकर उसी भव में तुम मोक्ष में जाओगे |”❤

❤ प्रभु के मुख से अपने भावी मोक्ष को जानकार अषाढ़ी श्रावक का मन प्रसन्त्ता से भर आया| उसके अन्त्मर्ण में “पार्श्व प्रभु का नाम गूंजने लगा| उसने उसी दिन से पार्श्व प्रभु का नाम स्मरण द्वारा प्रभु की नाम-भक्ति चालु की…उसके बाद उसने पार्श्व प्रभु की प्रतिमा भरवाई और वह उसकी नियमित पूजा-भक्ति करने लगा|💛

💛 उसने जीवन पर्यंत पार्श्वप्रभु की खूब भक्ति की| आषाढ़ी श्रावक मरकर सौधर्म देवलोक में पैदा हुआ| उन्होने अवधिज्ञान द्वारा पूर्व भव में निर्मित पार्श्वप्रभु की प्रतिमा को देखा| वह देव उस प्रतिमा को देवलोक में ले गया| उस देवलोक में भी असंख्य वर्षो तक उस प्रतिमा की खूब पूजा भक्ति व् अर्चना की|💚

❤सौधर्म इंद्रने भी दीर्घकाल तक उसकी पूजा की … फिर सौधर्म इंद्र ने वह प्रतिमा ज्योतिष देवलोक के सूर्यदेव को प्रदान की| उसने भी दीर्घकाल तक उसकी पूजा भक्ति की| उसके बाद चन्द्र ने विमान में, फिर सौधर्म इर्शान व प्राणत देवलोक में दीर्घकाल तक पूजी गई| उसके बाद लवण समुद्र के अधिष्ठायाक वरुणदेव नागकुमार तथा भवनपति देवों ने पूजा भक्ति की|💜

💚एक बार , सेनपल्ली गाँव के पास कृष्ण वासुदेव और जरासंघ का भयंकर युद्ध हुआ| जरासंघ के पक्ष में अन्य सभी राजा थे जब की कृष्ण के पक्ष में ५६ कोटि यादव थे|
इस युद्ध में कृष्ण सैन्य के पराक्रम को देख जरासंघ ने कृष्ण के सैन्य पर जराविधा का प्रयोग किया| उस विधा के प्रयोग से कृष्ण का सैन्य व्याधि व् जरावस्था से पीड़ित होकर मुर्छित सा हो गया| मात्र कृष्ण बलदेव व नेमिकुमार पर इस विधा का प्रभाव नहीं पड़ा|अपने सैन्य की इस दुर्दशा को देखकर निराश हुए कृष्ण ने नेमिकुमार को जराविधा की युक्ति का उपाय पुछा|नेमिकुमार ने कहा “नागराज धर्णेन्द्र के पास रही प्रतिमा के न्ह्वनजल से तुम्हारे सैन्य की मुर्छा दूर हो जाएगी |”
श्री कृष्ण ने अट्टम तप किया| सैन्य के रक्षण की जवाबदारी नेमीकुमार ने ली| अट्टम के प्रभाव से धर्णेद्र ने पार्श्वप्रभु की प्रतिमा कृष्ण को प्रदान की| श्री कृष्ण खुश हो गए| पार्श्वप्रभु के न्ह्वनजल के छटकाव से कृष्ण का सैन्य पुन: जागृत हो गया| जरासंघ और कृष्ण के बीच पुन: युद्ध हुआ| उस युद्ध में कृष्ण की जय हुई|

युद्ध में विजय की प्राप्ति के प्रतिक रूप कृष्ण ने शंख बजाया| वहां पर शंखपुर नगर बसाया गया| उस गाँव में प्रभुजी का भव्य जिनालय तैयार कर उसमे प्रभुजी को बिराजमान किया गया|❤

💜उस गाँव के नाम से वे प्रभुजी शंखेश्वर पार्श्वनाथ के नाम से प्रख्यात हुए| लगभग ८६,५०० वर्ष से यह प्रतिमा यहाँ पूजी जा रही है|💛

❤१२वि.सदी में सिद्धराज के मंत्री सज्जन सेठ ने पू.आ. श्री देवचन्द्रसूरीजी म.सा. के उपदेश से इस तीर्थ का जिर्णोद्वार कर नया मंदिर बनवाकर वि.सं. ११५५ में शंखेश्वर पार्श्व प्रभु की प्रतिष्ठा कराई |💚

💜अनुमान है की वि.सं. १७६० में पुन: इस मंदिर का जिर्णोद्वार हुआ और विजयप्रभसूरीजी के वरद हस्ते से प्रतिष्ठा की गई|❤

❤वि.सं. १९६७ माघ शुक्ल पंचमी के दिन पांच प्रतिमाओं को छोड़ अन्य सभी देरियों की प्रतिष्ठा की गई| यहाँ पर लगे शिला लेखो में सबसे प्राचीन वि.सं. १११४ का व नविन लेख वि.सं. १९१६ का श्री शंखेश्वर पार्श्वप्रभु की प्रतिमा अत्यंत ही चमत्कारी व प्रभावशाली है |💛

💛प्रभु की महिमा अपरंपार है | बस, अटूट श्रद्धा और विश्वास चाहिए|💜

🙏💜जप और तप ये दोनों हमें मोक्ष के ध्वार ले जाते हे इस महा माया जाल से हमें छुटकारा दिलवाते हे तप में वह शक्ति हे जो अपनी आत्मा को सुध करती हे जप और तप के बिना यह मानव जिव अधूरा हे आप ने जो भी तप किया हे आप की अनुमोदन करता हु🙏❤💚🙏
इसी तरह आप भगवान महावीर के बताये हुए मार्ग पर चलते रहे और हमें भी मार्ग दर्शन करते रहे आप की चल रही तपस्या निर्विघ्न पूर्ण हो 🙏💜💛🙏

27/11/2025

श्री फलवृद्धि पार्श्वनाथ प्रभु जी, अंकित की ह्रदय आधार

तीर्थंकर बनने की प्रक्रिया :-वीश स्थानक विधिए तप करी,     ऐसी भावदया दिलमां धरी। जो होवे मुझ शक्ति इसी,      सवि जीव करु...
15/11/2025

तीर्थंकर बनने की प्रक्रिया :-

वीश स्थानक विधिए तप करी,
ऐसी भावदया दिलमां धरी।
जो होवे मुझ शक्ति इसी,
सवि जीव करुं शासन रसी ॥
शुचिरस ढलते तिहां बांधता,
तीर्थंकर नाम निकाचता ॥

स्नात्र पूजा की ढाल में पूज्य वीरविजयजी महाराज उपरोक्त पंक्तियों में बताते हैं कि जीव सम्यक्त्व प्राप्त करके आगे बढ़ता है और वीशस्थानक की आराधना करता है । साथ ही मन में जगत के सर्व जीवों के कल्याण की भाव दया का चिन्तन करता है और उसके आधार पर तीर्थंकर नामकर्म उपार्जित करता है। ये बीस स्थानक पद निम्न प्रकार हैं :
श्री बीसस्थानक यंत्र बीस स्थानक के २० पद :
(१) अरिहंत पद (२) सिद्ध पद (३) प्रवचन पद
-(४) आचार्य पद (५) स्थविर पद(६)दर्शन पद
(७) साधु पद (८) ज्ञान पद (९)उपाध्याय - पाठक पद
(१०) विनय पद (११) चारित्र पद (१२) ब्रह्मचर्य पद
(१३) क्रिया पद (१४) तप पद (१५) गोयम पद (दान)(१६) वैयावच्च पद (जिन) १७) संयम पद (१८) अभिनव ज्ञान पद(१९) श्रुतपद (२०) तीर्थ पद l

जिन शासन में जिस प्रकार नौ पद हैं, उसी प्रकार ये २० पद हैं । इन्हीं २० पदों की आराधना करके तीर्थंकर पद उपार्जीत किया जाता है ।

त्रिषष्ठि शलाका पुरुष चरित्र के महान् ग्रंथ में हेमचन्द्राचार्य महाराज इन बीसों ही पदों की आराधना करके तीर्थंकर नाम कर्मोपार्जन करने का फरमाते हैं । दूसरी और इन २० पदों में से किसी एक पद की आराधना करके भी तीर्थंकर नाम कर्म उपार्जित कर अरिहंत बनकर अनेक जीव मोक्ष में गए हैं। दोनों ही नियम प्रचलित हैं

श्री लक्ष्मीसूरी महाराज कृत बीस स्थानक की पूजा में बीस स्थानक पदों में से एक एक पद की आराधना करके कौन कौन मोक्ष में गए हैं, उनकी नाम सूची इस प्रकार दी गई हैं :
(१) अरिहंत पद की आराधना करके देवपाल राजा तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं ।

(२) सिद्ध पद की आराधना करके हस्तिपाल राजा तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

(३) प्रवचन पद की आराधना करके जिनदत्त सेठ तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

(४) आचार्य पद की आराधना करके पुरुषोत्तम राजा तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं l

(५) स्थविर पद की आराधना करके पद्मोत्तर राजा तीर्थकर नाम कर्म बाँधते हैं।

(६) उपाध्याय पद की आराधना करके महेन्द्रपाल राजा तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं ।

(७) साधु पद की आराधना करके वीरभद्र तीर्थंकर नाम कर्म बांधते हैं।

(८) ज्ञान पद की आराधना करके जयन्तदेव तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

( ९ ) सम्यग्दर्शन पद की आराधना करके हरिविक्रमराजा तीर्थकर नाम कर्म बाँधते हैं ।

(१०) विनय पद की आराधना करके धनसेठ तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

(११) आवश्यक चारित्र पद की आराधना करके अरुण देवं तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

(१२) ब्रह्मचर्य पद की आराधना करके चन्द्रवर्मा तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं ।

(१३) क्रिया पद की आराधना करके हरिवाहन तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं ।

(१४) तप पद की आराधना करके कनककेतु राजा तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

(१५) सुपात्रदान पद (गोयम पद) की आराधना करके हरिवाहन राजा तीर्थंकर नामकर्म बाँधते हैं।

(१६) वैयावच्च पद (जिन पद) की आराधना करके जिमितकेतु तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

(१७) संयम पद की आराधना करके पुरंदर राजा तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं ।

(१८) अभिनव ज्ञानपद की आराधना करके सागरचन्द्र तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

(१९) श्रुतपद की आराधना करके रत्नचूड तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

(२०) तीर्थ पद की आराधना करके मेरु प्रभुसूरि तीर्थंकर नाम कर्म बाँधते हैं।

इस प्रकार २० पदों में से एक - एक पद की आराधना करने वाले ये बीस महात्मागण थे इन्होंने एक - एक पद की आराधना की तीर्थंकर नाम कर्म उपार्जित किया और महाविदेहक्षेत्र में तीर्थंकर बनकर मोक्ष में गए ।

13/11/2025

‼️जालोर जिनालय में चोरी...सभी मूर्तियाँ हिलाई गईं.....
‼️जालोर जिनालय में चोरी...सभी मूर्तियाँ हिलाई गईं.....
मूर्ति के नीचे का गुप्त भंडार तोड़ा गया और सोने चाँदी के सिक्के, रत्न..माणिक रत्न...की चोरी हो गई ...लगभग...सौ साल पुराना मंदिर...में चोरी..

12/11/2025

नूतन पन्यास प्रवर श्री श्रुतरत्न गणी विजयजी

03/11/2025

Delhi’s sacred heart - Vigyan Bhavan - will soon echo with the light of Tapasya.✨

On 8th and 9th November 2025, the world will witness Pujya Divyatapasvi Acharya Hansratnasurishwarji Maharaj’s 8th 180 Upvaas completion. Be part of the moment that will mark history once again.

🗓️8th November – Anumodna Mahotsav
🗓️9th November – Parna Mahotsav

02/11/2025

174 उपवास आज 180 उपवास की तरफ परम पूज्य गुरुदेव तपस्वी महाराजा

अष्ट मंगलकारी ,प्रगट प्रभावी, प्रत्यक्षकारी अधिकार कल्पतरु दादा गुरुदेव श्री जिन कुशल सूरी जी 🙏
29/10/2025

अष्ट मंगलकारी ,प्रगट प्रभावी, प्रत्यक्षकारी अधिकार कल्पतरु दादा गुरुदेव श्री जिन कुशल सूरी जी 🙏

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