09/06/2017
होश संभाला तो बड़े भाइयों को खेती करते देखा, आमदनी का ज़रिया भी वही था, मेरी नौकरी और दूसरे कारोबार सब बाद मे हुए, मैने अपनी 40 साला ज़िंदगी मे अपने भाइयों को सुबह कभी सोते नही पाया . सूरज निकलने तक तो वो खेतों पर होते, कभी मै खाना लेकर खेत पर जाता तो उन्हे ज़मीन का सीना चीरते देखता, पसीना बहाते देखता, ठंडा खाना और बाद मे पानी न मिलना आम बात होती, फिर से काम मे लगना और मुझे जल्दी से घर भेजना, इसी वक़्त मे मैने उनका सफ़ेद रंग काला और काले बाल वक़्त से पहले सफ़ेद होते देखे, चिलचिलाती धूप मे तपती मिटटी को हमवार करना या अपनी फ़सल की प्यास बुझाने की फ़िक्र उन्हे हमेशा बैचेन रखती, उसके लिये चाहे हाड कंपाने वाली ठंड की अंधेरी रात मे ही खेत पर क्यों न जाना पड़े, मै अपने गर्म बिस्तर मे लेटा उनकी ठंड महसूस करता, इस सबमे सांप, सुअर, गीदड़ और दूसरे जंगली जानवरों का ख़तरा हमेशा बना रहता, कभी कभी बारिश के लिए आसमान तांकना और तैयार फ़सल पर बारिश के आसार देखकर अपनी फ़सल को बचाने की फ़िक्र किसान को वक़्त से पहले बूढ़ा करती है, वही भाइयों के साथ था उनके लिये फ़सल उनकी औलाद की तरह होती, फ़सल ठीक ठाक घर पहुंचती तो बेटी की विदाई जैसा सुकून चेहरे पर दिखाई देता ,यह हर किसान की कहानी है इसलिए जब कभी भी कहीं भी किसानो पर ज़ुल्म होता है तो मुझे लगता है वो लाठियां वो गोलियां मेरे भाइयों पर चल रही हैं, वो अलग बात कि व्यापारी वर्ग जिसने समाज का ख़ून जोंक की तरह चूसा हो या वो अधिकारी जो इस देश को दीमक की तरह चाट रहे हैं या वो खादीधारी नेता जो लोमड़ी की तरह अपनी चालाकी से भोले भाले देशवासियों को बेवकूफ़ बना रहे हैं, कभी भी इन मेहनतकश स्वाभिमानी किसानो को दर्द न समझ पाये,
किसान का पुरस्कार सिर्फ़ उसकी अपनी आत्मसंतुष्टि है कि वो दुनिया भर के लिए अन्न उगाता है।।