21/01/2026
प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज के शिष्यों और पुलिस के बीच हुआ टकराव केवल एक घटना नहीं, बल्कि सनातन परंपरा पर सीधा प्रहार है।
जिस सनातन धर्म ने पूरी दुनिया को 'मर्यादा' और 'सम्मान' सिखाया, आज उसी धर्म के सर्वोच्च पद 'शंकराचार्य' के साथ अभद्र व्यवहार होते देखना हृदयविदारक है।
“संतों की चोटी उखाड़ना हिंदू धर्म में सबसे बड़ा पाप है।”
माघ मेला, जो तप, त्याग और साधना का प्रतीक है, वहां संतों के साथ ऐसा व्यवहार होना पूरे हिंदू समाज को गहरा आघात पहुंचाता है। यह घटना बताती है कि सत्ता के नशे में सरकार अब धर्म, मर्यादा और परंपरा की सीमाएं भी लांघ चुकी है। यदि समय रहते दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आक्रोश केवल संत समाज तक सीमित नहीं रहेगा।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आदि गुरु शंकराचार्य की उस महान परंपरा के ध्वजवाहक हैं, जिसने भारत को एक सूत्र में पिरोया है।
क्या राजनीतिक विचारधाराएं इतनी बड़ी हो गई हैं कि हम 'गुरु-परंपरा' का अपमान करने लगे हैं?
क्या शास्त्रों और धर्म की रक्षा करने वाले संतों को सड़क पर इस तरह के व्यवहार का सामना करना सही है?
मौन रहना भी सहभागिता है। यदि आज हम अपने शंकराचार्य के सम्मान में खड़े नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी को हम क्या विरासत देंगे?
हम इस दुर्व्यवहार का पुरजोर विरोध करते हैं। मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन मर्यादा का उल्लंघन अक्षम्य है। सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन धर्म और धर्मदंड अटल हैं।