16/05/2023
ये तो सदियों का क़िस्सा था
यहाँ तो एक बड़ा सा पेड़ हुआ करता था
जलती, तपती, भुनती और सुलगती रुत में
इस के नीचे
यहीं कहीं पर
एक जज़ीरा सा आबाद रहा करता था
ख़ुनुक-ख़ुनुक साए में
हँसते गाते, मुस्काते लोगों की
इक बस्ती थी
यहाँ तो एक बड़ा सा पेड़ हुआ करता था
यही धूप
जो आज यहाँ पर चीख़ रही है
पल भर सुस्ता लेने को तरसा करती थी
ये तो सदियों का क़िस्सा था
यहाँ तो एक बड़ा सा पेड़ हुआ करता था
आल्हा पापा को जन्नत उल फिरदौस में आला से आला मुकाम अता फरमाए ।
Baba Gulam Muhammad Jaula