Pushpendra Kumar

Pushpendra Kumar हक के लिए

27/02/2024

🎱
*AADHAAR* is linked to *PAN*
*AADHAAR* is linked to *Bank Account*
*AADHAAR* is linked to *LPG Connection*
*AADHAAR* is linked to *Social Benefit Schemes*

Ever wondered why
*AADHAAR is not linked to Voter ID Card (EPIC)?*

*Why don't they link Adhar with EVM,*

so that anyone will be able to vote if his Finger Print matches only. By this way we can Avoid False Voting.

that's Hypocrisy of Political Parties.

*1.. All their dead voters will not be able to vote.*

*2.. Spurious voting will be eliminated with biometrics*

*3.. Duplicate/triplicate voter ids will disappear.*

*4.. Illegal migrants can't vote.*

*5.. Maoists who don't have AADHAAR cards can't vote.*

*6.. Kashmiri separatists who don't want to be Indian citizens can't vote.....*

*7.. Anyone can vote anywhere.*

So many benefits.... real *Swachh Bharat* can begin there with Cleansing of Electoral System.

Just linking AADHAAR to EVM & Voter ID, Bogus voting will be Eliminated.

But you won't see it happen !

Will any Govt accept this?

As a Responsible Citizen of India , being unbiased to any Political Party of Interest , We should Demand from Govt of India to Link Voter ID to AADHAAR Immediately !!

*Please Share this as much as possible, to Spread the Message*
🙏🙏🙏

भाजपा प्रवक्ता सुधांशु जी ने तुलसीदास शुक्ला स्टाइल में एक दोहे की नीव रखी है.
27/02/2024

भाजपा प्रवक्ता सुधांशु जी ने तुलसीदास शुक्ला स्टाइल में एक दोहे की नीव रखी है.

27/02/2024

कल हमारे मुख्य-सेवक जी समुद्र में डूबी द्वारका जी के दर्शन करने गये। बाहर निकले तो बड़े प्रसन्न थे। बताये कि जब समुद्र में थे तो उनके कान में कृष्ण जी की मुरली गूँज रही थी, बहुत दिव्य अनुभव था, वगैरह-वगैरह।

अब आपने अगर वो विडियो देखा हो तो क्या अपने मन में सोचा कि जब द्वारका जी की इतनी भव्य तस्वीरें इन्टरनेट पर घूमती रहती हैं, जिन तस्वीरों में – द्वार पर रखी शेर की मूर्ति, भव्य सीढियां एवं भवन अवशेष, बड़े-बड़े खम्बे – दिखाए जाते हैं तो हमारे मुखिया जी प्राचीनकाल में जहाजों द्वारा समुद्र के किनारे लंगर डालने के लिए प्रयोग किये जाने वाले “एंकर” पर बैठ कर पूजा कर के क्यों आ गये? द्वारका की कोई खिड़की, दरवाजे, चबूतरे या खम्बे आदि का फोटो तो डाले ही नहीं?
अब आप इस पोस्ट को आगे तभी पढ़ें, जब यह जानना चाहें कि मिथ्या प्रचार से कैसे एक पूरी पीढ़ी को मूर्ख बनाया जाता है। और अगर सत्य की खोज से आपकी भावना आहत हो जाती हो, तो क्षमा चाहूँगा, यह पोस्ट आपके लिए नहीं है।
तो हुआ यूँ कि पिछली शताब्दी में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो तथा सिन्धु घाटी सभ्यता के विभिन्न केन्द्रों की सफल खोज के बाद ब्रिटिश पुरातात्विक लोग बुद्धिस्ट ग्रंथों में वर्णित “द्वारवती” को ढूंढ रहे थे, जो प्राचीन समय का एक प्रमुख बंदरगाह बताया जाता था। यही द्वारवती आगे चल कर द्वारका के नाम से बुलाया जाने लगा। एक ब्रिटिश स्कॉलर “फेड्रिक पर्गीटर” ने 1930’s के दशक में द्वारवती के गुजरात में होने की संभावना जताई। 1963 में समुद्र में डूबे इस ढाँचे का पता चला और अगले कुछ दशकों में इस ढांचे को समझने के लिए कई समुद्री खोज अभियान चलाये गये।
मैंने इस सम्बन्ध में निष्पक्ष पड़ताल के लिए भारतीय सामुद्रिक संस्थान के तीन परंपरावादी दृष्टिकोण रखने वाले वैज्ञानिकों (AS Gaur, Sundresh, Sila Tripathi) के ही शोधपत्र को पढने का फैसला किया। उससे मुझे यह पता चला कि इस साईट पर औसतन 3 से 10 मीटर की गहराई पर लंगर के लिए प्रयोग होने वाले सैकड़ों एंकर मिले हैं। गोल, त्रिभुजाकार अथवा आयताकार शेप्स में मौजूद पत्थर के बने इन लंगरों का औसत आकार एक से डेढ़ मीटर और औसत वजन 100-150 किलो है। सबसे बड़े एंकर का वजन 500 किलो है, जो किसी बड़ी नौका के लिए इस्तेमाल होता होगा। साइट्स से अन्य खम्बों के अवशेष भी मिले हैं, जो नावों की रस्सी बाँधने के लिए इस्तेमाल किये जाते थे। पत्थरों की बनावट आदि का ऐतिहासिक अध्ययन कर वैज्ञानिकों ने उनकी आयु 500 से 1000 साल तय की है। और तो और, कुछ पत्थरों पर गुजराती लिपि में कुछ विवरण दर्ज हैं, वही गुजराती, जो 12वीं शताब्दी में अस्तित्व में आई है। अब ये तो कोई मंदबुद्धि ही होगा, जो कहे कि कृष्ण जी 5000 साल पहले गुजराती बोलते थे।
बस ऐसे ही विवरण हैं, जिनके आधार पर वैज्ञानिकों ने इस ढांचे को एक मध्यकालीन बंदरगाह माना है। तो इस पूरे विवरण में श्रीकृष्ण-महाभारत-द्वारका कहाँ हैं? उत्तर है – कहीं भी नहीं!!
ऐसी खोजों में चलन यह होता है कि पहले किसी स्थान का पौराणिक इतिहास अथवा किवदंतियों में प्रचलित विवरण बताया जाता है, फिर उसका ऐतिहासिक विवरण, फिर वैज्ञानिक पक्ष की बात की जाती है। यूनेस्को की साईट से लेकर ऐसे सभी शोधपत्रों में इसी परिपाटी का पालन किया जाता है। भगत लोग पूरा रिसर्च पढ़ते नहीं, बस शुरू में दिए गये “ऐसा माना जाता है” विवरण को पढकर हर्षोउल्लासित हो जाते हैं, और फर्जी खबर तैयार करने में जुट जाते हैं। ............. द्वारका के नाम पर घूम रही जिन भव्य तस्वीरों को आप देखते हैं, वे भी वास्तव में अमेरिका के फ्लोरिडा में मौजूद अंडरवाटर “नेपच्यून मेमोरियल रीफ” की हैं, जो किसी फुरसतिये ने वायरल कर दी, और सभी उसी को साझा कर “द्वारका मिल गयी” का शिगूफा फैलाने में लगे हैं।
मैं सोचता हूँ कि भारत में इतने पढे-लिखे लोग हैं, किसी ने मुख्य-सेवक जी को बताया नहीं होगा कि जहाँ आप जा रहे हैं, वहां ऐसा कुछ मिला ही नहीं है। खैर, बताया भी हो तो क्या... जब एक पूरी पीढ़ी सामूहिक भ्रम की पुडिया चाट कर छद्मगौरव से आनंदित है, तो देश के सर्वेसर्वाओं को सयानापन दिखाने की आवश्यकता ही क्या शेष रह जाती है।
बहरहाल...
उपसंहार:
1. समुद्र में जो ढांचा मिला है, वो द्वारका वास्तव में एक मध्ययुगीन बंदरगाह है। महाभारत वाली द्वारका की खोज अभी बाकी है।
2. इस उम्र में समुद्र में 4-5 मीटर उतर कर स्कूबा डाइविंग करना कोई मजाक है क्या? हमारे मुख्य-सेवक जी सच्चे अर्थों में महामानव हैं। उनको शतशत नमन!

(साझा करने के लिए इजाजत की जरुरत नहीं है)

विजय सिंह ठकुराय

08/03/2023

Rajkumar bhati ji ki wall se साभार
मेघालय में आखिर भाजपा की सरकार बन गई l मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा शामिल हुए l तीनों फूलकर कुप्पा हुए जा रहे हैं कि देखो नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, अमित शाह की चाणक्य नीति और जेपी नड्डा के कुशल नेतृत्व का परिणाम है कि आज मेघालय में भाजपा की सरकार है l
आप पूछेंगे कि मुख्यमंत्री कौन बने हैं ? मुख्यमंत्री बने हैं कानराड संगमा l जी हां वही कानराड संगमा जिनके लिए मोदी और अमित शाह चुनाव प्रचार की रैलियों में यह कहते घूम रहे थे कि ये देश के सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री हैं और मेघालय की सरकार सबसे भ्रष्ट सरकार है l विधानसभा चुनाव में मेघालय की सभी 60 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने प्रत्याशी खड़े किए थे जिनमें से 58 हार गए l केवल 2 प्रत्याशी जीते l यह इसके बावजूद था कि पार्टी ने प्रचार में पूरी ताकत झोंकी I प्रधानमंत्री और गृहमंत्री तक ने जाकर वोट मांगे I और मेघालय के भाजपा अध्यक्ष ने यहां तक ऐलान कर दिया कि मेघालय में गोमांस की सप्लाई में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी I
भाजपा के केवल 2 विधायक जीते l कानराड संगमा की पार्टी को दोबारा पूर्ण बहुमत मिल गया l भाजपा झट से उस मुख्यमंत्री की सरकार में शामिल हो गई जिसे देश का सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री बता रही थी l अब भाजपा को यह तसल्ली है कि कम से कम मेघालय में भी उनकी सरकार है l आप इसे सत्ता लोलुपता कहें I बेशर्मी कहें, या राजनीति का पतन I वह आपकी मर्जी है l

21/11/2022

कथित कृषि कानूनों पर सरकार द्वारा कानून वापस लिए जाने के बाद भी सरकार द्वारा पोषित अथवा सरकार के हितेषी किसान संगठन या यूं कहें कि नकली किसान संगठन अभी भी किसानों को गुमराह करने का प्रयास करते हुए कह रहे हैं कि वह कृषि कानून तो किसानों के हक में थे । यह एक ऐसा प्रोपगंडा है जो किसानों की एकता से घबराकर सरकार के समर्थकों द्वारा चलाया जा रहा है जो कि बिल्कुल अनैतिक है ।
वास्तव में तो उन कानूनों को कृषि कानून कहना ही किसानों के साथ एक छल के अतिरिक्त कुछ भी नही है । ये कहीं से भी कृषि अथवा किसानों को लाभ पहुंचाने वाले नही हो सकते , अलबत्ता बड़े पूंजीपतियों और व्यापारियों को जरूर लाभ पहुंचाते ।
कानूनों के समर्थक सबसे तो पहले यह आरोप लगाते हैं कि *संयुक्त किसान मोर्चा* द्वारा संचालित आंदोलन हरियाणा पंजाब के आढ़तियों एवं खालिस्तान समर्थक लॉबी द्वारा चलाया जा रहा था । यह सत्य है कि इस आंदोलन का प्रारंभ हरियाणा पंजाब से ही हुआ परंतु कालांतर में यह राष्ट्रव्यापी हो गया और देश के सैंकड़ों किसान संगठन इससे जुड़े । यह इस सरकार का चलन बन चुका है कि प्रत्येक आंदोलन को किसी ना किसी तरीके से राष्ट्रविरोधी घोषित करो । कभी किसी को आंदोलनजीवी कहते हैं तो किसी को खालिस्तानी । यकीन मानिए अगर इस आंदोलन के प्रारंभ में इस आंदोलन से मुस्लिम किसान अधिकता में जुड़ता तो निश्चित रूप से यह आंदोलन पाकिस्तान समर्थक कहा जाता ।
कथित कृषि कानूनों का समर्थन करते वक्त ये लोग भूल जाते हैं कि देश के अर्थशास्त्रियों , बुद्धिनीवियों , कृषि के आर्थिक पहलुओं के जानकार आदि सभी ने इन कानूनों को किसानों के ताबूत की संज्ञा दी थी । हालांकि इन कानूनों पर अब बात करने की आवश्यकता नहीं है , हमारा संघर्ष अब सरकार द्वारा किए गए वायदों को पूरा करवाने को लेकर है , लेकिन फिर भी अगर इन कानूनों पर पुनः नजर डालें तो बिंदुवार निम्न लघु विश्लेषण काफी होगा ।

1---- इन कानूनों के अनुसार 1955 ई में पास हए आवश्यक वस्तु कानून को रद्द कर दिया जाता । जबकि यह कानून आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी , काला बाजारी और मूल्य नियंत्रण हेतु एक बहुत जरूरी उपाय है । इस कानून की भूमिका में ही लिखा गया था कि *यह कानून आम जनता के हितों को रखवाली और आवश्यक वस्तुओं की पैदावार , वितरण और आपूर्ति संबंधी व्यापार व वाणिज्य को नियंत्रित करने के लिए बनाया जा रहा है*। इस कानून की धारा 3 सरकार को अधिकार देती है कि *किसी जरूरी वस्तु, जिसकी बाजार को जरूरत है, को रोक कर रखने को पाबंद किया जाए* साथ ही *सरकार किसी व्यापारी को जिसने जरूरी वस्तु थोक में रखी हुई है और आम जनता को उसकी जरूरत है तो कंट्रोल आर्डर करके उसको बेचने या वितरित करने का आदेश दे सकती है*।
अब बताइए कि इस कानून को समाप्त करने से किसानों को क्या लाभ हुआ ? ये किसानी खेती से संबंधित है ही नही , ना जाने क्यों इस संशोधन को कृषि कानून कहा गया ? इस कानून के विश्लेषण से साबित होता है कि इस कानून से व्यापारियों और जमाखोरों को खुली छूट दे दी जाती , व्यापारी पर आवश्यक वस्तुओं के असीमित भंडारण पर कोई रोक ना रह जाती , व्यापारियों और कालाबाजारी करने वालों पर ना कोई पाबंदी लग सकती और ना ही उनके विरुद्ध कोई नियंत्रण आदेश जारी हो सकता । कहा जा सकता है कि *यह कानून कृषि कानून कहकर जमाखोरों को लाभ पहुंचाने की साजिश भर है* ।

2------ ये कानून कहता है कि अब किसान अपनी उपज को मंडी से बाहर कहीं भी बेचने के लिए आजाद है , सरकार की ओर से कहा गया कि यह किसान की आजादी का फरमान है । जबकि असल में व्यापारी को यह छूट दी गई है कि वो मंडी से बाहर कहीं से भी किसान से अपनी मनमर्जी के दामों पर ( क्योंकि मंडी में एम एस पी का दबाव रहता) खरीद कर सकता है । इस कानून के अनुसार बड़े व्यापारियों को खुलकर खेलने की छूट है । हमारा सवाल है कि *एम एस पी की कानूनी गारंटी* के अभाव में यह कानून किसान अपनी उपज को व्यापारी द्वारा तय किए गए मनमाने दामों पर बेचने पर मजबूर ही करेगा । यह कानून किसान सबलीकरण नही बल्कि व्यापारी को और सबल करेगा । इस एक्ट की धारा 2(अ) में व्यापारी को छूट दी गई थी कि *वह दूर किसी अन्य राज्य अथवा देश में बैठा ऑनलाइन या अपने प्रतिनिधि के द्वारा किसान से फसल खरीद सकता है और दूसरे राज्यों में ले जा सकता है या किसी अन्य देश में निर्यात कर सकता है । उस पर फसल मूल्य संबंधी कोई पाबंदी लागू नहीं होगी*।
यह कानून मंडियों को समाप्त करने की साजिश करता है और किसानों को बड़े व्यापारियों के रहमो करम पर छोड़ देता है । यदि मौजूदा मंडी प्रणाली कमजोर होती है तो बतौर खरीदार सरकार एक ओर खड़ी हो जाएगी और खरीददार के रूप में एकमात्र खरीददार इलेक्ट्रॉनिक विधि से या खेत में जाकर या मंडी से बाहर खरीदने वाला व्यापारी रह जाएगा । प्रश्न उठना है कि जो फसल उस व्यापारी को पसंद नही आयेगी उसे कौन खरीदेगा । अस्तु यह किसान की आजादी नहीं गुलामी का फरमान था ।

3----- कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर सरकारी किसान संगठनों द्वारा दावे किए जाते हैं कि इस कानून से किसान समृद्ध हो जाते । अरे भाई भारत में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग तो पहले से चल रही है जिसे हम *बटाई* पर खेती करना कहते हैं । फर्क यह है कि हमारी बटाई प्रणाली भूस्वामी और बटाईदार दोनो को आजाद रखती है जबकि सरकारी कानून सिर्फ व्यापारी को आजाद रखता है ।
कांट्रेक्ट फार्मिंग से संबंधित इस कानून की धारा 2 में कानून कहता है कि *किसान को बीज, कृषि रसायन , मशीनरी, तकनीकी, उर्वरक आदि वस्तुएं सिर्फ व्यापारी उपलब्ध कराएगा जिसके लिए वह व्यापारी केंद्र सरकार या राज्य सरकार की ओर से चलाई जा रही किसी वित्तीय योजना के तहत कर्ज ले सकेगा । यहां यह भी देखना होगा कि व्यापारी की ओर से कर्ज अदायगी ना होने की स्थिति में वह कर्ज किसान से वसूला जाएगा । जिस जमीन के लिए कर्ज लिया गया है वह जमीन बेची भी जा सकती है ।
कानून के अनुसार किसान और व्यापारी के बीच हुए सहमति पत्र में फसल की वांछित का भी उल्लेख होगा । अर्थात किसी भी वजह फसल की गुणवत्ता में कमी होने पर व्यापारी उपज खरीदने से मना कर सकेगा । माने यदि किसी आलू उत्पादक किसान से एग्रीमेंट होता है कि 3 इंच से लेकर 5 इंच आकार का आलू व्यापारी खरीदेगा , तो अगर व्यापारी द्वारा बीज खराब दिया गया या अन्य किसी कारण से आलू का आकार पौने तीन इंच रह गया तो उस आलू को कौन खरीदेगा ? ऐसी स्थिति में किसान उस कर्ज को कैसे लौटाएगा जो उसने नही बल्कि व्यापारी ने लिया था । ऊपर से व्यापारी को इन सब जिम्मेदारियों से मुक्त रखा गया है । किसान व्यापारी और उसके बीच किसी भी विवाद या वादा खिलाफी के खिलाफ अगर किसान अदालत में जाना चाहे तो कानूनानुसार कोर्ट द्वारा दी गई डिक्री उसी अदालत में लागू होगी जहां व्यापारी रहता है । अर्थात अगर मुंबई में रहने वाला कोई व्यापारी हिमाचल के किसी सेब उत्पादन करने वाले किसान से एग्री कॉन्ट्रैक्ट करता है और उसे पूरा नहीं करता तो किसान को उसके खिलाफ मुंबई अदालत में ही जाना पड़ेगा ।
इस पर भी जो लोग यह कहते हैं कि ये कानून किसान के हित में थे तो उनकी बुद्धि पर तरस खाने के सिवा हम कर ही क्या सकते हैं ।

इन कानूनों को वापस लेते समय घुटनो पर आई सरकार ने किसानों जो वायदे किए थे वह अब सिलसिलेवार उनसे मुकरने का मन बना चुकी है । इसी लिए वह अब छद्म किसान संगठनों को आगे कर रही है । आंदोलन स्थगन के बाद मुद्दों को सुलझाने हेतु बनी कमेटी को जो विचार बिंदु दिए गए थे उनमें किसानों से हुए वायदे में एम एस पी गारंटी कानून की बात है ही नही जो कि प्रारंभ के दिन से ही संयुक्त किसान मोर्चा की मांग रही है । जब तक एम एस पी लागू करने की कानूनी बाध्यता नहीं होगी तब तक यह घोषणा बेकार है कि एम एस पी थी है और रहेगी । इस मांग के विरोध में कोई भी आवाज किसानों की आवाज नही हो सकती ,हां किसानी की आवाज की दलाली की फुसफुसाहट जरूर हो सकती है । इस फुसफुसाहटों से सावधान हो जाने की जरूरत है ।

28/06/2022

*अग्निपथ योजना को लेकर सरकार और उसके समर्थकों द्वारा फैलाए जा रहे झूठ और उनका सच*

*पहला झूठ :* अग्निपथ योजना हमारी सेना को पहले से ज्यादा युवा और मजबूत बनाने के लिए लाई गई है।
*सच :* उम्र तो बहाना है, असली बात खर्च घटाना है। हमारी सेना बूढ़ों की नहीं, जवानों की है। इसीलिए सिर्फ 15 साल की सेवा के बाद जवान को 32 से 35 साल की उम्र में रिटायर कर दिया जाता है। इस बीच हर साल उसकी ताकत, फुर्ती और सहनशक्ति टैस्ट की जाती हैं। वैसे कुछ समय पहले तो सेनाध्यक्ष रावत रिटायरमैंट की उम्र बढ़ाने की बात कर रहे थे, अब अचानक उम्र घटाने की चिंता कैसे? यूं भी अगर औसत उम्र घटानी ही थी तो पक्की नौकरी की अवधि 2-3 साल घटाई जा सकती थी। अचानक सिर्फ 4 साल की कच्ची नौकरी में बदलने की क्या जरूरत थी?

*दूसरा झूठ :* अग्निपथ योजना से सेना की तकनीकी क्षमता बढ़ेगी।
*सच :* तकनीकी रूप से सक्षम होने के लिए लम्बी ट्रेनिंग की जरूरत होगी। 10वीं पास जवान को सिर्फ 4 साल के लिए भर्ती करने से तकनीकी क्षमता कैसे बढ़ेगी? इतने समय में अग्निवीर राइफल चलाना तो सीख लेगा, लेकिन आधुनिक तोप और मिसाइल दागने, टैंक चलाने या फिर नौसेना और एयरफोर्स की मशीन में महारत कैसे हासिल होगी?

*तीसरा झूठ :* इस योजना से युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलेगा।
*सच :* दरअसल रोजगार के अवसर कम होंगे। अब तक हर साल सेना में 50 से 80 हजार सीधे पक्की भर्तियां होती थीं, अग्निपथ योजना से उन्हें खत्म कर दिया गया है। अब आगे से सेना में डायरैक्ट पक्की भर्ती नहीं होगी। पिछले 2 साल में जो भर्तियां अधूरी थीं, उन्हें भी रद्द कर दिया गया है। उसके बदले हर साल 45 से 50 हजार कॉन्ट्रैक्ट की भर्तियां होंगी। उनमें से एक चौथाई यानी लगभग 12,000 जवानों को हर साल पक्की नौकरी मिलेगी। अगर हर साल एक लाख अग्निवीर भी भर्ती कर लिए जाएं, तब भी अगले 15 साल में भारतीय सेना में कुल नियमित सैनिकों की संख्या 12 लाख से घटकर 4 लाख या और कम हो जाएगी।

*चौथा झूठ :* इस योजना में भर्ती होने वाले अग्निवीरों को बहुत फायदे होंगे... वेतन मिलेगा, बचत होगी और स्थायी नौकरी के मौके मिलेंगे।
*सच :* 4 साल की किसी भी नौकरी से कुछ न कुछ फायदा तो होगा ही। सवाल यह है कि क्या पक्की नौकरी में जो वेतन, भत्ते, पैंशन, ग्रैच्युटी और ट्रेनिंग मिलती है, उससे बेहतर 4 साल की कच्ची नौकरी से मिलेगी? 4 साल बाद पक्की सरकारी या प्राइवेट नौकरी की सब बातें झांसा हैं। सच यह है कि सरकार 15-20 साल की नौकरी करने वाले पूर्व सैनिकों को भी नौकरी नहीं दे पाई है। कुल 5,69,404 पूर्व सैनिकों ने नौकरी के लिए पंजीकरण कराया था, जिनमें से मात्र 14,155 (यानी मात्र 2.5 प्रतिशत) को सरकारी, अर्धसरकारी, निजी क्षेत्र में रोजगार मिल पाया। ऐसे में अग्निवीर को नौकरी दिलवाने की बात सिर्फ जुमला है।

*पांचवां झूठ :* इस योजना से नई पीढ़ी के लगभग सभी युवाओं को देशसेवा का मौका मिलेगा, सब में देशभक्ति का जज्बा पैदा होगा।
*सच :* भारत में ‘देशप्रेम’ और बेरोजगारी दोनों इतनी अधिक हैं कि यहां सेना में भर्ती होने के लिए लाखों युवा हमेशा खड़े मिलते हैं। हमारे देश में साढ़े 17 से 21 वर्ष की आयु के लगभग 12 करोड़ युवा हैं। हर वर्ष अढ़ाई करोड़ युवा (सवा करोड़ लड़के) अग्निवीर के आयु वर्ग में प्रवेश करेंगे। जाहिर है इनमें से 1 प्रतिशत को भी कभी अग्निवीर बनने का मौका नहीं मिलेगा।

*छठा झूठ :* दुनिया के कई देशों में सेना में अल्पकालिक भर्ती होती है। हमारे यहां भी सेना में अफसरों की भर्ती में 5 साल का शार्ट सर्विस कमीशन है।
*सच :* छोटे देशों से हमारी तुलना बेतुकी है। इसराईल जैसे देशों में सैन्य भर्ती अनिवार्य है, नहीं तो उन्हें सेना में भर्ती के लिए युवा नहीं मिलते। अनिवार्य सेवा 2-4 साल से ज्यादा नहीं करवाई जा सकती। वैसे भी इन देशों में अल्पकालिक भर्ती के अलावा डायरैक्ट पक्की भर्ती भी होती है। अग्निपथ योजना में इसे बंद किया जा रहा है। इसी तरह शार्ट सर्विस कमीशन योजना अफसर रैंक के लिए अच्छे उम्मीदवारों की कमी को पूरा करने के लिए थी। उस योजना के कारण कभी भी सेना में अफसरों की डायरैक्ट और पक्की भर्ती रोकी नहीं गई।

*सातवां झूठ :* कारगिल युद्ध के बाद बनी रिव्यू कमेटी और कई विशेषज्ञों ने इसकी सिफारिश की थी।
*सच :* कारगिल समिति ने कहीं यह नहीं कहा कि 4 साल के लिए कॉन्ट्रैक्ट की नियुक्तियां की जानी चाहिएं। समिति ने यह सलाह दी थी कि जवानों को शुरू के 7-10 वर्षों में सेना में नियुक्त किया जाना चाहिए, उसके बाद उन्हें अन्य बलों, जैसे सी.आई.एस.एफ., बी.एस.एफ. आदि में स्थानांतरित किया जा सकता है। पक्की नौकरी खत्म कर कॉन्ट्रैक्ट की बात किसी समिति या विशेषज्ञ ने नहीं की। इस योजना को संसद या संसद की रक्षा मामले की स्थायी समिति के सामने कभी पेश भी नहीं किया गया।

*आठवां झूठ :* थल सेना, नौसेना और वायु सेना के प्रमुख इस योजना का समर्थन कर रहे हैं।
*सच :* उनके पास सरकार की हां में हां मिलाने के सिवा और रास्ता क्या है? अगर अनुभवी देशभक्त सैनिकों के मन की बात सुननी है तो रिटायर्ड सेना अधिकारियों, पूर्व जनरल और परमवीर चक्र विजेता बाना सिंह और योगेंद्र सिंह जैसी आवाजों को सुनना चाहिए।

*नौवां झूठ :* अग्निवीर योजना को युवाओं का समर्थन है, वे इसके लिए रजिस्ट्रेशन करवाने को तैयार बैठे हैं।
सच : इस देश में बेरोजगारी की ऐसी हालत है कि आप 4 साल छोड़ो, 4 महीने की नौकरी भी दोगे तो हर पोस्ट के लिए सैंकड़ों उम्मीदवार खड़े मिलेंगे। यहां चपरासी की नौकरी के लिए पीएच.डी. वाले अप्लाई करते हैं। इससे युवाओं की मजबूरी साबित होती है, योजना की मजबूती नहीं।

*दसवां झूठ :* सरकार के खजाने पर पैंशन और वेतन का बोझ कम होगा।
*सच :* असली बात यही है। यह सच है कि रक्षा बजट का लगभग 40 प्रतिशत वेतन और पैंशन में चला जाता है, लेकिन इसका समाधान यह नहीं कि हम डायरैक्ट और पक्की भर्ती ही रोक दें, सेनाबल की संख्या आधी कर दें। समाधान यह होगा कि रक्षा बजट को बढ़ाया जाए। लेकिन मोदी सरकार ने रक्षा बजट को 2017-18 में केंद्र सरकार के खर्च के 17.8 प्रतिशत से घटाकर 2020-21 में 13.2 प्रतिशत कर दिया। समाधान यह भी हो सकता था कि रक्षा बजट में गैर सैनिक (सिविलियन) कर्मचारियों के वेतन और पैंशन में कमी की जाए। सैनिकों की सेवानिवृत्ति की आयु और पैंशन राशियों पर भी विचार हो सकता था, लेकिन एक झटके में पैंशनधारी नौकरियों को ही खत्म कर देना तो देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। क्या आज के हालात में हम देश की सुरक्षा में कंजूसी कर सकते हैं ?

16/04/2022

आज किसी ने पूछा कि संघ और भाजपा वाले मात्रा सत्ता प्राप्ति के लिए साम्प्रदायिक वितृष्णा बढ़ाने वाले कार्य क्यों करते हैं ?
क्या सच में ?
जी नही ये तो इससे बहुत आगे की यानि सत्ता पर चुनौती विहीन लंबे समय तक काबिज रहने की योजना पर कार्य कर रहे हैं चाहे इसमें भारत राष्ट्र का कितना भी नुकसान क्यों ना हो जाये ।
भाजपा भारत की पूरी युवा पीढी को बर्बाद कर रही हैं,भारत के युवा को मुसलमानों ईसाईयों , दलितों , आदिवासियों से नफरत करने वाला बनाया जा रहा है । एक राष्ट्र के स्वरूप नष्ट करने का अपराध संघ और भाजपा कर रहे हैं ।
हमारे पूर्वज सपना देखते थे कि भारत का युवा जाति-पाति मुक्त, साम्प्रदायिकता मुक्त , वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्त , समता मूलक , समाजवादी , पंथ निरपेक्ष भारत का निर्माण करेगा जिसमें लिंग, जाति , धन , धर्म , पेशे के आधार पर कोई भेदभाव नही रहेगा ।
लेकिन सत्ता के लिए भाजपा ने भारत के युवा वर्ग को निशाना बनाना शुरू कर दिया है , आई टी सेल के द्वारा चलाई जाने वाली शोशल मीडिया यूनिवर्सिटी द्वारा युवाओं को अज्ञान के अंधेरे कुवें में धकेला जा रहा है , नवीन ज्ञान से दूर कर अन्धविश्वाश के भंवर में फंसाया जा रहा है । उनकी विचार शक्ति पर आघात कर उन्हें धर्म के पाखण्डों में लिप्त होने की प्रेरणा दी जा रही है ।

अब भाजपा ज्ञान के केंद्रों विश्वविद्यालयों को अपने हसाब से चलाने की कोशिशें कर रही है ताकि युवा सिर्फ साम्प्रदायिकता फैलाने वाले विषय पढ़ें, विज्ञान ,तर्क शास्त्र , राजनीति शास्त्र, दर्शन शास्त्र, इतिहास न पढ़ें, ताकि भाजपा के झूठ के ज़हर को चुनौती न मिल सके, और सत्ता इनके हाथ में ही रहे ।
भाजपा भारत को चौदहवीं शताब्दी में ले जाने की तैयारी में है क्योंकि वंही से तथाकथित विश्व गुरु का परचम लहराया जा सकता है ।

सोचना आपको है कि आपको कौनसा भारत चाहिए । चौदहवीं सदी का भारत या इक्कीसवीं सदी का भारत ।

09/04/2022

भाजपा सरकार की कितनी भी आलोचना कर लो पर एक विशेषता की ह्रदय से प्रशंसा करता हूँ ।
वह विशेषता है " भारत के आम जनमानस से विचार बिंदुओं का सफल प्रतिस्थापन " ।
जिन बिंदुओं और मुद्दों पर एक विचारवान और स्वतंत्र जनता का उद्देलित होना लाजमी समझा जाता था वो अब नेपथ्य में चले गए हैं ।
अब हम इस बात पर चिंतित नही होते कि महंगाई आसमान छू रही है, निम्न मध्यम वर्ग का जीना दुश्वार हो चला है । अभी NDTV पर एक हरियाणा के भाई का इंटरव्यू देखा , वो साहब ये मान रहे थे कि आय नही बढ़ रही है फिर भी महंगाई के प्रश्न पर कह रहे थे कि ये तो स्वाभाविक है । पेट्रोल के दाम अतार्किक रूप से बढ़ रहे हैं तो क्या हुआ सड़कों के लिए पैसा भी तो यंही से आएगा । सड़के भी तो बन रही हैं , जबकि सब जानते हैं कि 2021-22 में सरकारी आंकलन के अनुसार 88 % सड़कें वो बन रही हैं जिन पर टोल लगेगा , अर्थात सड़कों के पैसे पेट्रोल के बढ़े दामों से नही बल्कि आपकी जेब से ही जाएंगे ।
देशवासियों की चिंता यह है ही नही कि मुफ्त शिक्षा , चिकित्सा और न्याय हमारा अधिकार है जो हमे मिले , इस ओर सरकार ने कोई कदम नही उठाया । हमारी चिंता यह है कि अबकी बार कांवड़ यात्रा पर पुष्पवर्षा हेलीकॉप्टर से होगी या वायुयान से ।
बहुसंख्यक समाज यह सोचकर दुखी नही है कि देश की 80 करोड़ जनता को सरकार के मुफ्त के राशन पर निर्भर होना पड़ रहा है बल्कि यह सोचकर खुश है कि अल्पसंख्यक समाज के खाने और पहनने के ढंग पर हमने विजय प्राप्त कर ली है ।
देश पर कर्ज बढ़ता ही जा रहा है , भुखमरी में हम बांग्ला देश जैसे देशों से भी निम्न पायदान पर खड़ें हैं इस पर चिंता ना होकर चिंता इस बात की है कि पाकिस्तान में टमाटर कितना महंगा हो गया है ।
सरकारी अस्पतालों में दवाओं और ऑक्सिजन के अभाव ने कितने लोग परलोक सिधार गए उस दुःख पर अस्पतालों पर भगवा पुताई भारी है ।
चीन ने देश की सीमाओं में कितनी घुसपैठ कर ली है इस पर विचार ना हो इसलिए गोदी मीडिया द्वारा यूक्रैन-रूस विवाद के निस्तारण मे सरकार की नगण्य भूमिका के कसीदे पढ़े जा रहे हैं ।
देश के पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए स्थापित सामाजिक न्याय प्रणाली के तहत प्रदत्त आरक्षण को पर्दे के पीछे से खत्म किया जा रहा है और जनता एक वायरल वीडियो से खुश है जिसमें दिखाया गया कि RSS की नगर यात्रा पर कुछ मुस्लिम पुष्पवर्षा कर रहे हैं ।
दो वर्ष कोरोना काल मे शिक्षा के क्षेत्र में छात्रों के नुकसान की भरपाई की चिंता नही है , खुशी इस बात की है कि परीक्षाओं के बीच में भी नवरात्र पर माता के जगराते में पूरी रात DJ बजाने की छूट मिल गयी है ।
इस सरकार की सबसे बड़ी सफलता यही है कि अब हमने बढ़ती बेरोजगारी , हैप्पी इंडेक्स में भयंकर गिरावट , बढ़ती आर्थिक असमानता , किसानों की दुर्दशा , शिक्षा चिकित्सा के पूर्णतः निजीकरण के प्रयास , देश की संपदा को कुछ हाथों में सौंपने की कवायद , देश के 77% जनों की आय घटने को लेकर जरा भी उद्देलित नही हो रहे । हम खुश हैं देश की समस्त जनता खून निचोड कर सरकार ने पिछले दो वर्ष की अल्पावधि में अम्बानी की संपत्ति को 2 लाख 40 हज़ार करोड़ से बढ़ाकर 7 लाख 60 करने में बहुत सहायता की है , और जो वो उद्योगपति अडानी जो 2014 में संभलने के लिए 6000 करोड़ का पैकेज मांग रहा था वह आज एशिया का सबसे बड़ा पैसे वाला है ।

देश को जन मनःस्थिति में यह परिवर्तन मुबारक हो ।

07/04/2022
21/01/2022

आज अगर 2022 में भी अखिलेश यादव चुनाव हार जाएं तो 2027 में फिर वो मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे और फिर 2032 में वैसे ही जैसे 14,19 हारने के बाद राहुल गांधी 2024 में भी पीएम पद की रेस में हैं। ठीक वैसे ही पिछले 20 साल से लालू परिवार दावेदार है। ये वो महान लोग है जो मध्यकालीन राजा-राजकुमारों से भी ज्यादा कुलीन हैं क्योंकि वहां भी हारने पर किस्सा समाप्त हो जाता था लेकिन ये तब तक दावेदार रहते हैं जब तक जीत न जाए।
और यह दावेदारी शीर्ष पर ही नही है बल्कि निम्नतम स्तर तक व्याप्त है । विधायक के रूप में भी पूर्व विधायक/राजनेता के वंशज को बड़ी आसानी से प्रत्याशी के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है चाहे उसकी सामाजिक प्रतिबद्धताएं शून्य ही क्यों ना हों, दूसरी तरफ आम आदमी को राजनीतिक दल भी सिर्फ मतदाता के रूप में ही मान्यता देते हैं । इस लोकतंत्र में भी हम लोग अभिशप्त हैं विकल्प के तौर पर सिर्फ कुछ परिवारों को ढोने के लिए और इस सड़ती हुई व्यवस्था के जिम्मेदार सिर्फ वो लोग हैं जो ऐसे परिवारों की वैचारिक गुलामी कर रहे हैं। उस गुलामी को ही अपना धर्म मानते हैं ।
हमने ऐसा लोकतंत्र दुनिया में कहीं नहीं चलता देखा । यूएस में एक हारे हुए उम्मीदवार को दोबारा नहीं देखा होगा । आपने फिर से चुनाव लड़ता हुआ बार-बार लगातार हारता हुआ उम्मीदवार किसी भी लोकतंत्र में नही देखा होगा ।
किसी भी निजी संस्थान में अच्छा प्रदर्शन ना करने पर घर भेज दिया जाता है और उसके वंशजों को कोई आरक्षण नही मिलता लेकिन विधायक , सांसद , मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार फिक्स हैं और ये पद स्थापित राजनेताओं के वंशजों के लिए लगभग आरक्षित हैं । इनकी उम्मीदवारी आरक्षित है जो सारी उम्र रहेगी चाहे कितने भी चुनाव हारते रहें ।
इस सारी कुव्यवस्था को प्रारंभ करने का जिम्मेदार निश्चित रूप से गांधी परिवार और उनके जरखरीद गुलाम है क्योंकि उन्होनें ही तो इस परंपरा की नींव रखी थी परन्तु वर्तमान में कोई भी दल इससे अछूता नही है और छोटे दल तो राजनीति को दुकान की तरह चलाते हैं ।
आम आदमी के सामने अपार चुनावी खर्च भी ऐसी दीवार है कि उसे लांघ पाना जनता के बस की बात नही है । और यह दीवार जानबूझकर बनाई गई है ।
आज का हमारा यह तंत्र - भ्रष्ट तंत्र है , बेईमान तंत्र है , परिवार तंत्र है, धनिक तंत्र है परंतु कंही से भी लोकतंत्र नही है और यही आज प्रत्येक भारतीय की चिंता का विषय होना चाहिए ।
क्या अब समय नही आ गया है कि " कानून बने --
1 - परिवार से सिर्फ एक व्यक्ति राजनीतिक पद ग्रहण कर सकेगा ।
2- किसी भी राजनीतिक पद का प्रत्याशी होने के लिए सामान्य ज्ञान की एक परीक्षा पास करनी होगी ।
3- एक व्यक्ति एक पद के लिए जीवन में सिर्फ दो बार चुनाव हार सकेगा । दो बार हारने पर आजीवन वह कोई चुनाव नही लड़ पायेगा ।
4 - चुनाव में कोई रैली, चुनावी सभा नही होगी । सरकार प्रत्याशियों से एक निश्चित धनराशि लेकर प्रत्याशियों के विचारों एवं परिचय की एक साझा पुस्तिका छपवाकर वोटर पर्ची के साथ घर घर भेजेगी ।
5 - इस पुस्तिका में प्रत्याशियों द्वारा कहे गए शब्दों को उसके द्वारा दिया गया वचन समझा जाएगा और विजयी प्रत्याशी द्वारा पूरा ना किये जाने पर वचन भंग का अपराधी माना जायेगा ।
6 - किसी भी अन्य दल से आये व्यक्ति को तीन वर्ष के बाद ही प्रत्याशी बनाया जा सकेगा ।

देखने मे उक्त कानून अटपटे लग सकते हैं प्ररन्तु भारत के लोकतंत्र में आई भयंकर गिरावट को दूर करने के लिए कुछ अटपटा ही करना होगा ।

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