29/05/2026
बशीर बद्र साहब : ‘जिनको पढ़ने के लिए विद्वान होना नहीं ,इंसान होना ज़रूरी है ‘
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बात २००३ की होगी शायद । पाठ्यक्रम से इतर कविता पढ़ने का शौक़ जब पहली बार मन में जागा था, तब शब्द सिर्फ़ शब्द नहीं लगते थे । वे किसी अनजानी दुनिया के दरवाज़े जैसे लगते थे।
सबसे पहले बच्चन साहब की ‘मधुशाला’ ने आकर्षित किया। उसके बाद श्री दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों ने भीतर एक बेचैनी पैदा की।
लेकिन जब पहली बार बशीर बद्र का संग्रह ‘’उजाले अपनी यादों के”पढ़ा, तब महसूस हुआ कि शायरी सिर्फ़ पढ़ी नहीं जाती उसे जिया जाता है।
उनकी किताब को पढ़ना मानो अपने ही दिल के किसी बंद कमरे का दरवाज़ा खोल देना था।
और फिर यह सिलसिला ऐसा चला कि उनकी ग़ज़लों का पुनर्पाठ आदत नहीं, ज़रूरत बन गया।
आज वही बशीर बद्र साहब इस दुनिया से रुख़्सत हो गए।लेकिन कुछ लोग मौत से हारते नहीं।वे अपनी आवाज़, अपने एहसास और अपने शब्दों में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।बशीर बद्र ऐसे ही शायर थे।
उन्होंने उर्दू शायरी को कठिन शब्दों की कैद से निकालकर आम आदमी की ज़बान बना दिया।
उनकी सबसे बड़ी ताक़त यही थी कि वे बेहद गहरी बात को बेहद आसान अल्फ़ाज़ में कह देते थे।
उनके शेर किताबों के लिए नहीं थे, ज़िंदगी के लिए थे।इसलिए हिन्दी जानने वाला भी उन्हें उतना ही महसूस करता था, जितना उर्दू का पाठक।
उन्होंने नई उर्दू ग़ज़ल को नई दिशा दी।
उनकी शायरी में सिर्फ़ इश्क़ नहीं था, समाज का दर्द भी था।रिश्तों की टूटन थी, शहरों की बेरुख़ी थी, इंसान के भीतर बढ़ती हुई तन्हाई थी।
वे मोहब्बत लिखते थे, मगर मोहब्बत के बहाने पूरी सभ्यता का हाल कह जाते थे।
उनके शेरों में बनावट नहीं थी, जीवन था।
इसीलिए उनकी पंक्तियाँ लोगों की स्मृतियों का हिस्सा बन गईं।
‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’
यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, पूरी ज़िंदगी का दर्शन है।
यादों के उजाले के बिना आदमी कितना अकेला हो जाता है, यह बशीर बद्र से बेहतर शायद ही किसी ने कहा हो।
और आज जब उनके जाने की खबर आती है, तो अनायास उनका ही एक शेर याद आता है
‘मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।’
उनकी शायरी में रिश्तों की नर्मी भी थी और समय की क्रूरता भी -
‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।’
आज के समय की सामाजिक दूरी, कृत्रिम संबंध और भीतर की अकेलापन ; सब कुछ इस एक शेर में समा जाता है।
और जब उन्होंने लिखा
‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में ‘
तो यह सिर्फ़ कविता नहीं रही, समाज के प्रति एक नैतिक प्रतिरोध बन गई।
बशीर बद्र की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि उनके शेर किसी एक वर्ग के नहीं थे।उन्हें पढ़ने के लिए विद्वान होना ज़रूरी नहीं था, इंसान होना ज़रूरी था।
भारत और पाकिस्तान के लगभग सभी बड़े गायकों ने उनकी ग़ज़लों को आवाज़ दी।
लेकिन सच यह है कि उनकी असली आवाज़ आम लोगों के दिलों में थी।
किसी की पहली मोहब्बत में, किसी की अधूरी कहानी में, किसी की तन्हाई में, किसी की बिछड़न में -हर जगह बशीर बद्र मौजूद रहे।
भले ही उन्हें पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार और अनेक सम्मान मिले, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान पुरस्कार नहीं थे।उनकी सबसे बड़ी पहचान वे लोग थे, जो अचानक किसी शाम अकेले बैठकर उनका कोई शेर याद करने लगते हैं।
आज एक शायर चला गया है।
लेकिन उसके जाने से सिर्फ़ साहित्य का नुकसान नहीं हुआ ; हमारी संवेदनाओं का एक हिस्सा भी जैसे कम हो गया है।
अब जब भी कोई उदास शाम होगी,
जब भी कोई रिश्ता टूटेगा,
जब भी कोई इंसान इस भीड़ में अकेला महसूस करेगा ।
बशीर बद्र फिर याद आएँगे।क्योंकि कुछ शायर किताबों में नहीं रहते,वे लोगों की धड़कनों में बस जाते हैं।
बशीर बद्र साहब !
आपके अल्फ़ाज़ आने वाली कई पीढ़ियों के अँधेरों में उजाला करते रहेंगे।
आपको भावभीनी श्रद्धांजलि। 🙏