Badlav

Badlav About Us
Badlav established on 15th September 2015 is registered under the Societies Registration Act, 1860 having 12A and 80G certificates.

Badlav is aimed at uplifting beggars, our greater objective than just charity is to provide them a platform and with all the resources which will support them in rebuilding themselves and live a life of dignity by doing dignified work. Badlav is aimed at uplifting beggars, one of the most marginalized strata of society, and usually not covered under any major Government upliftment scheme. Our grea

ter objective than just charity is to provide them a platform and with all the resources which will support them in rebuilding themselves and live a life of dignity by doing dignified work. Vision
An ecosystem for empowering vulnerable sections of the society through inclusive growth, accessibility to services and building a network of stakeholders. Mission
To recreate the identity of people into beggary, by providing them with sustainable livelihood, thus making them a dignified member of society. This process of change is attained by means of a scalable and replicable model.

आज   में मिलिए रमेश कुमार गुप्ता (नाम बदला हुआ) से। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के 46 वर्षीय रमेश कुमार गुप्ता कभी एक स्...
18/05/2026

आज में मिलिए रमेश कुमार गुप्ता (नाम बदला हुआ) से। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के 46 वर्षीय रमेश कुमार गुप्ता कभी एक स्थिर और सम्मानजनक जीवन जीते थे। उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक इंजन फैक्ट्री और होटलों में काम किया और खाना बनाने व हॉस्पिटैलिटी का अच्छा अनुभव हासिल किया।
माता-पिता के निधन और परिवार के बंटवारे के बाद उन्होंने अपनी जमीन बेचकर एक छोटा होटल शुरू किया। लेकिन वैवाहिक विवाद और तलाक ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। इसके बाद रोज़गार की तलाश उन्हें शहर ले आई।
उन्होंने कई बार जीवन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन एक गंभीर सड़क दुर्घटना में पैर टूट गया और लंबे इलाज में उनकी सारी जमा पूंजी खत्म हो गई। फिर कोविड-19 महामारी ने उनका छोटा व्यवसाय भी बंद करवा दिया।
धीरे-धीरे स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ती गईं—डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट की बीमारी और पैर का लगातार दर्द। परिवार का सहारा न होने के कारण मजबूरी में उन्हें मंदिरों के बाहर बैठकर भीख मांगनी पड़ी।
इसी कठिन दौर में उनका संपर्क बदलाव से हुआ और वे पुनर्वास केंद्र पहुँचे। काउंसलिंग के दौरान उन्होंने अपने दर्द, डर और असफलताओं को साझा किया। धीरे-धीरे उनके भीतर फिर से उम्मीद जागने लगी।
उन्होंने साझेदारी में फूड कार्ट शुरू करने की कोशिश की, लेकिन एक और दुर्घटना में उनका पैर फिर टूट गया। यह उनके लिए बहुत बड़ा झटका था। लेकिन इस बार उन्होंने हार नहीं मानी।काउंसलिंग और सहयोग ने उन्हें यह समझाया कि रुकावटें असफलता नहीं होतीं। स्वास्थ्य में सुधार के बाद उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार एक शाकाहारी फूड कार्ट शुरू किया।
आज रमेश कुमार गुप्ता नियमित रूप से अपना वेज फूड कार्ट चला रहे हैं, आत्मनिर्भर हैं और सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है— “पैर भले ही टूट जाए, लेकिन अगर हिम्मत कायम रहे, तो ज़िंदगी फिर से खड़ी की जा सकती है।”



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आज   में मिलिए रोहित (बदला हुआ नाम) से।  35 वर्षीय रोहित, लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र के निवासी हैं। बचपन से ही एक जे...
15/05/2026

आज में मिलिए रोहित (बदला हुआ नाम) से। 35 वर्षीय रोहित, लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र के निवासी हैं। बचपन से ही एक जेनेटिक बीमारी के कारण उनके पैरों में विकलांगता रही, जो समय के साथ और गंभीर होती गई। लगातार घाव और चलने-फिरने में कठिनाई ने उनके जीवन को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया।
माँ के निधन और पिता के पुनर्विवाह के बाद उन्हें परिवार से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उपेक्षा और पारिवारिक तनाव के कारण उन्हें घर छोड़ना पड़ा।
नाई का काम सीखने के कारण उन्होंने खुद का छोटा काम शुरू किया और धीरे-धीरे जीवन संभलने लगा। लेकिन बढ़ती शारीरिक समस्याओं और पैरों के घावों के कारण उन्हें अपना काम बंद करना पड़ा। इलाज और रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए मजबूरी में उन्हें भीख मांगनी पड़ी।
उन्होंने हार नहीं मानी। फुटपाथ पर छोटी दुकान शुरू करने की कोशिश की, लेकिन तबीयत और बिगड़ती गई। बिना किसी पारिवारिक सहारे के उनका जीवन संघर्षों से भर गया।
इसी दौरान उन्हें बदलाव के बारे में पता चला और वे पुनर्वास केंद्र पहुँचे। यहाँ उन्हें चिकित्सीय सहायता, काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहयोग मिला। समूह सत्रों और मार्गदर्शन ने उनके अंदर फिर से उम्मीद जगाई।
उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्हें छोटे स्तर पर व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित किया गया। आज रोहित अपनी ट्राइसाइकिल के सहारे पान, मसाला और छोटे सामान बेचकर आजीविका चला रहे हैं। इसके साथ ही वे पुनर्वास केंद्र में अन्य लोगों के बाल काटने में भी सहयोग करते हैं।
आज उनका जीवन पहले से कहीं अधिक स्थिर और सकारात्मक है। आत्मनिर्भरता और लोगों से जुड़ाव ने उनके भीतर आत्मविश्वास फिर से जगा दिया है।
रोहित कहते हैं—
“अगर शरीर साथ दे और काम का सहारा मिल जाए, तो हम भी अच्छा जीवन जी सकते हैं।”
उनकी कहानी यह दिखाती है कि सही सहयोग, अवसर और हौसले के साथ कोई भी व्यक्ति कठिन परिस्थितियों से निकलकर सम्मानजनक जीवन की ओर बढ़ सकता है



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आज   में मिलिए डिम्पल (बदला हुआ नाम) से। 25 वर्षीय डिम्पल, लखनऊ की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं, जहाँ पीढ़ियों से ...
14/05/2026

आज में मिलिए डिम्पल (बदला हुआ नाम) से। 25 वर्षीय डिम्पल, लखनऊ की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं, जहाँ पीढ़ियों से “मांगकर खाने” की परंपरा चली आ रही है। आज भी वे अपने बच्चों के साथ शहर के किनारे एक झोपड़ी में बिना मूलभूत सुविधाओं के जीवन जीने को मजबूर हैं।
शिक्षा, पोषण और स्थायी रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने उनके जीवन को बेहद कठिन बना दिया था। बरसात के दिनों में झोपड़ी में पानी भर जाता, भोजन का संकट खड़ा हो जाता और बीमारी के समय उचित इलाज भी नहीं मिल पाता।
इन परिस्थितियों ने डिम्पल को भीतर से तोड़ दिया था। वे खुद को असहाय महसूस करती थीं, लेकिन उनके मन में एक सपना था—अपने बच्चों को बेहतर जीवन देना।
जब उनका संपर्क बदलाव से हुआ तब काउंसलिंग के माध्यम से उनकी भावनाओं और संघर्ष को समझा गया। धीरे-धीरे उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया गया और उन्हें यह एहसास दिलाया गया कि परिस्थितियाँ स्थायी नहीं होतीं।
उनकी स्थिति और क्षमता को ध्यान में रखते हुए उन्हें बकरी पालन से जोड़ा गया। शुरुआत भले छोटी थी, लेकिन धीरे-धीरे यह उनके लिए स्थायी आय का माध्यम बनने लगा।
आज डिम्पल अपने परिवार की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा कर पा रही हैं। उनकी भीख पर निर्भरता कम हो रही है और वे सम्मानजनक व आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ रही हैं। डिम्पल की कहानी यह बताती है कि सही समय पर मिला सहयोग और अवसर किसी भी जीवन में नई आशा जगा सकता है।



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  में आज मिलिए गुड़िया (बदला हुआ नाम) से। 22 वर्षीय गुड़िया, लखनऊ के घैला गाँव की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं। यह...
13/05/2026

में आज मिलिए गुड़िया (बदला हुआ नाम) से। 22 वर्षीय गुड़िया, लखनऊ के घैला गाँव की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं। यह समुदाय आज भी गांव के किनारों पर झोपड़ियों में सीमित संसाधनों के साथ जीवन जीने को मजबूर है। पक्का घर, बिजली और स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधाएँ आज भी उनके लिए एक सपना हैं।
बचपन से ही गुड़िया चौराहों और शहरों में भीख मांगकर परिवार का खर्च चलाने में लगी रहीं। उनके समुदाय में शिक्षा और जागरूकता की कमी इतनी गहरी है कि कई लोगों ने इसे अपनी नियति मान लिया है।
शादी के बाद उनके पति फूल, गजरा और रेडियम पट्टी बेचने का काम करने लगे, लेकिन सीमित पूंजी के कारण आमदनी स्थिर नहीं हो पाती थी। जब कमाई कम पड़ती, तो गुड़िया को फिर से सड़कों पर जाकर भीख मांगनी पड़ती।
वह कहती हैं— “हमें ऐसा जीवन अच्छा नहीं लगता, लेकिन मजबूरी में करना पड़ता है।”
इसी दौरान जब उनका संपर्क बदलाव से हुआ तब बदलाव न उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने और उन्हें बेहतर जीवन की दिशा दिखाने का प्रयास किया ।
उनकी मौजूदा आजीविका को ध्यान में रखते हुए फूल, गजरा और सजावट के काम को व्यवस्थित करने में सहयोग दिया गया। धीरे-धीरे उन्होंने अपने पति के साथ इस काम को मजबूती से आगे बढ़ाना शुरू किया।
आज गुड़िया अपने परिवार के साथ सम्मानजनक जीवन की ओर कदम बढ़ा रही हैं। उनकी आय में सुधार हुआ है, भीख पर निर्भरता कम हो रही है और आत्मनिर्भरता की राह मजबूत हो रही है।
गुड़िया की कहानी यह दिखाती है कि सही सहयोग, मार्गदर्शन और अवसर मिल जाएँ, तो पीढ़ियों से चली आ रही मजबूरियों को भी बदला जा सकता है।



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आज   में जानिए जमुना (बदला हुआ नाम) को। 35 वर्षीय जमुना, लखनऊ के घैला क्षेत्र की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं, जहा...
12/05/2026

आज में जानिए जमुना (बदला हुआ नाम) को। 35 वर्षीय जमुना, लखनऊ के घैला क्षेत्र की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं, जहाँ पीढ़ियों से “मांगकर खाने” और पशुपालन की परंपरा चली आ रही है। शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण उनका समुदाय आज भी सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ है।
जमुना बताती हैं कि उनके समुदाय में बच्चों को सही अवसर नहीं मिल पाते और वे कम उम्र से ही पारंपरिक कामों में लग जाते हैं।
वह कहती हैं—
“कभी-कभी लगता है कि हम इंसान ही नहीं हैं… कोई हमें काम नहीं देता।”
इन कठिन परिस्थितियों के बीच भी जमुना के मन में एक सपना था—अपने बच्चों को वह जीवन देना, जो उन्हें कभी नहीं मिला।
बदलाव से जुड़ने के बाद काउंसलिंग के माध्यम से उनकी भावनाओं, संघर्षों और सपनों को समझा गया। उनकी मेहनत और अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य बनाने की इच्छा को नई दिशा दी गई।
उनकी रुचि और अनुभव को ध्यान में रखते हुए उन्हें बकरी पालन से जोड़ा गया। बदलाव के सहयोग से उन्होंने यह काम शुरू किया, जिससे उन्हें सम्मानजनक और स्थायी आय मिलने लगी।
आज जमुना न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि “बदलावशाला” में बच्चों को पढ़ाने का काम भी कर रही हैं।
वह अपने समुदाय के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उसी संघर्ष में न फँसे रहें।
आज जमुना की पहचान सिर्फ संघर्षरत महिला की नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, आत्मनिर्भर महिला और अपने समुदाय की प्रेरणा के रूप में बन चुकी है।



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आज    मे मिलिए शाहीन (बदला हुआ नाम) से। लखनऊ में एक छोटे किराए के कमरे में रहने वाली 34 वर्षीय शाहीन हमेशा एक शिक्षित और...
11/05/2026

आज मे मिलिए शाहीन (बदला हुआ नाम) से। लखनऊ में एक छोटे किराए के कमरे में रहने वाली 34 वर्षीय शाहीन हमेशा एक शिक्षित और आत्मनिर्भर महिला बनने का सपना देखती थीं। बी.ए. के बाद उन्होंने एक निजी स्कूल में पढ़ाया भी, लेकिन शादी के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी।
हार न मानते हुए उन्होंने घर से ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और बाद में एक छोटी दुकान भी खोली। पति की मजदूरी और उनकी आय से किसी तरह घर चल रहा था।
लेकिन एक हादसे ने सब बदल दिया—पति को करंट लगने से गंभीर चोट आई और उनकी आय बंद हो गई। इसी दौरान शाहीन की दुकान भी बंद हो गई और परिवार को कई महीनों तक दूसरों के सहारे रहना पड़ा।
एक समय जो खुद पढ़ाती थीं, उन्हें मजबूरी में मदद मांगनी पड़ी—इसने उनके आत्मसम्मान को गहराई से झकझोर दिया।
बदलाव से जुड़ने के बाद काउंसलिंग ने उन्हें फिर से संभाला। उन्होंने समझा कि यह परिस्थिति अस्थायी है, उनकी पहचान नहीं। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को फिर से एक मजबूत महिला के रूप में देखना शुरू किया।
मार्गदर्शन और सहयोग से उन्होंने अपनी दुकान दोबारा शुरू की—इस बार बेहतर योजना और आत्मविश्वास के साथ।
आज शाहीन फिर से आत्मनिर्भर हैं। उनकी दुकान चल रही है, परिवार की स्थिति सुधर रही है और बच्चों की पढ़ाई सुरक्षित है।
उनकी कहानी यह सिखाती है कि शिक्षा, आत्मविश्वास और सही सहयोग के साथ, हर महिला अपने जीवन को फिर से संवार सकती है।



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एक माँ सिर्फ़ जीवन नहीं देती, वह हर दिन उम्मीद को भी जन्म देती है। ❤️मिलिए माया से जो बदलाव की 2019 बैच की लाभार्थी हैं,...
10/05/2026

एक माँ सिर्फ़ जीवन नहीं देती, वह हर दिन उम्मीद को भी जन्म देती है। ❤️
मिलिए माया से जो बदलाव की 2019 बैच की लाभार्थी हैं, जिन्होंने संघर्षों के बीच भी अपने बच्चों के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया।

हर चुनौती के सामने डटकर खड़ी रहने वाली माया उन लाखों माताओं की आवाज़ हैं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों के भविष्य के लिए हर दिन लड़ती हैं।

इस Mother’s Day पर बदलाव का सलाम उन सभी संघर्षशील माताओं को, जो अपने साहस, त्याग और प्रेम से दुनिया बदल रही हैं। 🌸



वीडियो साभार: Shades of Rural India

माया की उम्र करीब चालीस साल है। घर छोड़ने के बाद कई सालों तक उनका पता लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंब....

आज   में मिलिए पवन (बदला हुआ नाम) से।  46 वर्षीय पवन, लखनऊ के निवासी, नट समुदाय से आते हैं—जहाँ पीढ़ियों से भीख मांगना ह...
09/05/2026

आज में मिलिए पवन (बदला हुआ नाम) से। 46 वर्षीय पवन, लखनऊ के निवासी, नट समुदाय से आते हैं—जहाँ पीढ़ियों से भीख मांगना ही जीवन का साधन रहा है। बचपन से आंशिक रूप से दिव्यांग होने के कारण उनके लिए अवसर और भी सीमित रहे। पत्नी और चार बच्चों के साथ वे बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन बिता रहे थे।
कभी पशुपालन का प्रयास किया, लेकिन बीमारी से जानवरों की मृत्यु होने पर सारी जमा पूंजी खत्म हो गई और उन्हें फिर से भीख मांगने पर मजबूर होना पड़ा। न आधार, न राशन कार्ड—सरकारी योजनाओं से भी वंचित रहे।
लेकिन पवन के भीतर एक सपना था—अपने बच्चों को उस जीवन से बाहर निकालना, जिसमें उन्होंने खुद संघर्ष किया।
बदलाव से जुड़ने के बाद काउंसलिंग और मार्गदर्शन ने उनकी सोच को नई दिशा दी। उनकी मेहनत करने की इच्छा को पहचानते हुए उन्हें आजीविका से जोड़ा गया।
आज पवन सब्जी का ठेला लगाकर नियमित आय कमा रहे हैं। शुरुआत कठिन थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अब वह भीख की मजबूरी से बाहर निकलकर सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं और अपने परिवार की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सही सहयोग और मजबूत इरादों से बदलाव संभव है।



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आज   में जानिए वाराणसी के मूल निवासी 44 वर्षीय अरविन्द जयसवाल (बदला हुआ नाम) के संघर्ष, मेहनत और सहनशीलता की कहानी। आर्थ...
08/05/2026

आज में जानिए वाराणसी के मूल निवासी 44 वर्षीय अरविन्द जयसवाल (बदला हुआ नाम) के संघर्ष, मेहनत और सहनशीलता की कहानी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में जन्मे अरविन्द को कम उम्र में ही रोज़गार की तलाश में घर छोड़ना पड़ा। पढ़ाई अधूरी रह गई, क्योंकि जीवन यापन ही प्राथमिकता बन गया।
परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने साइकिल रिक्शा चलाना और दिहाड़ी मजदूरी शुरू की। जो कमाते, उसका एक हिस्सा घर भेजते थे। लेकिन समय के साथ रिश्तों में दूरी बढ़ी और वह पूरी तरह अकेले पड़ गए।
तकनीकी बदलावों ने भी उनकी आजीविका को प्रभावित किया—ई-रिक्शा आने से उनकी आय घटती गई। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य समस्याओं के कारण काम मिलना मुश्किल हो गया। कई रातें फुटपाथ पर गुजारनी पड़ीं और कई दिन मंदिरों के सहारे बीते।
इसी दौरान उनका संपर्क बदलाव से हुआ। काउंसलिंग के माध्यम से उन्होंने अपने संघर्ष को समझा और खुद को फिर से पहचानना शुरू किया। उन्हें यह एहसास हुआ कि उनकी स्थिति उनकी असफलता नहीं, बल्कि परिस्थितियों का परिणाम है।
आजीविका के लिए उन्हें मूंगफली का छोटा व्यवसाय शुरू करने में सहयोग मिला। धीरे-धीरे उनका काम चल निकला और आय स्थिर होने लगी।
आज अरविन्द आत्मविश्वास के साथ अपना ठेला चलाते हैं, सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं और कहते हैं—
“अब लगता है कि मैं भी अपने दम पर जी सकता हूँ।”
उनकी यह यात्रा फुटपाथ से आत्मसम्मान तक की है—एक सच्ची “बदलाव की दस्तक”।



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आज   में जानिए कहानी आसिफ अली की। लखनऊ के 51 वर्षीय आसिफ अली (बदला हुआ नाम) कभी एक मेहनती और आत्मनिर्भर जीवन जीते थे। सी...
07/05/2026

आज में जानिए कहानी आसिफ अली की। लखनऊ के 51 वर्षीय आसिफ अली (बदला हुआ नाम) कभी एक मेहनती और आत्मनिर्भर जीवन जीते थे। सीमित शिक्षा के बावजूद उन्होंने कबाड़ संग्रह और इलेक्ट्रिकल रिपेयर जैसे कामों से अपनी आजीविका बनाई, और बाद में ठेले पर चप्पल व होजरी बेचकर परिवार का पालन-पोषण किया।
लेकिन जीवन ने अचानक मोड़ लिया-टीबी (क्षय रोग) के कारण वह लगभग दो साल तक बिस्तर पर पड़ गए। आर्थिक तंगी के कारण समय पर इलाज नहीं हो सका और उनकी हालत बिगड़ती गई। परिवार भी बिखर गया- पत्नी बच्चों के साथ मायके चली गईं, और वह अपनी बुजुर्ग माँ के सहारे रह गए।
आंशिक रूप से ठीक होने के बाद भी कमजोरी इतनी थी कि वह काम नहीं कर पा रहे थे, और मजबूरी में भीख मांगनी पड़ी। इस दौर ने उनके आत्मसम्मान को गहराई से प्रभावित किया।
काउंसलिंग के साथ उनके जीवन में बदलाव की शुरुआत हुई। उन्होंने अपनी भावनाओं को समझना, स्वीकारना और धीरे-धीरे खुद को संभालना शुरू किया। उन्हें सही इलाज, पोषण और छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ने का मार्गदर्शन मिला।
अपने पुराने अनुभवों को पहचानते हुए उन्होंने फिर से चप्पल और होजरी का ठेला लगाने का निर्णय लिया- अपनी क्षमता के अनुसार एक नई शुरुआत।
आज आसिफ नियमित रूप से ठेला चला रहे हैं। भीख पर निर्भरता खत्म हो चुकी है, आत्मसम्मान लौट आया है और जीवन में फिर से उम्मीद जगी है।
उनकी यह यात्रा बताती है कि सही इलाज, मनोवैज्ञानिक सहयोग और हौसले के साथ, कोई भी व्यक्ति अंधेरे से बाहर निकलकर सम्मानजनक जीवन की ओर बढ़ सकता है।



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आज    सीरीज में आज जानिए कहानी अतुल कुमार (नाम बदला हुआ) की। 28 वर्षीय अतुल कुमार, अयोध्या के रहने वाले, बचपन से ही कठिन...
06/05/2026

आज सीरीज में आज जानिए कहानी अतुल कुमार (नाम बदला हुआ) की। 28 वर्षीय अतुल कुमार, अयोध्या के रहने वाले, बचपन से ही कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े। बहुत छोटी उम्र में माता-पिता से बिछड़ गए और घाट किनारे झोपड़ियों में पलकर बड़े हुए-जहाँ जो मिला, वही खाया और जहाँ जगह मिली, वहीं सो गए।
बड़े होकर उन्होंने होटल में काम किया, फिर बेहतर अवसर की तलाश में दिल्ली गए और कई साल काम कर कुछ पैसे जोड़े। लेकिन हालात ने फिर पलटी मारी। काम छूटने के बाद अयोध्या लौटे और फिर काम की तलाश में लखनऊ आए।
यहीं एक हादसे ने उनकी ज़िंदगी बदल दी, ट्रेन में धक्का लगने से गिरकर उनका पैर कट गया। इलाज के बाद भी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। मजबूरी में भीख मांगकर गुज़ारा करना पड़ा, फुटपाथ पर रहना पड़ा, और दर्द के बीच खुद ही पट्टियाँ बदलनी पड़ीं।
इसी संघर्ष के बीच वह बदलाव के पुनर्वास केंद्र पहुँचे और यहीं से एक नई शुरुआत हुई।
काउंसलिंग, समूह सत्र और मानसिक स्वास्थ्य सहयोग ने उन्हें अपने दर्द को समझने, स्वीकारने और आगे बढ़ने की ताकत दी।
शुरुआत में उन्होंने चाय-पकौड़ी की दुकान की इच्छा जताई, लेकिन स्थिति को देखते हुए उन्होंने मूंगफली बेचने से शुरुआत की।

आज अतुल अपने ठेले से नियमित रूप से आजीविका कमा रहे हैं, आत्मनिर्भर हैं और जीवन को नए नजरिए से देख रहे हैं।
वह कहते हैं- “अगर यहाँ सहारा नहीं मिलता, तो शायद मैं बच नहीं पाता।”

उनकी कहानी यह बताती है कि ज़िंदगी चाहे जितना गिराए, हौसला और सही सहयोग इंसान को फिर खड़ा कर सकता है।



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