02/01/2024
आइये जानते हैं स्पेन(उंदलुस) कि 800 साल तक कायम #मुस्लिम_हुकुमत۰ कि शानदार तारिख़ और उसका इबरतनाक ज़वाल । पोस्ट थोड़ी बड़ी है लेकिन आपको जरूर पढ़नी चाहिए।
अरब हुक्मरानों की तरह उंदुलुस में भी अरबों की हुकूमत अगरचे शख़्सी नज़र आती थी मगर उसमें जमहूरियत का रंग बहुत ज्यादा शामिल था । ख़लीफा का हुक्म और शरीअत का कानून हर शख़्स पर बराबर लागू था । उस वक्त सुलतान पर काज़ी की कचहरी में एक ईसाई ने दावा किया और काज़ी के हुक्म की उस अज़ीमुश्शान सुलतान को उसी तरह तामील करनी पड़ी जिस तरह एक गुलाम को तामील करनी पड़ती । क़ाज़ी कानूने शरीअत के मुवाफिक ख़लीफा को सज़ा देने की ताकत रखता था ।
कोतवाली का इंतिज़ाम निहायत आला दरजा का था । हर बाज़ार में एक मुहतसिब होता था जो तिजारत पेशा लोगों के कारोबार की निगरानी करता था । हर शहर और कसबे में शिफा खाना और दवाख़ाने खुले हुए थे । सड़कें और नहरें मुसलमानों ने तमाम मुल्क में जाल की तरह बिछा दी थीं । ख़लीफा हश्शाम ने दरियाए वादिउल कबीर का निहायत शानदार और खूबसूरत पुल बनाया । उसी तरह जगह - जगह दरियाओं के पुल बन गए थे । जंगी फ़नों और फौजी कानूनों में आमतौर पर मुसलमान सारी दुनिया से ज़्यादा शाइस्ता थे । उंदुलुस के मुसलमानों ने किला तोड़ने के आलात ईजाद किए । यूरोप के वहशियों को जो हमेशा फ़तहमंद होने पर शहरों और बस्तियों को जलाकर ख़ाक में मिला दिया करते थे और औरतों , बच्चों , बूढों तक को कत्ल कर देते थे , अपने तर्ज़े अमल से मुसलमानों ने 800 साल तक शाइस्तगी की तालीम दी कि फतह होने पर बेगुनाह रिआया को किसी किस्म की भी तकलीफ न पहुंचाना चाहिए।
खेती को मुसलमानों ने इस कदर तरक़्क़ी दी थी कि एक एक मुकम्मल फन बन गया था । हर मेवादार दरख़्त और ज़मीन की ख़ासियत और माहियत से वाकफियत हासिल की । उंदुलुस के हज़ारों लाखों मुरब्बा मील रकबों को जो बंजर और वीरान पड़े हुए थे , मुसलमानों ने मेवादार दरख़्त और सरसब्ज़ व शादाब लहलहाते हुए खेतों की शक्ल में बदल दिया । चावल , नेशकर , रूई , जाफरान , अनार , आडू , शिफतालू वगैरा जो आज कल उंदुलुस में कसरत से पैदा होते हैं , मुसलमानों ही के तुफैल उंदुलुस बल्कि तमाम यूरोप को नसीब हुए ।
उंदुलूसिया और अशबीलिया के सूबों में जैतून और खुर्मा की खेती को बड़ी तरक्की दी । सरीश , गरनाता और मालिका के इलाकों में अंगूरों की बड़ी पैदावार होती थी । खेती के साथ उंदुलुस के मुसलमानों ने मादिनियात की तलाश में भी कोताही नहीं की । सोना , चांदी , लोहा , फौलाद , पारा , कहरबा , तांबा , याकूत और नीलम वगैरा की कानें पता कीं और यह चीजें कसरत से पैदा होने लगीं ।
गरनाता की सलतनत उंदुलुस में मुसलमानों की आख़िरी निशानी थी लेकिन इस छोटी सी सलतनत ने भी फन्ने तामीर और कदरदानी उलूम के मुतअल्लिक बड़ी - बड़ी अज़ीमुश्शान यादगारें छोड़ीं हैं । मुसलमानों ने ऐसा अजीब व ग़रीब सीमेंट ईजाद किया कि कसरे हुमरा जो सलतनत गरनाता की निशानी दुनिया में बाक़ी है , आज तक अपने मसाले की पुख़्तगी से सय्याहों को हैरान कर देता है । कसरे अलहमरा को ग़रनाता के बादशाहों ने बहुत ज़्यादा सोने की ख़र्च से शहर के करीब एक निहायत बुलंद टीले पर शलेर पहाड़ की बर्फ से ढकी हुई चोटियों के साए में तैयार किया था। उसकी चार दीवारी के अंदर ऐसे खुशनुमा सब्ज़ व शादाब बागात , मीठी नहरें , बहुत ज्यादा फलों के दरख़्त थे कि आंखों ने उसकी मिसाल न देखी थी ।
इस कसर की हर एक चीज़ देखने के काबिल और हैरतअंगेज़ है कि दुनिया के मशहूर कारीगर देखकर दंग रह जाते हैं ।
उसकी बुलंद दिवारों की गच की सफाई संगे मरमर से ज़्यादा चमकदार और लोहे से ज़्यादा मज़बूत है । जालीदार दीवारों की तरह - तरह की नाजुक गुलकारियां और उसकी नई तरीके की मेहराबों से हर एक लटकी हुई कलम नज़ाकत का इज़हार करती है । मुसलमानों ने उंदुलुस पर काबिज़ और हुक्मरान होकर तमाम मुल्क में दारुल उलूम , मदारिस , रसद ख़ाने , अज़ीमुश्शान कुतुब ख़ाने खोल दिए थे , जहां इल्मी तहकीकात का हर एक सामान मौजूद रहता था । बड़े - बड़े शहरों में युनिवर्सिटियां या दारुल उलूम और छोटे कसबों में इब्तिदाई और दरमियानी दरजे के मदारिस थे । कुर्तबा , अशबीलिया , मालिका , सरकसता , बशूना , जियान , तीतला वगैरा बड़े - बड़े शहरों में दारुल उलूम कायम थे ।
जहां इतालिया , फ्रांस , जर्मन , इंग्लिस्तान वगैरा मुल्कों के छात्रों और उलूम के शौकीन लोग आते और सालों रहकर तालीम पाते थे । अरबों ने यूनानी , लातीनी और स्पानिस ज़बानों को बेहद मशक्कत के साथ सीखा और उन ज़बानों में अरबी जुबान की कई शब्दकोश डालीं । ख़लीफा हकम सानी के अहदे हुकूमत में सिर्फ कुर्तबा के कुतुब ख़ाने में मुख़्तलिफ उलूम और फुनून की 6 लाख किताबें मौजूद थीं और हर किताब पर ख़ास ख़लीफा के हाथ का हाशिया तहरीर था ।
मुसलमानों ने फलसफा यूनान की तमाम किताबों का अपनी ज़बान में तर्जुमा कर डाला । इब्ने रुश्द जो अरसतू पर भी फजीलत रखता था , उंदुलुस ही का एक मुसलमान था । मुसलमानों ने इल्मे हैबत में वह तरक्की की और ऐसे रसद खाने कायम किए कि तमाम यूरोप को उन्हीं के नक्शे कदम पर चलना पड़ा । इसतरलाब जो रसद ख़ानों की रूह है , उंदुलुस के मुसलमानों की ईजाद है । तिब और सर्जरी में उंदुलुसी मुसलमानों ने ऐसी तरक्की की थी कि कुछ दिन पहले तक तमाम यूरोप उन्हीं की किताबों से फायदा उठाता था । इल्मे हेवानात और नबातात में उंदुलुसी मुसलमानों के कारनामे बेहद अज़ीमुश्शान हैं । कुर्तबा और गरनाता में इल्मे हेवानात और नबातात की तालीम के लिए ख़ासतौर पर बाग़ात और कारख़ाने मौजूद थे ।
पटसन और रूई से काग़ज़ तैयार करना उंदुलुसी मुसलमानों ने ईजाद किया । अलफानसो याज़दहम की तारीख़ में लिखा है किः “ शहर के मुसलमान बहुत सी गूंजने वाली चीजें और लोहे के गोले बहुत बड़े - बड़े सेब के बराबर फेंकते थे । यह गोले इस कदर दूर जाते थे कि कुछ तो फौज के उस पार जाकर और कुछ फौज के अंदर गिरते थे । " इस बयान से साबित है कि मुसलमान जब तोप और बारूद को इस्तेमाल करते थे , ईसाई उस से बिलकुल नावाकिफ थे ।
सनीनुल इस्लाम का लेखक लिखता है कि सन् 441 हिज ० में उंदुलुस के मुसलमानों में से कुछ ने अमेरिका का पता लगाया था , मगर उसकी ज्यादा शोहरत न हुई । यह शोहरत कोलम्बस की तकदीर में लिखी थी जो बहुत दिनों बाद अमेरिका पहुंचा था।
मुसलमानों के इल्मी ज़ौक और शौक ने तमाम यूरोप के लिए अदब और फलसफा और सनअत बल्कि तमाम उलूम व फुनून के दरवाज़े खोल दिए थे । 800 साल तक मुसलमान हर चीज़ में अहले यूरोप के उसताद बने रहे । ईसाई उमरा ज़बान और हर चीज़ में मुसलमानों के पीछे चलना अपने लिए फख्र का बाइस समझते और अरबी नज़्म व नम्र लिखने की कोशिश किया करते थे , यह उन्हीं मुसलमानों का असर था । फ्रांसीसी और अतालवी ज़बानों में अकसर वह अलफ़ाज़ जो जहाज़ चलाने और समुंदरी इंतिज़ामात से मुतअल्लिक हैं , अरबी हैं और यह इस बात की दलील है कि उन मुल्कों ने मुसलमानों ही से जहाज़ चलानी सीखी है । सैर व शिकार के मुतअल्लिक भी अकसर अलफ़ाज़ अरबी हैं । इल्मे हैबत की इसलाहें और दवाओं के नाम जो यूरोप की ज़बानों में राइज हैं अरबी हैं ।
ग़र्ज़ यह कि उंदुलुस के मुसलमान तमाम यूरोप के उस्ताद , तमाम यूरोप के मुहसिन और तमाम यूरोप को इल्म व हिकमत और तरक्की और इज्ज़त के तरीके बताने वाले उस्ताद थे । आज यूरोप अपनी कोई भी ऐसी काबिले फख्र चीज़ पेश नहीं कर सकता जिसमें वह मुसलमानों का एहसानमंद न हो । उन एहसानात का जो बदला यूरोप और यूरोप के ईसाइयों ने मुसलमानों को दिया वो मुसलमानों का कत्ल व गारत था।
इस जगह एक मरतबा फिर इस बात को याद कर लेना चाहिए कि मुसलमानों ने जब पहली सदी हिजरी में उंदुलुस को फतह किया था तो किसी ईसाई को ज़बरदस्ती मुसलमान नहीं बनाया था बल्कि ईसाई लोग खुद - बखुद इस्लाम की खूबियों को देखकर दीने इस्लाम में दाख़िल होते थे । अब जबकि ईसाइयों ने ताकत हासिल की और वह मुसलमानों को उनके दींन से न फेर सके तो ईसाइयों ने लाखों मुसलमानों को जो उंदलुस में मौजूद थे , कत्ल कर डाला , आग में जला दिया और पानी में डुबो दिया । इसका नतीजा यह हुआ कि वह मुल्क उंदुलुस जो मुसलमानों के अहदे हुकूमत में दुनिया का सबसे ज़्यादा सरसब्ज़ व शादाब और आबाद मुल्क समझा जाता था और जिसकी ज़रख़ेज़ी बेमिसाल थी , मुसलमानों की बरबादी के बाद ऐसा वीरान व गैर आबाद हुआ कि आज तक वीरानी और नहूसत ने उसका पीछा नहीं छोड़ा ।
मुसलमानों के ज़माने में पहाड़ों तक पर खेती होती थी और कोई ज़मीन का गोशा बंजर न था । लेकिन आज हज़ारों मील मुरब्बा ज़मीन के कतआत वीरान और बंजर पड़े हुए हैं । वह मुल्क जो मुसलमानों के अहदे हुकूमत में दुनिया का सबसे ज़्यादा कीमती और शानदार मुल्क था , आज सब से ज़्यादा मनहूस और बेहकीकत मुल्क समझा जाता है ।
मुसलमानों पर यह मुसीबतें सिर्फ इस लिए नाज़िल हुईं कि उन्होंने कलामे इलाही ( इस से मुराद कुरआन व हदीस यानी दीने इस्लाम है ) को पीछे डाल दिया था । जिस की वजह से उन में खुदगर्जी और ना इत्तिफाकी पैदा हुई । इस्लाम की पाबंदी के छोड़ने का नतीजा यह था कि मुसलमान सरदार अपने भाई मुसलमान सरदारों की मुखालिफत में ईसाइयों के पास जाकर उनसे मदद तलब करने में कोई देर न करते थे । मुसलमानों ने खुद ईसाइयों के हाथों से खुशी - खुशी मुसलमानों को कत्ल कराया और ईसाइयों के दिलों से इस्लामी रोब को मिटाया । उंदुलुस के मुसलमानों ने अपनी बदआमालियों से अपने आप को मग़जूब बना लिया था । इसी लिए उनको दुनिया के किसी हिस्से में कोई मदद न पहुंची और काफिरों के हाथों से फज्जार को अल्लाह तआला ने सज़ा दिलवाई ।
मुसलमान जब कभी और जहां कहीं दीने इस्लाम से ऐसे ग़ाफ़िल और कुरआन करीम से बेतअल्लुक हुए , उन पर ऐसी ही मुसीबतें नाज़िल हुईं और आइंदा भी हमेशा मुसलमानों की बरबादी के असबाब कुरआन करीम और हुजुर रसलुल्लाह सल्ललाहू अलैहि वसल्लम की तालीमात की तरफ से ग़ाफ़िल हो जाने ही की बदआमालियों में तलाश किए जा सकेंगे । बजाए इसके कि हम उंदुलुस के मुसलमानों की तबाही पर नौहा करें , हमको चाहिए कि उनके हालात से इबरत हासिल करें और अपनी हालतों में इसलाह की कोशिश करें । सच्चे - पक्के मुसलमान बन कर आपस में भाई - भाई बन जाएं और मुत्तहिद होकर सुस्ती और काहिली को छोड़ दें और कोशिश करें कि इसी का नाम जिंदगी और इसी का नाम अल्लाह तआला की बंदगी है ।