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10/04/2026

कोई भी #दरोगा नया-नया जब किसी चौकी पर आता है तो सबसे पहले अपने क्षेत्र का भ्रमण करता है भ्रमण करने के साथ-साथ सबसे पहले वह क्षेत्र के #प्रतिष्ठित_होटल का निरीक्षण करता है यह निरीक्षण कानून व्यवस्था का पार्ट नहीं होता है ये निरिक्षण इसलिए होता है ताकि होटल वाले को यह बताया जा सके की बेटा अब मैं आ गया हूं और जब मेरे यहां से फोन आए तो चुपचाप आज्ञा का अनुपालन हो जाना चाहिए और इस आज्ञा अनुपालन का सबसे आधारभूत शब्द है छापा मारना
हुआ यह कि आज हम मनोज भाई के साथ अपने एक मित्र के होटल में बैठकर एक मुकदमे का डिस्कशन कर रहे थे तभी एक दरोगा जी दो सिपाहियों के साथ होटल में धड़ धडाते हुए घुस आए और तुरंत रजिस्टर लाओ कौन-कौन कमरे में कौन-कौन है ब्ला ब्ला करके उन्होंने अपना भौकाल दिखाया .
उसके बाद हम लोगों की प्रेम पूर्वक #विधिक_वार्ता हो गई जिसे यहां बताना उचित नहीं है और विधिक वार्ता के परिणाम स्वरूप दरोगा जी बगैर कुछ किए चले गए तो हम उनके #प्रकट_होने_के_मूल_आधार यानी छापे पर चर्चा करते हैं

सीधी भाषा में समझिए—पुलिस को छापा मारने का अधिकार है, लेकिन “जैसे मन किया वैसे” नहीं।

1. छापा मारने का कानूनी आधार क्या है
मुख्य रूप से Criminal Procedure Code, 1973 (CrPC) के तहत powers मिलती हैं:

CrPC 93 (Search वारंट ) → BNSS 96
CrPC 165 (Urgent Search बिना वारंट) → BNSS 185
CrPC 100 (Search Procedure) → BNSS 103
CrPC 102 (Seizure) → BNSS 106

2. सही प्रोसीजर क्या होना चाहिए (A) सामान्य स्थिति: वारंट के साथ छापा मजिस्ट्रेट द्वारा Search Warrant जारी होना चाहिए वारंट में साफ लिखा हो: जगह (दुकान/होटल/घर)
क्या ढूंढना है पुलिस को वारंट दिखाना जरूरी है
बिना वारंट के अगर छापा है, तो पुलिस को justify करना पड़ेगा कि “urgent” क्यों था

(B) बिना वारंट के छापा (Urgent Case)

धारा 165 CrPC के तहत: पुलिस को लिखित में कारण दर्ज करना होगा बताना होगा कि वारंट लेने में देर से सबूत नष्ट हो सकते थे बाद में Magistrate को इसकी सूचना देना अनिवार्य है “सिर्फ शक था” — यह पर्याप्त कारण नहीं है

(C) तलाशी के समय जरूरी बातें

धारा 100 CrPC के अनुसार:
2 स्वतंत्र गवाह (local respectable persons) होने चाहिए,तलाशी से पहले पुलिस खुद की तलाशी देने को तैयार हो,महिलाओं की तलाशी महिला पुलिस द्वारा
पूरी सर्च की Panchnama/Seizure Memo बननी चाहिए
जिसकी जगह पर छापा पड़ा, उसे उसकी कॉपी दी जाए

(D) समय और तरीका
रात में छापा (private place) → विशेष कारण होना चाहिए
बिना जरूरत “force” या तोड़फोड़ नहीं intimidation (डराना-धमकाना) नहीं होना चाहिए

पुलिस द्वारा मारा गया हर छापा अवैध है अगर वह इन चार बातों को #जस्टिफाई नहीं करता है और उसे स्थिति में यह छापे अवैध हो जाएंगे और पुलिस को हाई कोर्ट के अंदर दायर होने वाली याचिका में जवाब देना भारी पड़ जाएगा

ऐसे अवैध छापे पर पुलिस पर क्या कार्रवाई हो सकती है
अगर छापा गलत तरीके से हुआ है, तो पुलिस खुद फँस सकती है:

Indian Penal Code की धाराएं:

IPC 166 → BNS 198 कानून का उल्लंघन
IPC 220 → BNS 248 गलत तरीके से हिरासत
IPC 342 → BNS 127 अवैध बंदी

Departmental inquiry बोनस में
Compensation (constitutional remedy)

5. सुप्रीम कोर्ट का डंडा अभी बाकी है क्योंकि Supreme Court of India बार-बार कह चुका है: Search और seizure “procedure established by law” के अनुसार होना चाहिए Arbitrary action = fundamental rights का violation (Article 21)

आजकल कुछ जगह “छापा” ऐसा मारा जाता है जैसे “चलो आज कुछ action करते हैं…”

पहले पुलिस आती है
फिर कारण ढूंढती है
और अंत में कागज़ बनते हैं

जबकि कानून कहता है—
पहले कारण, फिर कागज़, फिर कार्रवाई।

छापा पुलिस का अधिकार है, लेकिन यह “unlimited power” नहीं है। हर कदम कानून से बंधा हुआ है।

अगर प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ,
तो वही छापा अदालत में टिकता नहीं—
और कभी-कभी पुलिस के खिलाफ केस बन जाता है।

लेकिन किताबों में पढ़कर, पोस्टों में समझकर और बहसों में जीतकर खुद को मजबूत समझ लेना आसान है…
लेकिन असली मजबूती तब आती है, जब आप सिस्टम से टकराने की हिम्मत रखते हों।

वरना सच्चाई तो यह है कि अधिवक्ता की ताकत उसके तर्क नहीं, उसका क्लाइंट होता है…
और जब क्लाइंट ही अंदर से कमजोर निकले, तो फिर कानून की मोटी-मोटी किताबें भी चुपचाप तमाशा देखती रह जाती हैं।

ज्ञान कितना भी हो…
अगर हिम्मत उधार की है, तो लड़ाई पहले ही हार चुके होते हैं।
Om Prakash Shandilya
🖋️🖋️

26/03/2026

Om Prakash Shandilya

यदि पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना करे (BNSS 2023 के तहत विस्तृत विश्लेषण)भारत में अपराधों की रिपोर्टिंग और न्याय पा...
08/02/2026

यदि पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना करे (BNSS 2023 के तहत विस्तृत विश्लेषण)

भारत में अपराधों की रिपोर्टिंग और न्याय पाने का पहला कदम एफआईआर (FIR – First Information Report) दर्ज करना है। किसी भी नागरिक के लिए यह महत्वपूर्ण अधिकार है, विशेषकर जब मामला संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का हो। संज्ञेय अपराध ऐसे अपराध होते हैं जिनमें पुलिस बिना कोर्ट की अनुमति के सीधे जांच शुरू कर सकती है। हालाँकि, कई बार पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से मना कर देते हैं। ऐसे में नए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNSS 2023) ने स्पष्ट प्रक्रियाएँ और अधिकार दिए हैं ताकि नागरिक को न्याय मिल सके और पुलिस जवाबदेह रहे। नीचे इसका विस्तृत विवरण दिया गया है।

✅ 1. FIR दर्ज करने का कर्तव्य (Duty to Register FIR – Sec 173(1) BNSS)

BNSS 2023 के अनुसार, यदि कोई संज्ञेय अपराध घटित होता है तो पुलिस अधिकारी पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है। यह पुलिस का प्राथमिक दायित्व है। यदि कोई नागरिक अपराध की जानकारी देता है, तो पुलिस जांच प्रारंभ करने के लिए FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती।

महत्त्वपूर्ण बिंदु:

प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) केवल तब की जा सकती है जब अपराध की सज़ा 3 से 7 वर्ष के बीच हो और उसके लिए DSP (Deputy Superintendent of Police) की अनुमति आवश्यक हो।
सामान्य संज्ञेय अपराधों में किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है, और सीधे FIR दर्ज की जानी चाहिए।
FIR दर्ज करने से इनकार करना कानून का उल्लंघन है।
✅ 2. शून्य FIR (Zero FIR – Sec 173(2) BNSS)

कई बार पीड़ित को यह स्पष्ट नहीं होता कि अपराध किस थाने के क्षेत्र में हुआ है। ऐसी स्थिति में BNSS 2023 ने ‘Zero FIR’ का प्रावधान किया है। इसका अर्थ है कि पीड़ित किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर अपराध की रिपोर्ट दर्ज कर सकता है।

Zero FIR की विशेषताएँ:

थाना क्षेत्र की परवाह किए बिना FIR दर्ज की जाएगी।
बाद में इसे संबंधित क्षेत्र के थाना में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
शिकायतकर्ता को FIR की मुफ्त प्रति उपलब्ध कराई जाएगी।

यह प्रावधान विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों, वंचित वर्गों, और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

✅ 3. एसपी के पास शिकायत (Escalation to Superintendent of Police – Sec 173(4) BNSS)

यदि थाना प्रभारी (SHO) FIR दर्ज करने से मना करता है, तो नागरिक लिखित शिकायत एसपी (Superintendent of Police) को कर सकता है। एसपी को कानूनन अधिकार है कि:

FIR दर्ज करने का आदेश दे।
मामले की जांच का आदेश दे।
थाना प्रभारी की लापरवाही पर कार्यवाही करे।

यह प्रक्रिया नागरिक को न्याय पाने की अगली वैधानिक राह देती है।

✅ 4. मजिस्ट्रेट से राहत (Magistrate Intervention – Sec 175 BNSS जैसे प्रावधान)

यदि एसपी भी कार्यवाही नहीं करता है, तो नागरिक मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकता है। मजिस्ट्रेट शिकायत पर संज्ञान लेकर पुलिस को FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने का आदेश दे सकता है। यद्यपि BNSS 2023 में स्पष्ट रूप से धारा 175 का उल्लेख नहीं मिलता, यह अधिकार पुराने CrPC की धारा 156(3) के समान है।

यह उपाय न्याय प्रणाली का तीसरा स्तर है, जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

✅ 5. उच्च न्यायालय में रिट याचिका (High Court Remedy – Article 226 of the Constitution)

यदि थाना और एसपी दोनों FIR दर्ज करने से मना करें, और मजिस्ट्रेट भी राहत न दे, तो नागरिक सीधे उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है।

संभावित राहतें:

FIR दर्ज करने का निर्देश।
जांच की निगरानी का आदेश।
पीड़ित को मुआवजा प्रदान करने का निर्देश।
पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश।

उच्च न्यायालय नागरिकों के अधिकारों की अंतिम सुरक्षा प्रदान करता है।

✅ 6. FIR दर्ज न करने पर पुलिस अधिकारी पर दंड (Penalties for Police Refusal – Sec 199(c) BNSS)

BNSS 2023 में पुलिस अधिकारियों के लिए दंड का प्रावधान भी किया गया है। यदि कोई पुलिस अधिकारी जानबूझकर FIR दर्ज करने से इनकार करता है, तो:

उसे 6 महीने से 2 वर्ष तक की कैद की सजा हो सकती है।
साथ में आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।

यह प्रावधान पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित करता है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

✅ 7. पुलिस अधिकारी के विरुद्ध अपराध (Offences Against Police – Sec 121 BNSS)

पुलिस के कार्य में बाधा डालने या उन्हें घायल करने वाले अपराधों के लिए भी BNSS ने कठोर दंड का प्रावधान किया है। यदि कोई व्यक्ति पुलिस को उनकी ड्यूटी निभाने से रोकने के लिए चोट पहुँचाता है, तो:

उसे 5 से 10 वर्ष तक की सजा हो सकती है।
साथ में जुर्माना भी लगाया जाएगा।

यह प्रावधान पुलिस के सम्मान और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

🔑 व्यावहारिक पहलू और सुझाव
FIR दर्ज न होने पर:
तुरंत उच्च अधिकारी से संपर्क करें, लिखित शिकायत दें, और शिकायत की रसीद या कॉपी लें।
Zero FIR का प्रयोग करें:
क्षेत्रीय अस्पष्टता की स्थिति में किसी भी थाना में जाकर शिकायत करें।
डिजिटल प्लेटफॉर्म:
कई राज्यों में ऑनलाइन FIR सुविधा भी उपलब्ध है। इसका उपयोग करें।
कानूनी सहायता लें:
वकील या विधिक सेवा प्राधिकरण से मदद लेकर उच्च न्यायालय या मजिस्ट्रेट से राहत लें।
FIR की कॉपी:
FIR की मुफ्त कॉपी अवश्य लें, जो भविष्य में सबूत के रूप में उपयोगी होगी।
✅ निष्कर्ष

BNSS 2023 ने नागरिकों को FIR दर्ज कराने का स्पष्ट और प्रभावी अधिकार दिया है। पुलिस का दायित्व है कि संज्ञेय अपराधों की रिपोर्ट तुरंत दर्ज करे। Zero FIR जैसे प्रावधान नागरिकों के लिए राहत का रास्ता खोलते हैं। SHO द्वारा मना करने पर एसपी, मजिस्ट्रेट और उच्च न्यायालय तक शिकायत का अधिकार है। साथ ही पुलिस अधिकारियों की लापरवाही पर दंड का प्रावधान न्याय प्रणाली को मजबूत बनाता है।

यह कानून न केवल अपराध की रिपोर्टिंग में मदद करता है बल्कि पुलिस की जवाबदेही, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और न्याय की उपलब्धता को सुनिश्चित करता है। नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए और कानून द्वारा प्रदत्त सभी राहत उपायों का उपयोग करना चाहिए।

✅ 1. FIR क्या है?

FIR (First Information Report) अपराध की प्राथमिक जानकारी है जिसे पुलिस संज्ञेय अपराध की स्थिति में दर्ज करती है।

✅ 2. पुलिस पर FIR दर्ज करने का क्या दायित्व है?

पुलिस को संज्ञेय अपराध की शिकायत मिलते ही FIR दर्ज करनी होती है, बिना किसी अनुमति के।

✅ 3. Preliminary Enquiry कब की जा सकती है?

Preliminary enquiry केवल तब की जा सकती है जब अपराध की सजा 3 से 7 वर्षों के बीच हो और DSP की अनुमति ली जाए।

✅ 4. Zero FIR क्या है?

Zero FIR वह प्रक्रिया है जिसमें पीड़ित किसी भी थाने में जाकर FIR दर्ज करा सकता है, भले ही अपराध का क्षेत्र अस्पष्ट हो।

✅ 5. SHO FIR दर्ज न करे तो क्या करें?

SHO के मना करने पर शिकायत लिखित रूप में एसपी (Superintendent of Police) को दी जा सकती है।

✅ 6. यदि एसपी भी कार्यवाही न करे तो क्या उपाय है?

मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर FIR दर्ज कराने का आदेश लिया जा सकता है।

✅ 7. उच्च न्यायालय से क्या राहत मिल सकती है?

उच्च न्यायालय FIR दर्ज कराने का आदेश, जांच की निगरानी और मुआवजे का निर्देश दे सकता है।

✅ 8. FIR दर्ज न करने पर पुलिस अधिकारी को क्या सजा हो सकती है?

पुलिस अधिकारी को 6 महीने से 2 वर्ष तक की कैद और जुर्माना हो सकता है।

✅ 9. पुलिस की ड्यूटी में बाधा डालने पर क्या दंड है?

जो व्यक्ति पुलिस को ड्यूटी से रोकने के लिए चोट पहुँचाता है, उसे 5 से 10 वर्ष तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।

✅ 10. FIR की कॉपी लेने का क्या लाभ है?

FIR की कॉपी भविष्य में सबूत के रूप में काम आती है और शिकायत की पुष्टि करती है।
🖋️Om Prakash Shandilya Advocate High court

Om Parkash Shandilya
Pocket Senior

30/01/2026

माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने नवीनतम निर्णय में अभिनिर्धारित किया है कि एक मजिस्ट्रेट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) के तहत किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत पर तब तक सुनवाई नहीं कर सकता, जब तक शिकायतकर्ता पहले धारा 175(3) का पालन न करे, जिसके अनुसार मजिस्ट्रेट को यह संतुष्टि होनी चाहिए कि शिकायतकर्ता पहले ही एक हलफनामे के साथ लिखित शिकायत लेकर पुलिस अधीक्षक के पास जा चुका है। इसके अलावा, माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि BNSS की धारा 175 उप-धारा (4) एक स्वतंत्र प्रावधान नहीं है और इसे पिछली उप-धारा (3) के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए। इसका मतलब है कि धारा 175(4) के तहत जांच की मांग के लिए मजिस्ट्रेट के सामने किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ सीधे कोई शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती, जब तक कि शिकायत के समर्थन में शपथ पत्र की प्रारंभिक शर्त धारा 175(3) के तहत पूरी न हो जाए।

Cause Title: ### VERSUS STATE OF KERALA & ORS

ट्रेन की देरी से परीक्षा छूटी, छात्रा ने रेलवे को कोर्ट में घसीट लिया, 9 लाख का मुआवजा मिलेगा(खबर कमेंट बॉक्स में)
27/01/2026

ट्रेन की देरी से परीक्षा छूटी, छात्रा ने रेलवे को कोर्ट में घसीट लिया, 9 लाख का मुआवजा मिलेगा

(खबर कमेंट बॉक्स में)

🎉 Just completed level 3 and am so excited to continue growing as a creator on Facebook!
26/01/2026

🎉 Just completed level 3 and am so excited to continue growing as a creator on Facebook!

24/01/2026

पुलिस स्टेशन मे वीडियो रिकार्डिंग

Subhash Rambhau Athare vs State of Maharashtra 2024

उच्च न्यायालय बॉम्बे ने कई मामलों में स्पष्ट किया है कि पुलिस स्टेशन Official Secrets Act, 1923 के तहत "प्रतिबंधित स्थान" नहीं है। इसलिए थाने के अंदर वीडियो रिकॉर्डिंग करना जासूसी नहीं माना जा सकता हैऔर विडिओ रिकार्डिंग करने वाले ब्यक्ति के FIR दर्ज नहीं की जा सकती। है,

अर्थात आप थाने मे किसी काम से जाते है तो विडिओ रिकार्डिंग आन कर सकते है, अपने द्वारा की गई बातो को रिकार्ड कर सकते है।


#वकील


Pocket Senior
Om Parkash Shandilya
जय प्रकाश शुक्ला

24/01/2026

⚖️ सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला (Bail Hearing पर बड़ी बात)
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि जमानत (Bail) की सुनवाई को सिर्फ इस वजह से टाला नहीं जा सकता कि आरोपी ने कोर्ट में दिया गया डिपॉजिट/राशि जमा करने का Undertaking पूरा नहीं किया।
✅ कोर्ट का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है:
🔹 Bail hearing एक मौलिक अधिकार (Liberty) से जुड़ा मामला है।
🔹 इसे तकनीकी कारणों से या सिर्फ “पैसा जमा नहीं हुआ” कहकर लंबित नहीं रखा जा सकता।
🔹 अदालत को जमानत याचिका पर सुनवाई करके निर्णय देना ही होगा।
📌 इसका मतलब क्या हुआ?
अगर आरोपी ने राशि जमा नहीं की है, तो कोर्ट उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई/शर्तें कड़ी कर सकता है,
लेकिन सिर्फ इसी कारण Bail hearing टालना गलत होगा।
⚖️ न्याय का सिद्धांत:
“सुनवाई टालना नहीं, न्याय करना प्राथमिकता है।”
✍️ Om Parkash Shandilya

Pocket Senior

24/01/2026

यदि ग्राम सभा की भूमि अवैध तरीके से विधि वा नियम का पालन किए बिना किसी अपात्र व्यक्ति को आवंटित कर दी जाती है तो ऐसी स्थिति में ग्राम सभा का कोई भी सदस्य ऐसे आवंटन को निरस्त कराने के लिए उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 की धारा 198(4 )अथवा उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 128 के अंतर्गत आवेदन कर सकता है ।इस प्रकार के प्रकरण में शिकायतकर्ता द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका भी दाखिल की जा सकती है। इस प्रकार दाखिल की गई रिट याचिका पोषणीय मानी जाएगी ।सामान्य तौर पर विधिक अधिकार को लागू करने के लिए ही रिट याचिका दाखिल की जा सकती है लेकिन जहां पर लोक उपयोगिता की भूमि को अवैध ढंग से आवंटित कर देने का प्रश्न है वहां पर ग्राम सभा के किसी भी सदस्य द्वारा ऐसे आवंटन को चुनौती दी जा सकती है ।इस संबंध में हरी चंद बनाम राजस्व परिषद 2025 (167 ) आरडी 280 के प्रकरण में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दी गई विधि व्यवस्था अवलोकनीय है। राम जियावान बनाम अपर आयुक्त 2014 (124 ) आरडी 219 एवं मिठाई लाल दुबे बनाम डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संत रविदास नगर 2004 ए डब्लू सी 2752 के प्रकरण में भी यह विधि व्यवस्था दी गई है कि ग्राम सभा की संपत्ति को सुरक्षित कराने के लिए ग्राम सभा का कोई भी सदस्य रिट याचिका दाखिल कर सकता है।

22/01/2026
22/01/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार की शाम बड़ा फेरबदल किया। 14 जजों के तबादले कर दिए हैं। लिस्ट में तीन जिला जज स्तर के अधिकारी...
21/01/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार की शाम बड़ा फेरबदल किया। 14 जजों के तबादले कर दिए हैं। लिस्ट में तीन जिला जज स्तर के अधिकारी भी शामिल हैं। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल सर्विसेज रजनीश कुमार की ओर से लिस्ट जारी की गई है।

लिस्ट में चौंकाने वाला नाम संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर का है। विभांशु ने 9 जनवरी को ASP अनुज चौधरी समेत 20 पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज करने के आदेश दिए थे। आरोप है कि संभल हिंसा के दौरान ASP अनुज चौधरी समेत अन्य पुलिसकर्मियों ने एक युवक को गोली मार दी थी।

विभांशु को सुल्तानपुर में सिविल जज सीनियर डिवीजन के पद पर भेजा गया है। चंदौसी के सिविल जज सीनियर डिवीजन आदित्य सिंह अब संभल के नए CJM हैं। आदित्य सिंह ने ही संभल के श्री हरिहर मंदिर बनाम शाही जामा मस्जिद दावे पर सर्वे के आदेश दिए थे। आदित्य कुमार सिंह को प्रमोशन दिया गया है।

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