01/06/2025
लखनऊ सिनेफ़ाइल्स में आज शाम हमने चैतन्य तम्हाणे की मराठी फ़िल्म ‘कोर्ट’ देखी और उस पर बातचीत की। फ़िल्म के हिन्दी सबटाइटल्स ‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स’ ने तैयार किये हैं।
बातचीत में कात्यायनी, एस.बी. सिंह, के.के. वत्स,रत्नेश कुमार, डॉ. उमेश, डॉ, शिवांश, डॉ. फ़ैयाज़ अहमद, मंजेश, विवेक कुमार, सुनीता यादव, अंकिता सिंह, ओशियन, तथागत, सुमन देवी, धनंजय, शिवम, पुनीत, सार्थक, प्रिया यादव,, लालचन्द्र, विकास, सत्यम आदि ने हिस्सा लिया।
फ़िल्म पर काफ़ी रोचक और गरमागरम चर्चा हुई हालाँकि लगभग सभी की राय थी कि फ़िल्म न्याय व्यवस्था की जिस संवेदनहीनता और उसके जनद्रोही हो चुके चरित्र को दिखाती है वह आज और भी नग्न रूप में हमारे सामने आ चुका है। न्याय के पूरे तंत्र में व्याप्त वर्गीय और जातीय पूर्वाग्रहों को यह सामने लाती है और न्यायपालिका की न्यायप्रियता के दावों की कलई खोलकर रख देती है। सत्ता का विरोध करने वाले लोगों को किस तरह से न्यायपालिका के सहारे चुप कराया जाता है, यह भी हम देखते हैं। इस पर चर्चा के प्रसंग में उमर खालिद से लेकर गौतम नवलखा, आनन्द तेलतुंबड़े और स्टैन स्वामी आदि की भी बात उठी। कुछ युवा दर्शकों ने कहा कि वास्तव में पिछले एक दशक में हालात और बदतर हुए हैं।
“कोर्ट” मुंबई में रहने वाले एक बुजुर्ग मराठी लोक गायक नारायण कांबले (विरा साथीदार) की कहानी है, जिन्हें एक अजीबोगरीब आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। उन पर आरोप है कि उनके गाए एक गाने ने गटर की सफ़ाई करने वाले एक सफ़ाईकर्मी को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया, और इसलिए वह उस व्यक्ति की मौत के लिए जिम्मेदार है। यह मामला सुशिक्षित और संपन्न वकील विनय वोरा (विवेक गोम्बर) के ध्यान में आता है, जो नारायण का मुक़दमा लड़ता है। उसके ख़िलाफ़ सरकारी वकील नूतन (गीतांजलि कुलकर्णी) है, जिसे नारायण की दुर्दशा या मामले के तर्क से कोई मतलब नहीं है। उसे सिर्फ़ अपने करियर से और केस के जल्दी निपटारे से मतलब है। वे दोनों जज सदावर्ते (प्रदीप जोशी) के सामने हैं, जिसे नैतिकता और क़ानून की अपनी पुरातनपंथी व्याख्या को बनाए रखने के अलावा किसी और चीज़ की परवाह नहीं है। फ़िल्म के एक दिलचस्प दृश्य में, जज एक मामले की सुनवाई करने से इनकार कर देता है क्योंकि वादी महिला, स्लीवलेस टॉप पहनकर आई थी। काम्बले पर लगे फ़र्ज़ी आरोप को साबित करने के लिए पूरा न्यायिक तंत्र निहायत ही संवेदनहीन ढंग से बर्ताव करता है। जिस न्यायाधीश पर न्याय करने की जिम्मेदारी है वह निहायत ही कूपमण्डूक, अतार्किक और अन्धविश्वासी के रूप में सामने आता है। कई बार ऐसा लगता है कि जैसे ‘कोर्ट’ में असली आरोपी भारत की न्याय व्यवस्था और समाज है।
एक दर्शक ने न्यायपालिका के अपने अनुभवों के हवाले से कहा कि जो कुछ हम फ़िल्म में देखते हैं, अदालतों की वास्तविकता उससे भी कहीं गन्दी है।
कुछ दर्शकों ने फ़िल्म के कुछ दृश्यों की विशेष रूप से चर्चा की जैसे काम्बले को एक महीने के लिए जेल भेजने के बाद अदालत उठ जाती है, वकील और कर्मचारी एक-एक करके निकल जाते हैं और अन्तिम कर्मचारी बत्तियाँ बुझाकर दरवाज़े बन्द करता है और फिर अदालत का कमरा देर तक अँधेरे में डूबा दिखता रहता है।
फ़िल्म का केन्द्रीय किरदार निभाने वाले विरा साथीदार के अलावा भी कई कलाकार अप्रशिक्षित,ग़ैर-पेशेवर अभिनेता हैं। जैसे मृतक की विधवा की भूमिका निभाने वाली स्त्री। अदालत में जब वह बेहद सपाट ढंग से बताती है कि उसका पति किन हालात में रोज़ गटर में उतरता था तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। (वह महिला असल ज़िन्दगी में मैनहोल में काम करते हुए मारे गए सफ़ाई कर्मी की विधवा है।)
बातचीत की शुरुआत में सत्यम ने इससे जुड़ा एक ताज़ा प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि इसी महीने 17 तारीख़ को ‘कोर्ट’ फ़िल्म में लोक गायक नारायण काम्बले का किरदार निभाने वाले विरा साथीदार की स्मृति में नागपुर में एक आयोजन था। इस कार्यक्रम के बाद एक दक्षिणपंथी संगठन की शिकायत पर विरा साथीदार की पत्नी पुष्पा साथीदार पर देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता को ख़तरे में डालने, समाज में शत्रुता पैदा करने आदि-आदि धाराओं में एफ़आईआर दर्ज कर ली गई। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने भाषण में “फ़ासिस्ट समय” और “गद्दी हिला देने” जैसे “ख़तरनाक” शब्दों का प्रयोग किया। इतना ही नहीं, उस कार्यक्रम में फ़ैज़ की नज़्म “हम देखेंगे” के गायन को भी देशद्रोह से जोड़ दिया गया। . ... ..
फ़िल्म के सबटाइटल्स में टाइम कोड की गई गड़बड़ियाँ हैं जिन्हें ठीक करके जल्द ही यह फ़िल्म और इसके हिन्दी व अंग्रेज़ी सबटाइटिल्स हम लखनऊ सिनेफ़ाइल्स के टेलीग्राम चैनल पर भी शेयर करेंगे।