21/10/2025
इनका उद्धार होना बाकी है । कुछ तो , लगभग न के बराबर हुआ है , बहुत कुछ होना बाकी है । लगभग सबकुछ होना बाकी है। राजनयिक , राजनैतिक अधिकार पर सबसे ज्यादा और वाजिब हक इनका बनता है पर वो कोसों दूर है । कम से कम इनके सामाजिक अधिकारों पर ही कुछ हो । और भी तबके हैं जो इसी हालात में जीने को मजबूर हैं। गरीबी से बड़ा कोई अभिशाप नहीं ।
बिहार में एक नेता मिला भी , पर वो भी निस्वार्थ नहीं रह पाए , बस परिवार परिवार । जमीनी स्तर पर उन्होंने और लोगों , सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर लोगों को तैयार किया ही नहीं। फिलवक्त तो कम से कम बिहार में सरकारी अस्पताल, स्कूल के हालात सुधरे , मनरेगा में लूट होना बंद हो और इनको वहां काम और बिना कमीशन काटे पैसा मिले तो कुछ बात बने । यही कमी रही वर्तमान सरकार की भी , बस महादलित कैटेगरी बनाने से काम चलेगा क्या ? सरकार चाह लगेगी और जमीनी स्तर पर काम न हो क्या ये संभव है ? CDPO से काम करवाए , NGOs से करवाए । बस कागजी स्तर पर जब तक काम होता रहेगा तो हम सब ये देख कर बस कितना और क्या ही कर सकते हैं। जिससे जो बन पड़ता है , करते ही हैं लोग , जो करते हैं वो । बाकी तो ....
यकीन मानिए ये चर्चा का विषय तो है और ख़ुशी की बात है कि किसी ने फिर से ये कवर किया । महादलित के अंदर अपने दशा सुधारने के लिए जागरण की जरूरत है , ये की इनका वोट बस पाठा और पव्वा से नहीं खरीदा जा सकता है । इनमें ये जागरूकता जगाना चाहिए , और उससे भी जरूरी की इनके अंदर से आवाज जब तक नहीं आएगी तब तक दिक्कत है । इनके लगभग हर परिवार से १४ वर्ष के लड़के से ३४ वर्ष पलायन कर , हैदराबाद , सूरत , भोपाल , दिल्ली , बम्बई जाकर जो पैसा भेज रहे , कुछ को कुछ हुड तक इंदिरा आवास, मिड डे मील , अनाज मिलने , डीबीटी और मनरेगा से इनकी माली हालात सदियों में पहली बार हालात कुछ तो सुधरा है । मेरे गांव , ननिहाल सुसराल और इधर के गांव , शहर , भागलपुर में बरारी के मुसहरी का देखा , जाना , समझा और जीए से बता रहा । अब ये लोग लोकली भी टोटो चल कर कुछ कमा रहे , कुछ भाड़े के गाड़ी में ड्राइवर का काम भी कर रहे । पर अभी बहुत कुछ होना बाकी है। लगभग सबकुछ । एकदम मूलभूत, मानवीय अधिकारों से Art २१ में गारंटीड Right to Life and Personal Liberty से , in fact आज Livable Conditions से वंचित समाज।
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Musahar Documentary News Pinch: In the era of the 21st Century, a silent village of Bhojpur, Bihar, where dust settles on dreams and hunger hums its own tun...