16/07/2025
राजनीति में दोस्ती भी होती है… सियासत में भरोसे की भी कीमत होती है… बस शर्त है कि निभाने वाला 'चंद्रशेखर' जैसा हो और साथ देने वाला 'प्रभुनाथ सिंह' जैसा ।
साल 1989… जब राजनीति सिर्फ कुर्सी की दौड़ नहीं थी…जब सीमाओं से बड़ी होती थी विचारधारा…जब आज़मगढ़ की सरहद से लेकर पटना की चौखट तक करीब 200 किलोमीटर लंबा इलाका, सिर्फ नक्शे पर नहीं, दिलों में जुड़ रहा था ।
और चंद्रशेखर की छवि तो देश के सरहद लांघ दी थी ,ये भोजपुरिया माटी में कैसे अलग हो जाती ।
बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने सीधी चुनौती दी कि "अगर चंद्रशेखर वाकई बड़ा नेता है, तो बिहार की ज़मीन से चुनाव जीतकर दिखाए। "
बलिया के समाजवादी योद्धा चंद्रशेखर जी ने न चुनौती से घबराए, न सीमाओं से…उन्होंने महाराजगंज से चुनाव लड़ने का फैसला किया।
पर सियासत अकेले नहीं जीती जाती…साथ चाहिए, ज़मीन से जुड़े लोगों का, भरोसेमंद हाथों का ।
यहीं पर आगे आए मसरख के निर्दलीय विधायक प्रभुनाथ सिंह । उनकी ताकत चन्द्रशेखर के आगे बहुत ही कम थी लेकिन जज्बा था चंद्रशेखर को अपना गुरु मान के उन्हें उस स्तर पर जाने में सहयोग करना जिसके लिए चंद्रशेखर प्रख्यात थे ।
उन्होंने न देखा पार्टी, न पद, न स्वार्थ…सिर्फ देखा चंद्रशेखर जी की सोच, संघर्ष और समाजवाद की लौ ।
उन्होंने चंद्रशेखर जी को बुलाया, स्वागत किया और खुलकर सहयोग दिया। सामाजिक समीकरण, ज़मीनी पकड़ और जातीय संतुलन, सब कुछ चंद्रशेखर जी के पक्ष में मोड़ दिया ।
नतीजा? महाराजगंज में कांग्रेस के दिग्गज कृष्ण प्रताप सिंह को भारी शिकस्त 3.82 लाख बनाम 1.65 लाख वोट । बलिया में भी जीत का परचम।
पर असल जीत ये थी कि आज़मगढ़ से पटना तक की सरहदें धुंधली हो गईं… सिर्फ विचारधारा, भरोसा और नेतृत्व की एकता बची ।
और राजनीति ने उस भरोसे का रिटर्न भी दिया...1990 में प्रभुनाथ सिंह ने जनता दल का दामन थामा और मसरख से विधायक बने ।
सिर्फ यहीं नहीं रुके…इसके बाद प्रभुनाथ सिंह उसी महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र से लगातार 4 बार सांसद बने ।
जनता दल हो या बाद में अन्य दल… प्रभुनाथ सिंह ने अपनी राजनीतिक ताकत से महाराजगंज में जो पकड़ बनाई, वो उसी भरोसे और साझेदारी का परिणाम थी ।
इस पूरे घटनाक्रम ने सिखाया कि…राजनीति अगर दिल से की जाए, तो सीमाएं मिट जाती हैं…अगर साथ सच्चे इरादों से दिया जाए, तो उसका रिटर्न भी सियासत अपने आप दे देती है… और जहाँ नेता चंद्रशेखर और प्रभुनाथ सिंह जैसे हों, वहाँ आज़मगढ़ से पटना तक की ज़मीन भी एक विचारधारा में बदल जाती है ।