Swati lahoti

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Swati lahoti Deeply passionate about active citizenship & good governance. A firm believer in 'We live in the country we deserve’.

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अपनी सबसे दोस्ती, नहीं किसी से बैर | Swati Lahoti, based in Mumbai, is a writer by passion. A postgraduate in English and MBA in Marketing & HR, she has variously worked as a copywriter with advertising agencies and a placement consultant. However, the role most dear to her heart is that of a mother, helping her two sons reach the pinnacle of success. This book is about her redemption as a student, as a teacher, as a mother and most importantly as a daughter.

30/09/2026

कुछ फिल्में आपको हँसाने की कोशिश करती हैं, और कुछ फिल्में बस इतनी सहज होती हैं कि आप पूरी फिल्म मुस्कुराते हुए देख लेते हैं। VIBE मेरे लिए दूसरी तरह की फिल्म है।
Kunal Kemmu की इस फिल्म में humour है, लेकिन शोर नहीं; wit है, लेकिन vulgarity नहीं; अच्छे dialogues हैं, लेकिन forced punchlines नहीं। Kunal Kemmu, Sparsh Shrivastav, Preity Zinta और पूरी cast ने उस simplicity को बहुत खूबसूरती से निभाया है।
मैं कोई film critic नहीं हूँ, बस एक दर्शक हूँ, जिसे अच्छी storytelling और genuinely funny cinema पसंद है। इसलिए दिल से कह रही हूँ, VIBE देखिए। हो सकता है आपकी एक शाम भी मेरी तरह बहुत खुशगवार हो जाए।
और हाँ, credits भी ध्यान से देखिएगा। वहाँ भी Kunal Kemmu ने humour नहीं छोड़ा है! 😄

Kunal Kemmu

29/09/2026

कभी-कभी किसी लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह नहीं होता जो उसके भीतर लिखा है, बल्कि वह पहली पंक्ति होती है जो पाठक को उसे पढ़ने के लिए रोकती है।27 सितंबर के Navbharat Times के editorial page पर छपी headline, “पुरुष भूखा जानवर है और औरत उसका खाना!”, ने मुझे इसी वजह से ठिठककर सोचने पर मजबूर किया।
लेखिका ने महिलाओं की सुरक्षा, victim blaming और महिलाओं की freedom पर बेहद जरूरी सवाल उठाए हैं और उन सवालों से मेरी पूरी सहमति है। मेरा सवाल सिर्फ headline को लेकर है। अगर लेख का निष्कर्ष यही है कि पुरुष अपनी इच्छा पर नियंत्रण रखने वाला इंसान है और औरत कोई वस्तु या “खाना” नहीं, तो क्या headline भी उसी विचार को व्यक्त नहीं करनी चाहिए थी?
क्योंकि कई बार हम सिर्फ headline पढ़ते हैं, पूरा article नहीं। ऐसे में headline अपने आप में जो message देती है, वही हमारे मन में बैठ जाता है।
मेरे लिए यह किसी एक लेख या एक लेखिका की आलोचना नहीं, बल्कि responsible journalism पर एक जरूरी बातचीत है। तीखी बात कहिए, असहमति पैदा कीजिए, सवाल उठाइए, लेकिन क्या भाषा की गरिमा और उसके public impact की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी नहीं है?
आप इस headline को कैसे देखते हैं?

26/09/2026

क्या किसी रचना की महानता सिर्फ उसके शब्दों में होती है, या उस पूरे ecosystem में भी, जो उसे पढ़ता है, पढ़ाता है, interpret करता है और पीढ़ियों तक दोहराता रहता है?

Robert Frost की कविता हो या Shakespeare की iconic line, हमने उनके आसपास इतना बड़ा literary discourse बनाया कि उनकी हर पंक्ति की परतें खोली जाती हैं। लेकिन मैथिलीशरण गुप्त की “सखी, वे मुझसे कहकर जाते” या दिनकर की “क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो” जैसी पंक्तियाँ अक्सर स्कूल के भावार्थ, quotation या भाषण तक सीमित रह जाती हैं।

सवाल अंग्रेज़ी बनाम हिंदी का नहीं है। अंग्रेज़ी साहित्य की अपनी महान परंपरा है। सवाल यह है कि क्या history, power, institutions, syllabus और criticism ने हमारी literary understanding को इस तरह shape किया कि हम एक परंपरा को बहुत गहराई से पढ़ना सीख गए और अपनी परंपरा को उतनी गंभीरता से पढ़ना भूल गए?

शायद हमें अंग्रेज़ी साहित्य को छोटा करने की ज़रूरत नहीं है। शायद ज़रूरत इस बात की है कि अपने साहित्य को भी उसी intellectual seriousness के साथ पढ़ें।

आपके हिसाब से हिंदी साहित्य की वह कौन-सी पंक्ति है, जिसे आज की generation को नए सिरे से पढ़ना चाहिए?

Sahitya Akademi National Book Trust, India National Council of Educational Research and Training - NCERT

22/09/2026

'आज का अभिमन्यु'

हम बच्चों को IIT तक पहुंचने के लिए सालों तैयार करते हैं, लेकिन क्या उन्हें उस सफर के दबाव, अकेलेपन, comparison और failure के डर से लड़ने के लिए भी तैयार करते हैं? शायद अब समय है कि हम premier institutes में admission को मंज़िल नहीं, एक नई शुरुआत मानें। बच्चे को यह भरोसा भी दें कि वह असफल हो सकता है, मदद मांग सकता है, और फिर भी उसके घर के दरवाज़े उसके लिए हमेशा खुले रहेंगे।

"तुम बस लौट आना बेटा, यह घर तुम्हारी शर्त पर नहीं, तुम्हारे होने पर है टिका".

मैंने इस सफर को एक मां की आंखों से जिया और फिर शब्दों में सहेजा। 'The Wind Beneath His Wings’ https://shorturl.at/UD4V6 और ‘उसके पंखों की उड़ान’ https://shorturl.at/Wbycc में achievement के पीछे छिपी मेहनत, anxiety, expectations और माता-पिता की भूमिका को करीब से दर्ज किया है।

21/09/2026

मेरे पिछले वीडियो “विधवा नहीं, साध्वी”
https://www.facebook.com/reel/1578742023746833
पर आपने जिस तरह अपने विचार रखे, उसके लिए मैं आप सबकी आभारी हूँ। इस वीडियो में मेरी कोशिश कोई final answer देने की नहीं थी, बल्कि एक ऐसे विषय पर बातचीत शुरू करने की थी जिस पर हम अक्सर बात नहीं करते।

आपके comments में कई महत्वपूर्ण सवाल उठे। क्या सिर्फ़ शब्द बदलने से समाज की सोच बदल सकती है? किसी महिला को एक नया label देने की जरूरत ही क्यों है? और पति के निधन के बाद उसके जीवन, पहनावे और फैसलों पर समाज अपना अधिकार क्यों समझने लगता है?

मेरे लिए “साध्वी” किसी महिला की सीमा तय करने वाला शब्द नहीं है। मेरे लिए साधना सिर्फ़ पूजा-पाठ या वैराग्य नहीं है। जब जीवन अचानक बहुत कठिन हो जाए और एक महिला अपने दुख के साथ जीते हुए भी बच्चों को संभाले, घर चलाए और धीरे-धीरे अपनी जिंदगी को फिर से खड़ा करे, तो उसके इस संघर्ष में मुझे साधना दिखाई देती है। इसलिए “साध्वी” मेरे लिए बेचारगी का नहीं, शक्ति, धैर्य और संघर्ष के सम्मान का शब्द है और इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि उसके जीवन पर कोई पाबंदी लग जाए। वह दोबारा विवाह करना चाहे या न करे, सजना चाहे या सादा रहना, नौकरी करे, व्यवसाय करे या अपने बच्चों को संभाले, उसके जीवन के फैसले उसी के होने चाहिए।

इसीलिए मैंने आपकी प्रतिक्रियाओं में उठे इन सवालों पर विस्तार से बात की है। मेरा उद्देश्य किसी विचार को अंतिम सत्य की तरह सामने रखना नहीं, बल्कि उस बातचीत को आगे बढ़ाना है जो शायद बहुत पहले शुरू हो जानी चाहिए थी।

Sulabh International Social Service Organisation Theloombafoundation

#विधवा_नहीं_साध्वी #महिलासम्मान

18/09/2026

हमने delivery partner को एक नाम दे दिया, और उस एक नाम ने बहुत कुछ आसान कर दिया। अब वह हमारी screen पर बस एक moving dot है, जिसे हम देखते हैं और चाहते हैं कि वह थोड़ा और तेज़ चलकर हमारे दरवाज़े तक पहुँच जाए। लेकिन उस dot के पीछे भी एक इंसान है, किसी का बेटा, किसी का पति, किसी का पिता, जिसकी safety किसी delivery time से कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकती।

सवाल delivery बंद करने का नहीं है, सवाल यह है कि क्या हमारी convenience की कीमत किसी और की जान या सुरक्षा होनी चाहिए? अगली बार order करते समय बस एक छोटा-सा message लिखिए, “जल्दी मत कीजिए, संभलकर आइए, सुरक्षित रहिए'।कुछ मिनट की देरी अगर किसी इंसान को सुरक्षित घर पहुँचा दे, तो वह देरी नहीं, राहत है।

और अगली बार जब कोई delivery partner आपके दरवाज़े पर आए, तो उसे सिर्फ़ अपना order देने वाला व्यक्ति मत समझिए। एक गिलास पानी दीजिए, मुस्कुराकर धन्यवाद कहिए और याद रखिए, वह moving dot नहीं, एक पूरी ज़िंदगी लेकर हमारे दरवाज़े तक आया है।

Zomato Swiggy Instamart blinkit

15/09/2026

हाल ही में Netflix पर Operation Safed Sagar series देखी। 1999 के Kargil War में Indian Air Force के हमारे जवानों ने जिस हौसले और बहादुरी के साथ बेहद कठिन परिस्थितियों में अपने missions को अंजाम दिया, उसे देखकर गर्व तो होता ही है, लेकिन इस series ने एक सवाल भी मन में छोड़ दिया।

जब हमारे जवान minus temperature में, हजारों feet की ऊँचाई पर अपनी जान की बाज़ी लगा रहे थे, तब हम अपने घरों में अपनी सामान्य जिंदगी जी रहे थे। हम उस ठंड, उस ऊँचाई और उस डर की शायद कभी पूरी तरह कल्पना भी नहीं कर सकते कि जिस mission पर आप जा रहे हैं, पता नहीं वह आपकी आखिरी उड़ान हो।हमारे लिए किसी जवान की शहादत एक खबर होती है, लेकिन उसके परिवार के लिए वह पूरी जिंदगी बदल देने वाली घटना होती है। और फिर भी बाकी जवान अगले mission पर निकल पड़ते हैं।

तो क्या हम अपने हिस्से की छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ भी पूरी ईमानदारी से नहीं निभा सकते? ट्रैफिक सिग्नल का पालन करना, रिश्वत न देना, सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करना, सड़क पर कचरा न फेंकना और अपने काम को ईमानदारी से करना, यही तो हमारी तरफ़ से देश के प्रति जिम्मेदारी है।

Operation Safed Sagar को सिर्फ़ एक war series की तरह मत देखिए। इसे देखते हुए एक बार अपने आप से पूछिए कि जिस जवान ने देश के लिए अपनी पूरी जिंदगी दे दी, हम अपने हिस्से का भारत बेहतर बनाने के लिए क्या कर रहे हैं?
इस कहानी को इतनी प्रभावी तरह से हमारे सामने लाने के लिए Director Oni Sen और पूरी creative team को साधुवाद।

वो सरहद निभा गए अपनी, अब भीतर की सरहद अपनी है।
जो सौंपा हमें अमानत सा, उस चमन की बारी अपनी है।

.sen_

14/09/2026

अंग्रेज़ी बोलने वाला ज़्यादा educated और हिंदी बोलने वाला कम क्यों समझा जाता है? सवाल भाषा का नहीं, हमारी मानसिकता का है।और एक सवाल, हिंदी बोलते हैं तो WhatsApp पर हिंदी Roman में क्यों लिखते हैं? देवनागरी हमारी विरासत है, इसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है।

आज हिंदी दिवस yani 14th September के दिन इतना जरूर सोचें कि हिंदी को सिर्फ बोलना नहीं है, उसे आगे भी बढ़ाना है।हिंदी भारत की आत्मा है। हिंदी भारत का प्राण है। हिंदी भारत की संचेतना है।

हिंदी हैं हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा।

Rajbhasha Vibhag Nbt India

12/09/2026

कल “हनुमान अंश” देखी और फिल्म खत्म होने के बाद
भी कई बातें मन में चलती रहीं।इस फिल्म से मेरा एक पुराना
personal connect भी है। मैं नैनीताल में पढ़ी हूँ और हम लोग कैंची
धाम तब भी जाया करते थे, जब वह आज की तरह मशहूर नहीं था।
शायद इसलिए फिल्म में दिखाई गई बहुत-सी बातें मुझे सिर्फ फिल्म
की कहानी नहीं लगीं, कहीं अपनी जड़ों से जुड़ी हुई लगीं।

फिल्म की एक बात मेरे मन में रह गई, “भक्त को प्रसाद और भूखे को
भोजन।”शायद भक्ति का सबसे सरल अर्थ यही है। मानव मात्र की सेवा ही ईश
सेवा है, भक्त की सेवा ही भगवान की सेवा है। आप उसकी बनाई हुई
रचना की कद्र कीजिए, उसके काम आइए, वह अपने आप खुश हो
जाएगा।

और आज की इस भागती हुई जिंदगी में शायद मुझे ऐसी ही फिल्मों की
जरूरत लगती है, जो हमें थोड़ा ठहराएँ, अपनी जड़ों की याद दिलाएँ
और सादगी की कीमत समझाएँ। मैं हमेशा मानती हूँ कि ऐसी फिल्मों
को theatre में जाकर देखना चाहिए, ताकि ऐसी simple और
meaningful फिल्में बनती रहें।




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