26/03/2026
" #संविधान"
हिन्दुओं की - "मौत" - का सामान
जबर्दस्ती लादा और ऊपर खुद भी चढ़ गये
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मुझ को, आप को और हम को नही पता,
इस में हिन्दुओं की “मौत” को कैसे छुपा कर रखा गया है।
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२६ जनवरी, १९५० से लागू “भारतीय संविधान”
हर भारतीय गधों {नागरिकों} की पीठ पर,
डंडे के जोर से और हमे उल्लू बना कर,
"संविधान" नाम का 180 किलो का बोझा लाद दिया,
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कभी सोचा आपने :----
जब 1952 में इस देश में “पहला चुनाव” हुआ और “जनता द्वारा” चुनी हुई एक सरकार का गठन हुआ,
उस के बाद तो “जनता द्वारा चुनी” हुई सरकार कोई भी “कानून” बना सकती है,
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सोचिये :----
आज हर कोई प्रधानमन्त्री बनता है तो संविधान की शपथ लेता है तो - ध्यान दीजिये – 1947 के बाद नेहरु जब प्रधानमंत्री बना तो उस ने किस की शपथ ली होगी
{ब्रिटेन की “महारानी” के प्रति “वफादारी” की शपथ पर प्रधानमन्त्री बना था}
वो प्रधानमन्त्री और उस समय की सरकार “भारतीय जनता” के प्रति जवाबदार ही नही थे,
यानि उसे “भारत और भारतीयता” के कोई लेना देना ही नही था,
“तो फिर”
तथाकथित "आजादी" से पहले इस "संविधान सभा" का गठन किस के आदेश से हुआ और जब कि हम आजाद ही नही थे,
तो हमारा संविधान बनाया किसने--??--
संविधान सभा के सारे सदस्य अंग्रेजों के अपने खास आदमी थे।
संविधान सभा के - सभी के सभी सदस्य - अंग्रेजों द्वारा -"चयनित और मनोनीत"- थे।
इन सभी में से – एक भी सदस्य - जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिथि नही था।
ये सभी लोग भारतीय नही – अंग्रेजीदा – लोग थे।
जो अंग्रेजी बोलते थे और अंग्रेजी भाषा की समझ रखते थे,
इस लिए ही तो ये अंग्रेजों के नजदीकी थे।
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याद रहे - देश की “संविधान सभा” में और आजाद भारत की “पहली संसद” में 70% सदस्य - ये वकील ही थे।
सिर्फ पैसे के लिए – “काले कोट” वाले “हिन्दू विरोधियों” के केस लड़ते है और खुद सदा हिन्दुओं के विरुद्ध बोलते है।
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अब चूंकि इन की “मानसिकता” अभी भी - अंग्रजो की है, भाषा अंग्रेजो की है - अतः ये सब मिलकर “भारत और भारतीयता” के विरुद्ध उतरती है।
कोंग्रेसी नेतागण हर दिन पर बात पर हिन्दुओं के विरुद्ध जहर उगलते रहते है, और अन्य पार्टियों भी हम से शत्रुता कम नही रखती..।
अब मुद्दे पर आता हूँ :--– हमे ना तो समझ थी और ना ही हमे जिज्ञासा थी और मजे की बात ये भी है कि हमे किसी भी कानून के जानकार ने कभी ये सब बताया भी नही,
आज हम सभी सौभाग्यशाली है जो हमे ऐसा मंच मिला है।
तो जानिये संवैधानिक खेल को ....
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--25- प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को अपनाने, आस्था, विश्वास का अधिकार, परम्परा पालन व प्रचार का अधिकार देता है।
(अब हिन्दू प्रचार करते ? मिशनरियाँ प्रचार के बहाने धर्म परिवर्तन कराती और अपने पालतू के किए व्यय को सार्थक मानती)
-- 26- धार्मिक संगठन बनाने, प्रबन्धन करने, सदस्य बनने की स्वतन्त्रता का अधिकार देता है।
(यहाँ प्रबन्धन में -"धर्म प्रचार - धर्म परिवर्तन" होता है)
-- 27--रिलिजियस टेक्स, चेरिटी देने न देने की स्वतन्त्रता का अधिकार देता है।
(इसके 1उपबन्ध से जकात का धन तो सरकारी ट्रस्ट बना कर नहीं लिया जाता परन्तु हिन्दुओं के दान से मन्दिर में सरकारी ट्रस्ट बनाकर 85% पैसा सरकार ले जाती जो PWD, चर्च, मुस्लिम वक्फ बोर्ड पर खर्च करती है)
--28-- सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में धर्म विशेष की शिक्षा नहीं दी जा सकती
न छात्रो से जबरन प्रार्थना कराई जा सकती, इसके 1 उपबन्ध से “अल्पसंख्यक संस्थानों” को छूट है।
( अब सरकारी सहायता पा रहे “मदरसे और मकतब” - धार्मिक शिक्षा - दे सकते हैं परन्तु सहायता प्राप्त किसी “हिन्दू शैक्षणिक संस्थान” में ऐसा नहीं किया जा सकता)
--29-- प्रत्येक वर्ग, समाज, व्यक्ति को अपनी भाषा, लिपि, साहित्य, संस्क्रति को सुरक्षित और संरक्षित रखने का अधिकार देता है।
(इसके भी एक उपबन्ध में अल्पसंख्यको को “विशेष सुविधा” प्रदान की गई है)
--30-- धार्मिक ,भाषायी अल्पसंख्यको को उनके शैक्षणिक संस्थानों में प्रबन्धन की स्वतन्त्रता का अधिकार देता है।
(अब ईसाई, मुस्लिम को अपने स्कुल कालेज में किसी भी - कर्मचारी, टीचर, प्रोफेसर, चपरासी, क्लर्क को नियुक्त करने का अधिकार है।
जबकि हिन्दुओ को अपने कालेज में - यह अधिकार नहीं है।
हिन्दुओं के शैक्षणिक संस्थानों में - टीचर लिखित प्रतियोगी परीक्षा क्वालिफाइड करते ,इंटरव्यू देते फिर मेरिट बनती से सेलेक्ट होते है।इतना ही अल्पसंख्यक संस्थानों में sC, ST, OBC आरक्षण नहीं होता 50% केवल –“उसी धर्म” के लोगो के लिए होती है।
AMU, JMIU, MAKAU में #शुक्रवार को अवकाश होता है न कि रविवार को,
इतना ही नहीं कोई- “ घपला, घोटाला” होने पर भी सरकार - “अल्पसंख्यक संस्थानों” में हस्तक्षेप नहीं कर सकती,
भले करोड़ो रु उस कालेज पर - सरकार हर महीने व्यय करती हो।
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--30A --- “अल्पसंख्यको” को अपने “शैक्षणिक संस्थानों” में धार्मिक शिक्षा देने का अधिकार देता है।
भले वह संस्थान – “सरकारी सहायता” - प्राप्त हो।
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ये "लोकतंत्र" ही हमारा प्रत्यक्ष शत्रु है आज .....
धीमा जहर है जो 47 से दिया जा रहा है हमे .....
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अंग्रेज जाते जाते हमें -"लोकतंत्र" - के रूप में "सामुहिक आत्महत्या" का सुगम उपाय उपहार में दे गए।
इस -"अनमोल उपहार" - को सहेजने के लिए,
हमने दुनिया भर के "कबाड़" को एक मटके में डाल कर घोट दिया,
और इस अथक परिश्रम के फलस्वरूप - हमारे हाथ आया ये हमारा "तथाकथित संविधान".....
"भारतीय संविधान” और "सुप्रीम कोर्ट" की बनावट "भारतीय जनमानस" के लिए नहीं है,
बल्कि उन लोगों के लिए है जो – "भारतीय नागरिकों" को - अपने हिसाब से "हांकना" चाहते हैं।
ये "संविधान, न्यायपालिका" सब हमारे शत्रु हैं, जब तक "ये कानून और ये संविधान" है,
तब तक ये - "भारतीय संस्कृति" और "हिन्दु विरोधियीं और देश विरोधियों" के - "मानवाधिकारों" का ही साथ देंगे....✍️