Hamara Beeta Kal - हमारा बीता कल

Hamara Beeta Kal - हमारा बीता कल इस पेज का मकसद यह है कि हम अपने असलाफ की सुनहरी तारीख को सबके सामने ला सकें।

Father of aerodynamics (ऐरोडाइनमिक्स का बाप )   हस्पनिया (स्पेन ) का एक साइंटिस्ट जिसका नाम "अब्बास इब्न फ़िरनास; Abbas ...
02/11/2024

Father of aerodynamics (ऐरोडाइनमिक्स का बाप ) हस्पनिया (स्पेन ) का एक साइंटिस्ट जिसका नाम "अब्बास इब्न फ़िरनास; Abbas Ibn Firnas, जो कि एक आविष्कारक, हकीम , रसायन, तथा इंजीनियर , संगीतकार और अरबी भाषा के एक शायर थे ।
उन्हीं से इन्सपायर #एफ़रनस नाम आज मोरक्को और अल्जीरिया में बहुत मक़बूल है।
अगर उसे इस्लामिक गोल्डन एरा का जीनियस कहा जाए तो गलत नहीं होगा ।

उसने पानी की घड़ी बनाई , कृस्टल बनाने का फॉर्मूला इज़ाद किया , शीशे और मशीनों की मदद से एक नक्षत्र भवन बनाया जिसमें बैठ कर लोग सितारों और बादलों की
गरज चमक का मुजाहिरा देख सकते थे ।

822 ई में खलीफ़ा अब्दुल रहमान 2nd ने तमाम बा सलाहियत लोगों को बुलाया जिसमें अब्बास इब्न फिरनास भी थे
उस मजमे में एक बहादुर शख्स (Armen Firman) अरमन फिरमन था जिसने पंखों की तरह एक बड़ी सी चादर के साथ ऊंची इमारत से छलांग लगाई , लेकिन उसे मामूली कामयाबी मिली और वह नीचे गिर कर जख्मी हो गया ..... इसे दुनिया का पहला पैराशूट कहा जाता है ।

यह देखने के लिए अब्बास इब्ने फिरनास भी मौजूद थे , और वह बहुत मुतास्सिर हुए , वह घण्टों तक आसमान में परिंदों को उड़ते हुए देखते और तजुर्बात करते रहे ,
23 साल के तजुर्बों के बाद उन्हें कामयाबी हासिल हुई ।
एक दिन उन्होंने ऐलान किया कि इंसान भी परिंदों की तरह उड़ सकता है , ... लोगों ने इस ऐलान को सुनकर उन्हें पागल , सनकी कहते हुए मज़ाक उड़ाया
उन्होंने क़ुरतबा में अपनी खोज को लोगों के हुजूम के बीच अमली जामा पहनाया और अपने बनाये हुए परों को पहन कर पहाड़ी से छलांग लगा दी और कुछ देर उड़ने के बाद सेफ लैंडिंग की .... उस वक़्त उनकी उम्र 70 साल थी
यह इंसानी तारीख का हवा में उड़ने वाला पहला शख्स था ।
इब्ने फिरनास के वफ़ात के कई सालों बाद 1010 ई. में ईसाई पादरी एल्मर (Eilmer) ने फिरनास के तजुर्बों और डिज़ाइन में अपडेट करते हुए एक मशीन बनाई ... पन्द्रहवीं सदी में ( ल्युनार्डो द विंची ) ने इसमे इज़ाफ़ा किया ।

1976 में IAU ने इस महान मुसलमान साइंटिस्ट के नाम पर चाँद में एक गड्ढे का नाम रखने को मंजूरी दी ।
2011 में स्पेन में एक ब्रिज का नाम भी फिरनास के नाम पर रखा गया ।
लीबिया में फिरनास के नाम डाक टिकट रिलीज किया गया
दुबई के इब्ने बतूता शॉपिंग मॉल में फिरनास का मुजस्सिमा नसब है
बगदाद में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम फिरनास के नाम पर रखा गया ।

आज ऐरनॉटिक्स का कमाल है जो इंसान चाँद पर पहुंच गया , यूनिवर्स में सैर कर रहा है .... तो वजह यह बाकमाल शख्स है ।

कभी मलाल होता है कि काश " फॉल ऑफ स्पेन , ( हस्पनिया , क़ुरतबा , गरनाता ) न हुआ होता , मुसलमानों की किताबें न जली होतीं , चोरी होकर योरोप के म्यूजियम की जीनत न बनी होतीं ............ तो तारिक़ बिन जय्याद रजि. से शुरू हुई यह उम्मते मुस्लिमा की उरूज़ की सुनहरी तारीख में ऐसे अनगिनत कारनामे दर्ज होते ।

याद है न
" दस्त तो दस्त हैं दरिया भी न छोड़े हमने
बहर ए ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हमने "
ब्रो , यह कहानी जिब्राल्टर ( जबले तारिक़ ) पर उसी घुड़ दौड़ से शुरू हुई थी ।

यह काफ़िला फिलिस्तीन जेरुशलम में मौलाना मोहम्मद अली जौहर रह के जनाज़े का है आज ही के दिन 4 जनवरी 1931 को इंतेक़ाल हुआ,जेरुश...
04/01/2024

यह काफ़िला फिलिस्तीन जेरुशलम में मौलाना मोहम्मद अली जौहर रह के जनाज़े का है आज ही के दिन 4 जनवरी 1931 को इंतेक़ाल हुआ,जेरुशलम के मुफ़्ती अमीनुल हुस्सैनी ने मौलाना के जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई...
मौलाना की लगातार जेल जाने की वजह से सेहत ख़राब हो गई। डायबिटीज़ के मरीज थे जेल में सही खाना न मिलने की वजह से बीमार पड़ गए। 1930 में जब जेल से बाहर निकले तो बहुत ही ज़्यादा बीमार थे उसके बावज़ूद देश की आज़ादी के लिए वो लंदन की गोलमेज़ कांफ्रेंस में भाग लेने गए और अपने आखरी खिताब में कहा

"मेरे मुल्क को आज़ादी दो या मेरे कब्र के लिए मुझे दो गज़ जगह दे दो क्योंकि यहां मै अपने मुल्क की आज़ादी लेने आया हूं।"

शहीद ए मिल्लत मौलाना मुहम्मद अली जौहर जंगे आज़ादी और खिलाफत तहरीक का एक मुमताज़ सिपाही जिसे तअस्सुब पसन्द ज़हनियत ने उनकी ख़िदमात और कुर्बानियों को न सिर्फ नज़र अंदाज़ बल्कि किनारे कर दिया गया ..... और एक पूरी पीढ़ी जो इस अज़ीम मुज़ाहिद की शख्सियत से इंसपिरेशन ले सकती थी वह महरूम करदी गयी ।

मौलाना ज़ौहर ने ज़ामिया मिल्लिया दिल्ली की बुनियाद रखी ....
कोलकाता जाकर कामरेड नाम से इंग्लिश अख़बार निकाला , उसके अलावा उर्दू में एक रोज़नामा हमदर्द भी ज़ारी किया ।
कामरेड इतना मशहूर हुआ कि विदेशों में भी उसे पढ़ा जाता था...
ग्लोबल उम्मत कॉनसेप्ट का सच्चा सिपाही और ब्रांड यह मुज़ाहिद ए वक़्त तुर्की में आखरी मर्कज़ियत को बचाने के लिए इस क़दर सरगर्म रहा कि उस वक़्त की उनकी रूह सोज़ बलबला अंगेज़ तकरीरों ने उन्हें हिंदुस्तान का मुमताज़ मुक़र्रर बना दिया , फिलिस्तीन से बहुत उन्स था, और फिलिस्तीनियों को भी उनसे मुहब्बत थी जिसका इज़हार उस वक़्त की उनकी जनाज़े की तस्वीर में देखने को मिलता है ।
उन्हें ग़ुलाम हिन्दोस्तान में दफ़न होना ना क़ाबिल कुबूल था ,
अल्लाह ने उन्हें ऐसी पुरसरार जगह बैतुल मुक़द्दस मे क़ुबूल फ़रमाया जो कि नबियों की सरज़मीन है और वहीं कुब्बत अल सखरा के नज़दीक मुज़ाहिद ए आज़म का मज़ार है ।
जहां उनके तार्रुफ़ में अरबी में लिखा हुआ है " अल मुज़ाहिद उल अज़ीम मौलाना मुहम्मद अली अल हिंदी " ...
तमाम अलिगेरियन , जामिई , बल्कि अहले हिन्दोस्तान के लिए बहुत क़ाबिल ए फ़ख्र शख़्सियत है ।
उन्हीं का एक शेर जो आज भी मेरे ज़हन में खलल पैदा करता रहता है

"तौहीद तो ये है तब है कि ख़ुदा हशर में कहदे
कि बन्दा खफ़ा दो आलम से फ़कत मेरे लिए था " ☝️

आइये जानते हैं स्पेन(उंदलुस) कि 800 साल तक कायम  #मुस्लिम_हुकुमत۰ कि शानदार तारिख़ और उसका इबरतनाक ज़वाल । पोस्ट थोड़ी ब...
02/01/2024

आइये जानते हैं स्पेन(उंदलुस) कि 800 साल तक कायम #मुस्लिम_हुकुमत۰ कि शानदार तारिख़ और उसका इबरतनाक ज़वाल । पोस्ट थोड़ी बड़ी है लेकिन आपको जरूर पढ़नी चाहिए।

अरब हुक्मरानों की तरह उंदुलुस में भी अरबों की हुकूमत अगरचे शख़्सी नज़र आती थी मगर उसमें जमहूरियत का रंग बहुत ज्यादा शामिल था । ख़लीफा का हुक्म और शरीअत का कानून हर शख़्स पर बराबर लागू था । उस वक्त सुलतान पर काज़ी की कचहरी में एक ईसाई ने दावा किया और काज़ी के हुक्म की उस अज़ीमुश्शान सुलतान को उसी तरह तामील करनी पड़ी जिस तरह एक गुलाम को तामील करनी पड़ती । क़ाज़ी कानूने शरीअत के मुवाफिक ख़लीफा को सज़ा देने की ताकत रखता था ।
कोतवाली का इंतिज़ाम निहायत आला दरजा का था । हर बाज़ार में एक मुहतसिब होता था जो तिजारत पेशा लोगों के कारोबार की निगरानी करता था । हर शहर और कसबे में शिफा खाना और दवाख़ाने खुले हुए थे । सड़कें और नहरें मुसलमानों ने तमाम मुल्क में जाल की तरह बिछा दी थीं । ख़लीफा हश्शाम ने दरियाए वादिउल कबीर का निहायत शानदार और खूबसूरत पुल बनाया । उसी तरह जगह - जगह दरियाओं के पुल बन गए थे । जंगी फ़नों और फौजी कानूनों में आमतौर पर मुसलमान सारी दुनिया से ज़्यादा शाइस्ता थे । उंदुलुस के मुसलमानों ने किला तोड़ने के आलात ईजाद किए । यूरोप के वहशियों को जो हमेशा फ़तहमंद होने पर शहरों और बस्तियों को जलाकर ख़ाक में मिला दिया करते थे और औरतों , बच्चों , बूढों तक को कत्ल कर देते थे , अपने तर्ज़े अमल से मुसलमानों ने 800 साल तक शाइस्तगी की तालीम दी कि फतह होने पर बेगुनाह रिआया को किसी किस्म की भी तकलीफ न पहुंचाना चाहिए।
खेती को मुसलमानों ने इस कदर तरक़्क़ी दी थी कि एक एक मुकम्मल फन बन गया था । हर मेवादार दरख़्त और ज़मीन की ख़ासियत और माहियत से वाकफियत हासिल की । उंदुलुस के हज़ारों लाखों मुरब्बा मील रकबों को जो बंजर और वीरान पड़े हुए थे , मुसलमानों ने मेवादार दरख़्त और सरसब्ज़ व शादाब लहलहाते हुए खेतों की शक्ल में बदल दिया । चावल , नेशकर , रूई , जाफरान , अनार , आडू , शिफतालू वगैरा जो आज कल उंदुलुस में कसरत से पैदा होते हैं , मुसलमानों ही के तुफैल उंदुलुस बल्कि तमाम यूरोप को नसीब हुए ।

उंदुलूसिया और अशबीलिया के सूबों में जैतून और खुर्मा की खेती को बड़ी तरक्की दी । सरीश , गरनाता और मालिका के इलाकों में अंगूरों की बड़ी पैदावार होती थी । खेती के साथ उंदुलुस के मुसलमानों ने मादिनियात की तलाश में भी कोताही नहीं की । सोना , चांदी , लोहा , फौलाद , पारा , कहरबा , तांबा , याकूत और नीलम वगैरा की कानें पता कीं और यह चीजें कसरत से पैदा होने लगीं ।

गरनाता की सलतनत उंदुलुस में मुसलमानों की आख़िरी निशानी थी लेकिन इस छोटी सी सलतनत ने भी फन्ने तामीर और कदरदानी उलूम के मुतअल्लिक बड़ी - बड़ी अज़ीमुश्शान यादगारें छोड़ीं हैं । मुसलमानों ने ऐसा अजीब व ग़रीब सीमेंट ईजाद किया कि कसरे हुमरा जो सलतनत गरनाता की निशानी दुनिया में बाक़ी है , आज तक अपने मसाले की पुख़्तगी से सय्याहों को हैरान कर देता है । कसरे अलहमरा को ग़रनाता के बादशाहों ने बहुत ज़्यादा सोने की ख़र्च से शहर के करीब एक निहायत बुलंद टीले पर शलेर पहाड़ की बर्फ से ढकी हुई चोटियों के साए में तैयार किया था। उसकी चार दीवारी के अंदर ऐसे खुशनुमा सब्ज़ व शादाब बागात , मीठी नहरें , बहुत ज्यादा फलों के दरख़्त थे कि आंखों ने उसकी मिसाल न देखी थी ।

इस कसर की हर एक चीज़ देखने के काबिल और हैरतअंगेज़ है कि दुनिया के मशहूर कारीगर देखकर दंग रह जाते हैं ।
उसकी बुलंद दिवारों की गच की सफाई संगे मरमर से ज़्यादा चमकदार और लोहे से ज़्यादा मज़बूत है । जालीदार दीवारों की तरह - तरह की नाजुक गुलकारियां और उसकी नई तरीके की मेहराबों से हर एक लटकी हुई कलम नज़ाकत का इज़हार करती है । मुसलमानों ने उंदुलुस पर काबिज़ और हुक्मरान होकर तमाम मुल्क में दारुल उलूम , मदारिस , रसद ख़ाने , अज़ीमुश्शान कुतुब ख़ाने खोल दिए थे , जहां इल्मी तहकीकात का हर एक सामान मौजूद रहता था । बड़े - बड़े शहरों में युनिवर्सिटियां या दारुल उलूम और छोटे कसबों में इब्तिदाई और दरमियानी दरजे के मदारिस थे । कुर्तबा , अशबीलिया , मालिका , सरकसता , बशूना , जियान , तीतला वगैरा बड़े - बड़े शहरों में दारुल उलूम कायम थे ।

जहां इतालिया , फ्रांस , जर्मन , इंग्लिस्तान वगैरा मुल्कों के छात्रों और उलूम के शौकीन लोग आते और सालों रहकर तालीम पाते थे । अरबों ने यूनानी , लातीनी और स्पानिस ज़बानों को बेहद मशक्कत के साथ सीखा और उन ज़बानों में अरबी जुबान की कई शब्दकोश डालीं । ख़लीफा हकम सानी के अहदे हुकूमत में सिर्फ कुर्तबा के कुतुब ख़ाने में मुख़्तलिफ उलूम और फुनून की 6 लाख किताबें मौजूद थीं और हर किताब पर ख़ास ख़लीफा के हाथ का हाशिया तहरीर था ।

मुसलमानों ने फलसफा यूनान की तमाम किताबों का अपनी ज़बान में तर्जुमा कर डाला । इब्ने रुश्द जो अरसतू पर भी फजीलत रखता था , उंदुलुस ही का एक मुसलमान था । मुसलमानों ने इल्मे हैबत में वह तरक्की की और ऐसे रसद खाने कायम किए कि तमाम यूरोप को उन्हीं के नक्शे कदम पर चलना पड़ा । इसतरलाब जो रसद ख़ानों की रूह है , उंदुलुस के मुसलमानों की ईजाद है । तिब और सर्जरी में उंदुलुसी मुसलमानों ने ऐसी तरक्की की थी कि कुछ दिन पहले तक तमाम यूरोप उन्हीं की किताबों से फायदा उठाता था । इल्मे हेवानात और नबातात में उंदुलुसी मुसलमानों के कारनामे बेहद अज़ीमुश्शान हैं । कुर्तबा और गरनाता में इल्मे हेवानात और नबातात की तालीम के लिए ख़ासतौर पर बाग़ात और कारख़ाने मौजूद थे ।

पटसन और रूई से काग़ज़ तैयार करना उंदुलुसी मुसलमानों ने ईजाद किया । अलफानसो याज़दहम की तारीख़ में लिखा है किः “ शहर के मुसलमान बहुत सी गूंजने वाली चीजें और लोहे के गोले बहुत बड़े - बड़े सेब के बराबर फेंकते थे । यह गोले इस कदर दूर जाते थे कि कुछ तो फौज के उस पार जाकर और कुछ फौज के अंदर गिरते थे । " इस बयान से साबित है कि मुसलमान जब तोप और बारूद को इस्तेमाल करते थे , ईसाई उस से बिलकुल नावाकिफ थे ।

सनीनुल इस्लाम का लेखक लिखता है कि सन् 441 हिज ० में उंदुलुस के मुसलमानों में से कुछ ने अमेरिका का पता लगाया था , मगर उसकी ज्यादा शोहरत न हुई । यह शोहरत कोलम्बस की तकदीर में लिखी थी जो बहुत दिनों बाद अमेरिका पहुंचा था।

मुसलमानों के इल्मी ज़ौक और शौक ने तमाम यूरोप के लिए अदब और फलसफा और सनअत बल्कि तमाम उलूम व फुनून के दरवाज़े खोल दिए थे । 800 साल तक मुसलमान हर चीज़ में अहले यूरोप के उसताद बने रहे । ईसाई उमरा ज़बान और हर चीज़ में मुसलमानों के पीछे चलना अपने लिए फख्र का बाइस समझते और अरबी नज़्म व नम्र लिखने की कोशिश किया करते थे , यह उन्हीं मुसलमानों का असर था । फ्रांसीसी और अतालवी ज़बानों में अकसर वह अलफ़ाज़ जो जहाज़ चलाने और समुंदरी इंतिज़ामात से मुतअल्लिक हैं , अरबी हैं और यह इस बात की दलील है कि उन मुल्कों ने मुसलमानों ही से जहाज़ चलानी सीखी है । सैर व शिकार के मुतअल्लिक भी अकसर अलफ़ाज़ अरबी हैं । इल्मे हैबत की इसलाहें और दवाओं के नाम जो यूरोप की ज़बानों में राइज हैं अरबी हैं ।

ग़र्ज़ यह कि उंदुलुस के मुसलमान तमाम यूरोप के उस्ताद , तमाम यूरोप के मुहसिन और तमाम यूरोप को इल्म व हिकमत और तरक्की और इज्ज़त के तरीके बताने वाले उस्ताद थे । आज यूरोप अपनी कोई भी ऐसी काबिले फख्र चीज़ पेश नहीं कर सकता जिसमें वह मुसलमानों का एहसानमंद न हो । उन एहसानात का जो बदला यूरोप और यूरोप के ईसाइयों ने मुसलमानों को दिया वो मुसलमानों का कत्ल व‌ गारत था।

इस जगह एक मरतबा फिर इस बात को याद कर लेना चाहिए कि मुसलमानों ने जब पहली सदी हिजरी में उंदुलुस को फतह किया था तो किसी ईसाई को ज़बरदस्ती मुसलमान नहीं बनाया था बल्कि ईसाई लोग खुद - बखुद इस्लाम की खूबियों को देखकर दीने इस्लाम में दाख़िल होते थे । अब जबकि ईसाइयों ने ताकत हासिल की और वह मुसलमानों को उनके दींन से न फेर सके तो ईसाइयों ने लाखों मुसलमानों को जो उंदलुस में मौजूद थे , कत्ल कर डाला , आग में जला दिया और पानी में डुबो दिया । इसका नतीजा यह हुआ कि वह मुल्क उंदुलुस जो मुसलमानों के अहदे हुकूमत में दुनिया का सबसे ज़्यादा सरसब्ज़ व शादाब और आबाद मुल्क समझा जाता था और जिसकी ज़रख़ेज़ी बेमिसाल थी , मुसलमानों की बरबादी के बाद ऐसा वीरान व गैर आबाद हुआ कि आज तक वीरानी और नहूसत ने उसका पीछा नहीं छोड़ा ।

मुसलमानों के ज़माने में पहाड़ों तक पर खेती होती थी और कोई ज़मीन का गोशा बंजर न था । लेकिन आज हज़ारों मील मुरब्बा ज़मीन के कतआत वीरान और बंजर पड़े हुए हैं । वह मुल्क जो मुसलमानों के अहदे हुकूमत में दुनिया का सबसे ज़्यादा कीमती और शानदार मुल्क था , आज सब से ज़्यादा मनहूस और बेहकीकत मुल्क समझा जाता है ।

मुसलमानों पर यह मुसीबतें सिर्फ इस लिए नाज़िल हुईं कि उन्होंने कलामे इलाही ( इस से मुराद कुरआन व हदीस यानी दीने इस्लाम है ) को पीछे डाल दिया था । जिस की वजह से उन में खुदगर्जी और ना इत्तिफाकी पैदा हुई । इस्लाम की पाबंदी के छोड़ने का नतीजा यह था कि मुसलमान सरदार अपने भाई मुसलमान सरदारों की मुखालिफत में ईसाइयों के पास जाकर उनसे मदद तलब करने में कोई देर न करते थे । मुसलमानों ने खुद ईसाइयों के हाथों से खुशी - खुशी मुसलमानों को कत्ल कराया और ईसाइयों के दिलों से इस्लामी रोब को मिटाया । उंदुलुस के मुसलमानों ने अपनी बदआमालियों से अपने आप को मग़जूब बना लिया था । इसी लिए उनको दुनिया के किसी हिस्से में कोई मदद न पहुंची और काफिरों के हाथों से फज्जार को अल्लाह तआला ने सज़ा दिलवाई ।

मुसलमान जब कभी और जहां कहीं दीने इस्लाम से ऐसे ग़ाफ़िल और कुरआन करीम से बेतअल्लुक हुए , उन पर ऐसी ही मुसीबतें नाज़िल हुईं और आइंदा भी हमेशा मुसलमानों की बरबादी के असबाब कुरआन करीम और हुजुर रसलुल्लाह सल्ललाहू अलैहि वसल्लम की तालीमात की तरफ से ग़ाफ़िल हो जाने ही की बदआमालियों में तलाश किए जा सकेंगे । बजाए इसके कि हम उंदुलुस के मुसलमानों की तबाही पर नौहा करें , हमको चाहिए कि उनके हालात से इबरत हासिल करें और अपनी हालतों में इसलाह की कोशिश करें । सच्चे - पक्के मुसलमान बन कर आपस में भाई - भाई बन जाएं और मुत्तहिद होकर सुस्ती और काहिली को छोड़ दें और कोशिश करें कि इसी का नाम जिंदगी और इसी का नाम अल्लाह तआला की बंदगी है ।

 #हिंद_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰  पोस्ट 31 (आखरी पोस्ट) मजमूई तौर पर मुसलमानों ने सन् 713 ई0 से 1857 ई0 तक तक़रीबन  #साढ़े_ग...
26/11/2023

#हिंद_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट 31 (आखरी पोस्ट)

मजमूई तौर पर मुसलमानों ने सन् 713 ई0 से 1857 ई0 तक तक़रीबन #साढ़े_ग्यारह_सौ۰ (1150) साल तक हिंद पर हुकूमत की।
मुल्क में अपनी हुक्मरानी के दौरान मुसलमानों ने बिलखुसूस उनके हुक्मरां ने अपने हम वतनों के साथ गैर मामूली रवादारी का मुज़ाहिरा किया, किसी को जबरन मुसलमान नही बनाया, हर एक को मज़हबी आज़ादी दी, यहाँ तक के बाशिन्दों को तहज़ीब व सकाफ़त से आशना किया, अदल व इंसाफ और हुकूमत करने का तरीका सिखाया, ताज महल, कुतुब मीनार, लाल किला और गोल गुंबद की शकल में फल तामीर का आला नमूना दिया, गर्ज़ ये के सकाफत व सियासत, सनअत व हरफ़्त और तिजारत व ज़राअत में पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान का सर बुलन्द किया ।

लेकिन अफसोस के आज़ादी के बाद मुल्क की जो तारीख लिखी की गई और जिसको सरकारी निसाब में शामिल भी किया गया है उसमें सरासर खानदान से काम लिया गया, उन किताबों के मुतालआ से एक आम और गैर जानिबदार तालिबे इल्म और कारी को ये तास्सुर मिला के हिन्दुस्तान पर हुक्मरानी करने वाले मुसलमानों का सलूक हम वतन रिआया के साथ गैर इन्सानी था, हालांके गैर जानिबदार गैर मुस्लिम मुअर्रिखीन ने जो सही तारीख बाद में लिखी उन्होंने उसमें इन हुक्मरानों की अपने हम वतनों के साथ मज़हबी रवादारी और अदल व इंसाफ की ऐसी मिसालें ज़िक्र की है जो इन मुतासिब मुअर्रिखीन के इस इल्ज़ाम से मेल नही खाते।

हिन्दुस्तान के बाशिन्दों पर यहाॅ के मुसलमानों का सबसे बड़ा अहसान ये था के उन्होंने उनको तोहीद जैसी अजीम नेअमत से आगाह किया, खुदा शनासी से सरफराज़ किया और उनकी एक बहुत बड़ी तादाद को इस्लाम और ईमान की दोलत से बहरूर किया।

हिन्दुस्तान में इस्लाम की इशाअत में इन मुस्लिम हुक्मरां से ज़्यादा इन मुख्तलिफ बुजुर्गाने दीन और अहलुल्लाह व उलमा हक का हिस्सा था जिनकी कोशिशों से हिन्दुस्तान के गोशा गोशा में इस्लाम फेला, उन्ही उल्मा रबानिय्यीन के अख़लाक़ व किरदार से मुतास्सिर होकर लाखों अफराद दाखिले इस्लाम हुये, उनमें सरे फेहरिस्त हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिशती रह़मतुल्लाह अलैह हज़रत शरफुद्दीन यहया मंत्री रह़मतुल्लाह अलैह हज़रत बू अली शाह कलन्दर पानीपती रह़मतुल्लाह अलैह, हज़रत बाबा गंज ए शकर रह़मतुल्लाह अलैह, बू हज़रत दाता गंज बख्श रह़मतुल्लाह अलैह, हज़रत मुजद्दि अल्फ सानी रह़मतुल्लाह अलैह, हज़रत शाह वलीअल्लाह रह़मतुल्लाह अलैह वग़ैरा है
अल्लाह तआला इन सबको पूरी मिल्लत की तरफ से जजा-ए-ख़ैर अता फरमाये । आमीन

 #हिंद_कि_तारिख़_में_इस्लाम   पोस्ट 30 #सल्तनत_कशमीर۰सन् 1346 ई0 ता सन् 1584 ई0 कशमीर की सल्तनत का बानी शाहमीर था जिसने ...
18/11/2023

#हिंद_कि_तारिख़_में_इस्लाम पोस्ट 30

#सल्तनत_कशमीर۰

सन् 1346 ई0 ता सन् 1584 ई0 कशमीर की सल्तनत का बानी शाहमीर था जिसने कशमीर के राजा औधन के इन्तिकाल के बाद शमसुद्दीन के लकब से हुकूमत पर कब्ज़ा कर लिया जिसके बाद इसके लड़के जमशेद ने फिर उसके भाई सुल्तान अलाउद्दीन ने इक्तिदार संभाला,

उसके बाद उसके लड़के शहाबुद्दीन के पास हुकूमत रही, सन 1382 ई0 में उसके इन्तिकाल के बाद उसका भाई कुतबुद्दीन उसका जानशीन हुआ, उसी के ज़माने में मशहूर बुजुर्ग और सूफी व आम हज़रत मीर सैय्यद अली हमदानी कशमीर तशरीफ लाये जिनके हाथों पर हज़ारों लोगों ने इस्लाम कबूल किया, इसके बाद मुख्तलिफ़ बादशाहों की यहाँ खुद मुख्तार हुकूमत रही यहाॅ तक के सन् 1584 ई0 में मुग़ल बादशाह जलालुद्दीन अकबर ने कशमीर को मुगलिया सल्तनतन में शामिल कर लिया ।

मालवा की सल्तनत :

मालवा मौजूदा सूबा मध्य प्रदेश में एक तारीखी खित्ता है जहाँ मुसलमानों की तक़रीबन पौने दो सौ साल तक खुद मुख्तार मुस्लिम हुकूमत रही, इसी का पाया तख़्त मांड़ो था उसका पहला बादशाह दिलावर खान गोरी था जो मौहम्मद शाह के ज़माने में सन् 1388 ई0 में यहाँ का गवर्नर था, उसका लड़का होशंग उसका जानशीन हुआ, उसके बाद मुख्तलिफ लोग हुक्मरां रहे, सन् 1542 ई0 में शेरशाह सूरी ने इस पर कब्ज़ा कर लिया, सन् 1562 ई0 में मुग़ल बादशाह अकबर ने उसको मुगलिया सल्तनत में शामिल कर लिया, मालवा की सल्तनत में खूबसमरत महलातत, आलीशान मसाजिद और मजबूत किले तामीर हुये, उसमें एक ऐसी मस्जिद भी थी जिसकी तीन सौ साठ मेहराबें और दो सौ तीस मीनार थे, उसके निशानात आज भी वहाँ मौजूद है।

अरकाट की सल्तनत

जुनूबी हिन्द में सल्तनत मैसूर के करीब अपने मकबूज़ा इलाके का नाम मुगल हुक्मरां ने कर्नाटक रखा था, जिसको अरकाट भी कहा जाता था, यहाॅ के बारिशन्दे तामिल ज़बान बोलते थे, उसी से मुतसल एक दूसरे सूबे का नाम सरा था. (अरकाट अब मौजूदा सूबे तामिलनाडू में चनाई (मद्रास) के करीब सिर्फ एक शहर का नाम रह गया है) सन् 1743 ई0 में अनवारूद्दीन नाम के एक शख़्स ने अरकाट की हुकूमत वहाँ के हुक्मरां खानदान से छीन ली, सन् 1751 ई0 में अरकाट के नवाब अनवारूद्दीन के बैटे मौहम्मद अली और पुराने हुक्मरां खानदान के एक शख़्स चन्दां साहब के दर्मियान अरकाट के इक्तिदार के लिये जंग हुई, नवाब मौहम्मद अली का अंग्रेजों ने साथ दिया और चन्दां साहब का फ्रांसीसियों ने।

उसमें अंग्रेजों को फतेह हुई, चन्दां साहब मारा गया जिसके बाद अंग्रेजों ने नवाब मौहम्मद अली को कठपुतली बनाकर बहाल रखा और खुद अरकाट पर हुकूमत करने लगे, इसके इवज़ उन्होनें देहली से मौहम्मद अली को अरकाट की नवाबी का फरमान दिलाया, सन् 1795 ई० में नवाब मौहम्मद अली का इन्तिकाल हो गया और बराये नाम हुकूमत इसके खानदान में रही यहीं से हिन्दुस्तान में फ्रांसीसियों का जवाल शुरू हुआ।

 #हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 29 #मद्रास۰ की खुद मुख्तार मुस्लिम सल्तनत:जुनूबी हिन्द के मशरिकी इलाके को अरब माबर...
09/11/2023

#हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 29

#मद्रास۰ की खुद मुख्तार मुस्लिम सल्तनत:

जुनूबी हिन्द के मशरिकी इलाके को अरब माबर कहते थे, इस इलाके में मौहम्मद तुग़लक़ के ज़माने में पंजाब के सैय्यद खानदान से ताल्लुक रखने वाले एक फौजी अफसर सैय्यद हसन को गवर्नर मुकर्रर किया गया था जिसने सन् 1334 ई0 में तुग़लक़ खानदान से बगावत करते हुये यहाँ अपनी खुद मुख़्तारी का ऐलान कर दिया और अपना नाम जलालुद्दीन हसन शाह रखा, पाँच साल के बाद उसको क़त्ल कर दिया गया जिसके बाद उसके एक वज़ीर अलाउद्दीन ओध जी ने सल्तनत पर कब्ज़ा कर लिया।

सन् 780 हि० मुताबिक सन् 1378 ई0 में इस सल्तनत का खातमा हो गया, इस सल्तनत का पाया तख़्त मौजूदा तामिलनाडू में मदोराये था।

सल्तनत गुजरात ۰۰

मौहम्मद शाह तुगलक की देहली पर हुक्मरानी क ज़माने में ज़फर खान गुजराती को गुजरात का हाकिम बनाया गया था जिसने सन् 1407 ई० सल्तनत देहली के खिलाफ बगावत करके अपनी खुद मुखतारी का ऐलान कर दिया ओर अपना नाम मुजफ्फर शाह रखा, सन् 1410 ई0 में उसके इन्तिकाल के बाद उसका पोता अहमद शाह उसका जानशीन हुआ, उसी ने गुजरात में दरिया-ए-साबरमती के किनारे अहमदाबाद का शहर अपने नाम से बसाया, वोह बड़ा दीनदार था, उसने 33 साल मुसलसल हुकूमत की, उसके पास बहरी बेड़ा भी था।

उसके बाद उसके लड़के मौहम्मद शाह ने हुकूमत संभाली, सन् 1458 ई0 में उसके इन्तिकाल के बाद उसके भाई फतेह खान महमूद शाह ने मूसलसल पचास साल हुकूमत की, इसी का बैटा मुजफ़्फ़र हलीम गुजराती था जो इन तमाम बादशाहों में सबसे ज़्यादा दीनदार और हाफिजे कुरान भी था, सन् 1572 ई० में मुग़ल बादशाह अकबर ने गुजरात पर क़ब्ज़ा करके उसको अपनी सल्तनत में शामिल किया और गुजरात की इस 165 साला हुकूमत का खातमा हो गया, इन बादशाहों ने अहमदाबाद के अलावा दूसरे मतअदद नये शहर भी बनाये जिसमें अहमद नगर, महमूदाबाद, मुजफ़्फ़राबाद और सुल्तानपुर वग़ैरा शामिल है, उनके अहद में तिजारत ओर ज़राअत को बड़ी तरक्की मिली, यहाॅ की बन्दरगाहो से इराक, ईरान, यमन, मिस्र और अफरीका के मुमालिक को हिन्दुस्तानी सामान तिजारत बरामद किया जाता था ।

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 #हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰   पोस्ट - 28 #सल्तनत_खुदादाद۰ (सल्तनते मैसूर टीपू सुल्तान 🥰)मक्का मुकर्रमा से सतरहवीं सदी ...
28/10/2023

#हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 28

#सल्तनत_खुदादाद۰ (सल्तनते मैसूर टीपू सुल्तान 🥰)

मक्का मुकर्रमा से सतरहवीं सदी में एक अरब खानदान तलाशे रोज़गार में इराक व ईरान होते हुए पंजाब आया, फिर वहाँ से जुनूबी हिन्द में हिन्दु सल्तनत विजयनगर के ज़वाल के बाद मौजूद कर्नाटक में मैसूर शहर के क़रीब आकर बस गया, उसी खानदान के एक फर्द हैदर अली ने मैसूर के राजा कृष्णाराज के पास फौजी मुलाज़मत शुरू की, सन् 1752 ई0 में वोह मैसूर के करीब डंडेगल के गवर्नर बने जिसके बाद अपने खिलाफ होने वाली बगावत को नाकाम करके उन्होंने सन् 1761 ई0 में सल्तनत मैसूर पर कब्ज़ा कर लिया और उसका नाम सल्तनत खुदादाद रखा।

मैसूर व श्रीरंगापटनम पर हैदर अली के कब्जे के वक़्त उनके पास सिर्फ 33 गांव थे, लेकिन 1782 ई0 में उनकी वफ़ात के वक्त उस हुकूमत का दायरा 80 हज़ार मुरब्बा मील तक पहुँच गया था, उनकी वफ़ात के बाद से सन् 1799 ई० तक सल्तनत खुदादाद पर उनके साहिबजादे सुल्तान टीपू का कब्जा रहा ।

इस दौरान हैदर अली व टीपू सुल्तान की अंग्रेजों के साथ चार बड़ी जंगें हुई, पहली जंग में अंग्रेजों का हैदाराबाद के निज़ाम, अरकाट के नवाब मौहम्मद अली और मराठों ने साथ दिया, उसमें अंग्रजों को पस्पा होना पड़ा दूसरी जंग सन् 1780 ई0 में हुई और ये सिलसिला सन् 1784 ई0 तक चला, इसमें अगरचे सल्तनत खुदादाद का पलड़ा भारी रहा लेकिन आखिर में दोनों फ़ीक़ों के दर्मियान सुलह हुई, तीसरी जंग सन् 1790 ई0 से 1792 ई० तक जारी रही, उसमें भी अखीर में सुलह हुई और सल्तनत खुदादाद का निस्फ़ हिस्सा मअ तीन करोड़ रूपये अंग्रेजों को मिला, चौथी जंग सन् 1799 ई0 में हुई जिसमें सुल्तान टीपू शहीद की शहादत का अज़ीम सांहा पेश आया और हिन्द की आज़ादी का परचम सरंगों हो गया और पहली दफा टीपू की शहादत के बाद अंग्रेजों की ज़बान से ये जुमला निकला के

"आज से हिन्दुस्तान हमारा है"

इसके बाद रस्मी तौर पर सल्तनत मैसूर के तख़्त पर साबिक़ राजा के पाँच साला बैटे शनाराज सोम को बैठाया दिया गया और अमलन अंग्रेजों ही का इस पर कब्ज़ा हो गया।

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 #हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰  पोस्ट - 27 #हनूर۰ की अरबी इस्लामी सल्तनत :जुनूबी हिन्द में गैर मुस्लिमों की खालिस मज़हबी स...
24/10/2023

#हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 27

#हनूर۰ की अरबी इस्लामी सल्तनत :

जुनूबी हिन्द में गैर मुस्लिमों की खालिस मज़हबी सल्तनत विजयनगर के ज़माने में बहरे अरब के साहिली इलाके में आठवीं सदी हिजरी यानी सन् 630 हि0 में मौजूदा सूबा गोवा से जुनूबी जानिब मग़रिबी घाट में सूबा कर्नाटक के मौजूदा ज़िला कारवार में भटकल से क़रीब हनूर (हिनावर) शहर के साहिली खित्ते में अरबों से नसली ताल्लुक रखने वाले कबीले नवाईत के मुसलमानों की एक अलग इस्लामी हुकूमत कायम थी जिसको मुअर्रिखीन सल्तनत हनूर के नाम से याद करते है।

उसका बादशाह सुल्तान जमालुद्दीन बिन हसन था जिसके पास एक मजबूत बहरी बेड़े के अलावा छः हज़ार की फौज थी, पडोस की गैर मुस्लिमों की गोवा की सल्तनत के साथ एक जंग में इस मुस्लिम सल्तनत का खातमा हुआ, इस सल्तनत के क़याम के दौरान मशहूर आलमी सियाह इब्ने बतूता हिन्द में मुक़ीम थे, वोह यहाँ भी पहुँचे और अपने सफर नामा में इस जगह का खुसूसयित के साथ ज़िक्र करते हुये तहरीर किया के यहाॅ मैंने 23 दींनी मदरसे देखे जिसमें सिर्फ लडकियों के लिये 13 मदरसे खास थे, हिफ़्ज़ कुरान का यहाँ के बाशिन्दों में आम रिवाज था, मुसलमानों के मसाईल के हल के लिये दारूक्कुजा कायम था, यहाॅ के मुसलमान अरबी असलन, शाफई उल मसलक और तिजारत पैशा थे, गैर मुसलमानों की आबादी जैन मत से ताल्लुक रखती थी, आज कल भटकल (कर्नाटक) व आस पास में आबाद मुसलमान इसी अरबी अलनसल कबिला नवाईत से ताल्लुक रखते है।

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 #हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 26 #इमादशाही_सल्तनत۰ये बहुत छोटी हुकूमत थी जो सन् 1475 ई0 से सन् 1576 ई0 तक तकरीबन...
21/10/2023

#हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 26

#इमादशाही_सल्तनत۰

ये बहुत छोटी हुकूमत थी जो सन् 1475 ई0 से सन् 1576 ई0 तक तकरीबन 100 साल रही, बरार (महाराष्ट्र) इसका पाया तख़्त था, इस सल्तनत का बानी फतेहउल्लाह इमादुल्मुल्क था इसी निसबत से उसकी हुकूमत इमाद शाही कहलाई, वोह महमूद शाही बहमनी के अहद में बरार का गवर्नर था और नया नया मुस्लिम था, उसका जानशीन उसी का लड़का अलाउद्दीन इमादशाह हुआ, उनका आखरी बादशाह बुरहान इमादशाह था।

बहमनी सल्तनत के ज़वाल के बाद सबसे पहले अपनी खुद मुख्तारी का ऐलान करने वाली यही इमादशाही हुकूमत थी, अहमद नगर निज़ाम शाही हुकूमत ने सन् 1576 ई0 में उसको अपनी सल्तनत में जम कर दिया, विजय नगर कि गैर मुस्लिम सल्तनत के खिलाफ मुस्लिम हुकूमतों के मुत्तेहदा मुहाज़ में ये हुकूमत शरीक नही थी।

#बुरैदशाही_सल्तनत۰

महमूद शाह बहमनी के ज़माने में मराठा खित्ते के गवर्नर महमूद कासिब बुरैद था जिसने मौका पाकर सन् 1526 ई0 में अपनी खुद मुख्तारी का ऐलान कर दिया, इस सल्तनत का पाय तख़्त मौजूदा कर्नाटक में बैदर शहर था, सन् 1609 ई0 इस सल्तनत का खातमा हुआ, उनका आखरी बादशाह अमीर बुरैद दोम था, इन खानदान की हुकूमत तक़रीबन तिरासी (83) साल रही।

 #हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 25 #आदिलशाही_सल्तनत۰मौजूदा कर्नाटक में बेजापुर के इलाके में ये सल्तनत कायम थी। शहर...
19/10/2023

#हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 25

#आदिलशाही_सल्तनत۰

मौजूदा कर्नाटक में बेजापुर के इलाके में ये सल्तनत कायम थी। शहर बेजापूर उसका पाया तख़्त था, इस सल्तनत का कयाम बहमनी सल्तनत के आखरी अहद में सन् 1489 में अमल में आया, इसका बानी आदिल शाह था जो बहमनी सल्तनत में बेजापुर का सूबेदार था, उसने शिआ मज़हब इख़्तियार कर लिया था।

उसने सन् 1509 ई0 में पुर्तगालियों को शिकस्त देकर गोवा पर भी कब्ज़ा कर लिया, सन् 1510 में उसकी वफ़ात के बाद उसके बैटे इस्माईल आदिल शाह ने इक्तिदार संभाला, उसके बाद मलू आदिल शाह ने, फिर उसके बाद उसे भाई इब्राहीम आदिल शाह ने जिसने शिईयत से तोबा करके सुन्नी हनफी मस्लिक इख़्तियार कर लिया था लेकिन उसके बैटे अली आदिल शाह ने दोबारह शिआ मज़हब इख़्तियार कर लिया। उसी के ज़माने में आस पास की मुस्लिम हुकूमतों ने मुत्तेहदा महाज़ कायम करके विजयनगर की गैर मुस्लिम हुकूमत का तालीकोट के मैदान में सन् 1564 ई0 में खात्मा किया था।

सन् 1685 ई0 में हज़रत औरगजैब के ज़माने में बेजापुर की इस आदिलशाही सल्तनत को सल्तनते मुग़लया में शामिल किया गया, बेजापुर के मुस्लिम बादशाहों को मसाजिद और खूबसूरत तामीरात का बड़ा अच्छा जौक था जिसके नमूने आज भी इन इलाकों में देखे जा सकते है।

 #हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 24निज़ाम शाही सल्तनत :ये मुस्लिम  #हुकूमत۰ सन् 1489 ई0 ता सन् 1636 ई० तकरीबन डेढ़ ...
15/10/2023

#हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 24

निज़ाम शाही सल्तनत :

ये मुस्लिम #हुकूमत۰ सन् 1489 ई0 ता सन् 1636 ई० तकरीबन डेढ़ सौ साल कायम रही, उसका पाया ऐ तख़्त मौजूदा सूबा महाराष्ट्र में अहमद नगर शहर था जिसको उन्होंने बसाया था, उस सल्तनत का बानी निज़ाम शाह नया नया मुस्लिम था।

सन् 1508 ई0 में उसकी वफ़ात के बाद उसका लड़का बुरहान निज़ाम शाह उसका जानशीन हुआ जिसने शिआ मज़हब इख़्तियार कर लिया था लेकिन रिआया सुन्नी ही थी।उसके बैटे हसन निज़ाम शाह ने तालीकोट के मैदान में विजयनगर की हिन्दु सल्तनत के खातमा के लिये मुत्तेहदा मुस्लिम हुकूमतों के मुहाज़ में शिकरत की थी सन् 1536 ई0 में ये हुकूमत मुग़ल हुक्मरां शाहजहाँ के ज़माने में मुगलया सल्तनत में शामिल कर ली गई, इनका आखरी बादशाह मुस्तजा निजाम शाह सोम था।

कुतुबशाही सल्तनत :

इस सल्तनत का पाया ऐ तख़्त आंध्रा प्रदेश में गोलकुंडा था और हुकूमत पूरे तेलंगाना खित्ते पर थी जहाँ तेलगू जबान बोली जाती थी, उनकी हुकूमत दो सौ साल से ज़्यादा रही। इस सल्तनत का बानी सुल्तान कुतुबशाह था जो खुद शिआ था । वोह मौहम्मद शाह बहमनी की हुकूमत में तेलंगाना का गवर्नर था, सन् 1543 ई0 में 90 साल की उम्र में उसको कत्ल कर दिया गया जिसके बाद उसका लडका जमशेद कुतुब शाह उसका जानशीन हुआ, सन् 1686 ई0 में हज़रत औरंगजैब आलमगी़र ने उसको मुगलिया सल्तनत में शामिल कर दिया, उनका आखरी बादशाह अबुलहसन तानाशाह था, हैदराबाद की मशहूर मक्का मस्जिद, चार मीनार और हुसैन सागर की झील वग़ैरा उन्ही के अहद की यादगारें हैं।

 #हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 23बहमनी सल्तनत : शुमाली हिन्द मे दकन के इलाके में सन् 1347 ई0 में मौहम्मद तुग़लक़ ...
30/09/2023

#हिन्द_कि_तारिख़_में_इस्लाम۰ पोस्ट - 23

बहमनी सल्तनत :

शुमाली हिन्द मे दकन के इलाके में सन् 1347 ई0 में मौहम्मद तुग़लक़ कि देहली पर हुक्मरानी के ज़माने में एक बगावत के जरीये अलाउद्दीन हसन नामी एक शख़्स ने इस बहमनी सल्तनत को कायम किया, ये सल्तनत तकरीबन 200 साल कायम रही, इसका पाया तख़्त मोजूदा रियासत कर्नाटक का तारीखी शहर "गुलबरगा" था जिसका नाम उस वक़्त उन्होंने "हुसनाबाद" रखा था, उसके बाद पाया तख्त "बैदर" मुन्तकिल हो गया, इस खानदान में दस बादशाह हुये पहला "अलाउद्दीन हसन" और आखरी "कलीमुल्लाह बहमनी" था जिसका इन्तिकाल सन् 1527 ई0 में हुआ और उसके साथ ही बहमनी सल्तनत का भी खात्मा हो गया।हज़रत नसीरूद्दन चिराग़ देहलवी के खलीफा और मशहूर बुजुर्ग हज़रत ख्वाजा बन्दा नवाज़ा गैसूदराज़ का मजार उसी गुलबरगा में है जिनसे इस मुल्क में ईशाअत इस्लाम का बड़ा काम अंजाम पाया।

अपने ज़वाल के बाद बहमनी हुकूमत पाँच छोटी छोटी सल्तनतों में तकसीम हो गई: 👇

(1) निज़ाम शाही ( अहमद नगर) (2) कुतुब शाही (गोलकंड़ा) (3) आदिल शाही (बेजापुर) (4) इमाद शाही (बुरार) (5) बुरैद शाही (बैदर)

इन सब बिखरी हुई सल्तनतो कि तफ़सीलात इंशा अल्लाह हम आगे आने वाली पोस्टो में पढ़ेंगे

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