13/03/2025
*"हक़ और इंसाफ़ की पुकार"*
"कौन कहता है कि हक मांगने का सलीका नहीं, ग़रीब की आवाज़ में कोई नज़्म-ओ-नदीमा नहीं। ज़मीन उनकी, आसमान पर भी हक उनका है, जिनके खून-पसीने से ये जहां रौशन हुआ है।
वोट को तोड़कर सौदे की तरह पेश किया जाता है, हक़ का सवाल करने पर चुप करा दिया जाता है। पर याद रखो, हर मजलूम की दुआ रंग लाएगी, जुल्म की ये दीवारें एक दिन जरूर गिराई जाएंगी।
गर हौसले में बुलंदी हो, तो वक्त बदलता है, तूफानों से लड़ने का हुनर ग़रीब ही रखता है। ये सन्नाटे, ये चीखें, अब खामोश नहीं रहेंगी, ग़रीब के हर आंसू को, अब आवाज़ मिलेगी।
जो वोट को धर्म-जात में बांटते हैं हर मोड़ पर, वो भूल गए कि इंसाफ रहता है हर चौखट पर। वो दिन दूर नहीं, जब सूरज सच का उगेगा, हर मेहनतकश का मुकद्दर नूर से सजेगा।"
*"ज़ुल्म की दीवारें गिरा के दम लेंगे, ये इमरान का ख्वाब नहीं, उसका वादा है।"*
*इमरान नज़ीर शेख (संस्थापक और निदेशक, ह्यूमैनिक डेवेलपमेंट फाउंडेशन)*