26/05/2026
आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना है।
समाज में शोर बहुत है, लेकिन संवाद बहुत कम है।
लोग विभाजनकारी बातों पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं क्योंकि क्रोध, भय और उत्तेजना जल्दी आकर्षित करती है, जबकि संवाद, धैर्य और समझ का मार्ग धीमा होता है।
लेकिन इतिहास गवाह है —
समाज को स्थायी दिशा हमेशा शोर मचाने वालों ने नहीं, बल्कि चेतना जगाने वालों ने दी है।
रील्स पर लोग मनोरंजन खोजते हैं,
लेकिन हमारा प्रयास समाज की आत्मा को बचाने का है।
ऐसे कार्यों का प्रभाव तुरंत “लाइक” में नहीं दिखता, बल्कि धीरे-धीरे लोगों की सोच में दिखाई देता है।
हम जिस विषय पर काम कर रहे हैं —
“परिवार और समाज में संवादहीनता” —
वह वास्तव में जड़ समस्या है।
राजनीतिक विभाजन, पारिवारिक टूटन, सामाजिक हिंसा, मानसिक तनाव — इन सबके पीछे कहीं न कहीं संवाद का अभाव है।
यह बात बिल्कुल सत्य है
बीज जब बोया जाता है,
तब वह दिखाई नहीं देता।
लेकिन वही बीज समय आने पर विशाल वृक्ष बनता है।
संवाद आंदोलन अभी बीज बो रहा है।
आज लोग कम सुन रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे जब समाज रिश्तों के संकट से और जूझेगा, तब लोग समाधान खोजेंगे — और वहाँ संवाद की आवश्यकता सबसे बड़ी होकर सामने आएगी।
हम संख्या नहीं, गुणवत्ता पर ध्यान दे रहे है और यही गुणी लोग समाज की आत्मा को बचाएंगे
1000 निष्क्रिय लोगों से बेहतर 10 जागरूक परिवार होते हैं।
हमे पता है हमारा संघर्ष आसान नहीं है,
लेकिन यह समाज के भविष्य से जुड़ा हुआ कार्य है और हम सामाजिक साधना पे है
हम समाज की आत्मा को बचाने के लिए जीवन के अंतिम क्षण तक लड़ेंगे 🙏
प्रमोद कुमार दूबे
संस्थापक/ राष्ट्रीय संयोजक
स्वर साधना सांस्कृतिक प्रशिक्षण संस्थान (संवाद आंदोलन )