15/11/2025
देश में आज जो कुछ भी हो रहा है, उसे समझने के लिए सिर्फ एक नाम याद रखिए: ज्ञानेश कुमार।
जिस व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) बनाने के लिए इतिहास में पहली बार चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाया गया,
क्या उससे कभी निष्पक्ष चुनावों की उम्मीद की जा सकती है?
ये नियुक्ति नहीं थी,
ये लोकतंत्र के गले पर रखा गया एक सुनियोजित फंदा था।
🔸 कौन हैं ज्ञानेश कुमार?
वो व्यक्ति जिसने वर्षों तक गृह मंत्रालय में अमित शाह के सचिव के रूप में काम किया।
जिसे सत्ता के गलियारों में अमित शाह का "सबसे भरोसेमंद अफसर" कहकर पेश किया गया।
🔸 CJI को हटाने की क्यों ज़रूरत पड़ी?
अगर नियुक्ति पारदर्शी होती,
अगर व्यक्ति निष्पक्ष होता,
अगर प्रक्रिया ईमानदार होती,
तो CJI को पैनल से हटाने की क्या मजबूरी थी?
इस देश के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ:
चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति से न्यायपालिका की निगरानी को हटाना
सीधी, खुली और अनैतिक हेराफेरी थी।
🔸 क्या उम्मीद थी कि ऐसे व्यक्ति के रहते चुनाव निष्पक्ष रहेंगे?
एक ऐसा व्यक्ति जो सीधे अमित शाह के मातहत रहा हो, जिनका पूरा करियर एक ही राजनीतिक नेतृत्व के इशारों पर गुज़रा हो,
क्या वो कभी उनके खिलाफ होने वाले चुनावों की ईमानदार निगरानी कर सकता है?
क्या वो कभी
दबाव से मुक्त रह सकता है?
या रहना चाहता भी है?
ये सवाल नहीं, जवाब खुद अपने आप में खड़े हैं।
🔸 इसी वजह से बिहार में क्या हुआ?
• वोटर लिस्ट में 68 लाख नाम डिलीट
• 22 लाख अदृश्य नए मतदाता जोड़ना
• बाहरी वोटरों को ट्रेनों में भरकर लाना
• आदर्श आचार संहिता के दौरान 1.3 करोड़ खातों में 10,000 रुपये डाले गए,
ये सब उसी सिस्टम का नतीजा है
जहाँ CEC के रूप में
एक ऐसे व्यक्ति को बिठा दिया गया
जो सत्ता का वफादार कर्मचारी है,
न कि संविधान का सेवक।
🔸 असल खतरा क्या है?
चुनाव की हार-जीत नहीं।
सबसे बड़ा खतरा है,
एक ऐसे CEC का होना
जो लोकतंत्र का संरक्षक नहीं,
सत्ता का अंगरक्षक बन चुका है।
और जब प्रहरी ही झुक जाए,
तो दीवार कितनी देर टिकी रहेगी?
🔸 इस लड़ाई की शुरुआत अभी हुई है…
हमारा संघर्ष
सिर्फ ज्ञानेश कुमार से नहीं,
उन ताकतों से है
जो संवैधानिक संस्थाओं को खरीदकर
लोकतंत्र बेच देती हैं।
हमारा संघर्ष
उस व्यवस्था से है
जिसने CJI को हटाकर
मतदान की आत्मा तक को बेच दिया।
ये सिर्फ राजनीतिक लड़ाई नहीं,
ये लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है।