01/10/2023
* बहु हम तुम्हारे साथ नहीं बल्कि तुम हमारे साथ रहती हो*
संध्या आरती का समय हो चुका था। निर्मला जी और उनके पति भंवरलाल जी ने घर में दीया बत्ती की और फिर संध्या आरती के लिए मंदिर चले गए जो कि घर के पास ही था। पर जाने से पहले घर की बहू सुनीता को आवाज़ लगा गए कि हम मंदिर जाकर आ रहे हैं। लेकिन सुनीता अपने कमरे से निकलकर बाहर ही नहीं आई।
वो अक्सर ही ऐसा करती थी। इसलिए निर्मला जी और भंवर लाल जी ने दरवाजा बंद किया और अपने दो साल के पोते समर को लेकर दोनों वहां से रवाना हो गए। जब तक दोनों लौट कर वापस आए तब तक बेटा सूरज भी घर पर आ चुका था। उसे देखते ही भँवरलाल जी खुशी खुशी प्रसाद लेकर उसकी तरफ बढ़े,
" अरे बेटा, तु आ गया। ले प्रसाद खा। आज तो मंदिर में बहुत ही सुंदर झांकी सजी थी। समर तो देखते ही खुश हो गया। तू और बहू भी जाकर देख आ"
लेकिन सूरज ने प्रसाद ना लेकर चिल्लाना शुरु कर दिया,
" पापा, कब तक चलेगा ये सब। आप लोगों को घर की शांति रास नहीं आती ना। अब मैं ऑफिस में काम करूं या फिर आप लोगों के घर के मैटर सॉल्व करता फिरुँ"
उसकी बात सुनकर जैसे भंवर लाल जी को जोरदार झटका लगा हो। वो चुपचाप जड़त्व वही खड़े रह गए। तब निर्मला जी बोली,
" अरे बात क्या हुई है वो तो बता। क्यों चिल्ला रहा है"
" अच्छा! नाटक तो आप ऐसे कर रही है जैसे आपको कुछ पता ही नहीं है। कब तक मैं आप लोगों का बोझ अपने सिर पर ढोती रहूं। नौकरानी बनाकर रख दिया है मुझे। आप अलग क्यों नहीं हो जाती। कम से कम हम तो आजादी से जिंदगी जिए। खुद की जिंदगी तो जी ही ली। अब शांति से हमें तो रहने दो"
सूरज के बोलने के पहले ही सुनीता बीच में बोल पड़ी। उसकी बात सुनकर निर्मला जी हैरानी से पूछने लगी,
"बेटा मुझे तो अभी भी समझ में नहीं आ रहा है कि तू किस बात से नाराज है। और हमने ऐसी कौन सी टोका टाकी की है तुझ पर जिससे तेरी आजादी में खलल पड़ गया"
निर्मला जी ने कहा तो सुनीता ने सूरज की तरफ पलट कर कहा,
" देख लो अपनी मां के नाटक। आपको तो यही लगता है कि ये मुझ पर टोका टाकी नहीं करती है। अरे सुबह सिर्फ इतनी सी बात थी कि मैं दाल चावल बना रही थी। बहुत दिनों से खाने की इच्छा कर रही थी। लेकिन तुम्हारी मां ने मुझे बनाने तक नहीं दिया। अब बताओ क्या मैं अपनी मर्जी से दाल चावल बना कर नहीं खा सकती। यही औकात है मेरी इस घर में"
कहती कहती सुनीता आंखों में आंसू भर लाई। जिसे देखकर सूरज और भड़क गया,
" मां बहू को बेटी नहीं समझती हो तो बहू तो समझो। आखिर वो भी इंसान है। अरे एक दाल चावल की क्या औकात जो आपने इतनी सी बात पर इसका दिल दुखा दिया। मेरी कमाई का क्या फायदा अगर मेरी ही पत्नी दाल चावल के लिए तरस रही है तो"
सूरज की बात सुनकर निर्मला जी ने इतना ही कहा,
" मैंने बहू को दाल चावल बनाने के लिए मना नहीं किया था। मैंने सिर्फ ये कहा था कि बहू हमारे लिए रोटी बना लेना क्योंकि हमें चावल पचते नहीं है"
" हाँ तो? इसका तो यही मतलब है ना कि आपने मुझे रोटी बनाने के लिए कहा, चावल नहीं"
" बहु बात का क्यों बतंगड़ बना रही हो। मतलब तो तुमने अपनी मर्जी से निकाला हैं"
अब की बार भंवर लाल जी ने कहा।
" पापा आप बीच में मत बोलिए। अभी मैं आपसे बात नहीं कर रहा हूं"
सूरज ने उन्हें चुप कराने की कोशिश की तो भंवर लाल जी ने पलटकर कहा,
" क्यों ना बोलूं? जब तुम अपनी पत्नी के लिए बोल रहे हो तो मैं भी अपनी पत्नी के लिए बोलूंगा"
" तो फिर ठीक है पापा। आप अपने ईगो के साथ खुश रहिए। हमें अपनी आजादी के साथ खुश रहने दीजिए। हमें नहीं रहना आपके साथ। हम अलग हो जाएंगे"
सूरज ने दो टूक जवाब दिया।
" ठीक है, तुम अलग होना चाहते हो तो अलग हो जाओ। क्या हमें समझ में नहीं आ रहा है कि आए दिन छोटी-छोटी बातों पर जो बतंगड़ हो रहा है घर में, वो किस लिए हो रहा है"
कहकर भंवर लाल जी अपने कमरे में आ गए। पीछे-पीछे निर्मला जी समझाने के लिए कमरे में आई तो भंवर लाल जी ने उन्हें चुप रहने का इशारा किया,
" निर्मला अपनी मां की ममता से उठ कर देखो। तुम्हें समझ नहीं आ रहा कि रोज छोटी-छोटी बातों पर बतंगड़ क्यों बन रहा है। घर में तमाशा होता है। क्यों नहीं समझती कि वो लोग तो हम लोगों के साथ रहना ही नहीं चाहते। और सबसे बड़ी बात उन्हे यह गलतफहमी है कि हम लोग उनके साथ रहते हैं, तो हमारा खर्चा वो लोग उठा रहे हैं"
आखिर भंवर लाल जी के कहने पर निर्मला जी भी चुप हो गई। आखिर कुछ दिनों से यही सब तो हो रहा था घर में।
कल घर में मटर पनीर की सब्जी बनी थी तो सुनीता ने निर्मला जी और भंवर लाल जी को खाना परोसा। उनकी थाली में सिर्फ मटर थे, पनीर का एक टुकड़ा तक नहीं था। जब निर्मला जी ने कहा तो सुनीता ने मुंह बिगाड़ते हुए कहा,
" माँ जी पनीर इतना सा ही था, समर ने खा लिया"
तब भी निर्मला जी चुप हो गई। अब क्या इतना भी उन्हें समझ में नहीं आता कि एक दो साल का बच्चा जो कि खाना भी खुद से नहीं खाता, अकेले ही भला ढाई सौ ग्राम पनीर खा सकता है क्या, वो भी सब्जी में डाला हुआ?
और भी ऐसी कई सारी छोटी छोटी बातें जो अक्सर घर में होने लगी थी। निर्मला जी और भंवर लाल जी को समझ में आ रहा था कि आखिर दोनों क्या चाहते हैं पर फिर भी दोनों चुप थे। लेकिन आज तो सूरज ने मुंह पर बोल ही दिया।
खैर, दूसरे दिन ही सूरज और सुनिता ने अपना सारा सामान ऊपर वाले माले में शिफ्ट कर लिया। दोनों के ही माथे पर कोई शिकन तक नहीं थी। बल्कि चेहरे पर एक सुकून था। जैसे उनकी मन की मुराद पूरी हो गई हो। उस समय हैरान परेशान बस घर में कोई था तो वो थी निर्मला जी। जो उन्हें रोकने की पूरी कोशिश कर रही थी। पर कोई रूकना चाहे तो रुके ना, जिसके मन की मंशा पूरी हो वो भला क्यों रुके।
निर्मला जी ने बड़ी उम्मीद से भंवर लाल जी की तरफ देखा कि वो बच्चों को रोक लेंगे लेकिन वो तटस्थ खड़े रहे।
अब तो सुनीता और और सूरज की मौज ही मौज थी। लेट तक सोना, मन हुआ तो घर पर खाना बनाया नहीं तो बाहर से मंगा लेना, कुछ दिन तो जैसे ऐशो आराम में ही बीते। यहां तक कि समर को अपने मायके छोड़ कर आए दिन शॉपिंग करना, बाहर घूम कर आना, बाहर ही खाना खाकर आना, कुछ दिन तो ये सब अच्छा लगा।
लेकिन लोग भूल जाते हैं कि रहना तो उन्हें धरती पर ही है। हर इंसान की अपनी एक सीमा होती है। जैसे ही पंद्रह बीस दिन बीते, सुनीता के मायके में उसकी भाभी ने साफ कह दिया कि रोज-रोज बच्चे को यहाँ छोड़कर ना जाया करें। हमें भी बहुत से काम होते हैं। इतना ही घूमने फिरने का शौक है तो बच्चे को अपने साथ लेकर ही घुमा फिरा करो।
यहां तक कि ऑफिस लेट पहुंचने के कारण और आए दिन छुट्टी लेने के कारण भी सूरज को ऑफिस में अच्छी खासी डांट पड़ चुकी थी।
अब जाकर आटे दाल का भाव पता चल रहा था। कभी सिलेंडर तो कभी बिजली का बिल, कभी सब्जियां तो कभी घर का राशन, छोटे बच्चे के साथ आए दिन के खर्चे। दिन में ही दोनों को तारे नजर आने लगे थे। आए दोनों में चिक चिक शुरू हो गई।
पहले तो भंवर लाल जी घर का अधिकतर खर्चा उठा लेते थे तो अपने पास होती सेविंग को देखकर दोनों को लगता कि हम सब खर्चा उठा सकते हैं। लेकिन अब असलियत पता चल रही थी।
अभी दोनों चिक चिक करके मुंह फुला कर बैठे ही थे कि इतने में निर्मला जी ने दरवाजा खटखटाया। सूरज में जाकर दरवाजा खोला तो निर्मला जी को खड़ी देखकर हैरान रह गया। इससे पहले कि वो कुछ बोलता निर्मला जी ने बिजली का बिल निकाल कर उसे देते हुए कहा,
" बेटा ये बिजली का बिल आया है, इसे जमा करवा देना"
कहकर वो वापस नीचे आ गई।
" ये क्या ₹5000 का बिल?"
₹5000 का नाम सुनते ही सुनीता भी खड़ी हो गई। अब सूरज और सुनीता भी नीचे आ गए। और आते ही सुनीता बोली,
" ये क्या है पापा जी, आपने ये बिजली के बिल हमारे पास क्यों पहुंचा दिया? हम क्यों आपका बिल भरेंगे"
उसकी बात सुनकर भंवर लाल जी बोले,
"देखो बहू हमारे हिस्से का बिल हम दे रहे हैं। ये तो तुम्हारे हिस्से का बिल है। तुम शायद भूल रही हो कि दोनों माले के मीटर अलग-अलग है"
" अरे तो ₹5000? क्या हम ₹5000 की बिजली फूँक गए? जरूर आपका बिल भी उसी में मिला हुआ होगा"
सुनीता अभी भी मानने को तैयार नहीं थी। भँवर लाल जी मुस्कुरा कर बोले,
" बहु ये जो तुम रात रात भर टीवी देखती हो, पंखे कूलर चालू करके छोड़ जाती हो तो बिजली का बिल इतना आएगा ही ना। वैसे भी पाँच हजार तो बहुत कम है। कई बार तो आठ हजार दस हजार का बिल आता था, जो मैं भरता था"
अब तो सुनीता की आवाज तक नहीं निकल रही थी।
" ऐसे कैसे घर चलेगा भला"
अचानक सूरज ने सिर पर हाथ रखते हुए कहा
" बेटा तुम्हें लगता है ना कि घर के बड़े बुजुर्ग बहुत टोका टाकी करते हैं। असल में वो लोग होते हैं तो तुम कई चीजों से बच जाते थे। कई चीजों के खर्चे तो हम ही करते थे पर तुम्हें लगता था कि तुम हमें संभाल रहे हो। हमारी जिम्मेदारी उठा रहे हो। पर बहु तुम ये भूल गई कि तुम हमारे साथ रहती थी, हम तुम्हारे साथ नहीं"
" माँ जी मुझे माफ कर दो। मुझे सब समझ में आ गया। मायके वालों से रिश्ते बिगड़े सो अलग, यहाँ खुद की गृहस्थी भी नहीं संभाल पाई"
सुनीता ने माफी मांगते हुए कहा तो सूरज बोला,
" मां क्या हम दोबारा साथ नहीं रह सकते"
" नहीं बेटा, तुम अपने आजादी के साथ रहो। हमें अपने हिसाब से रहने दो"
अब की बार भँवरलाल जी ने कहा।
" पर पापा गलती तो बच्चों से ही होती है। माफ कर दो"
सूरज ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
" देख बेटा, तू मेरा बेटा है इसलिए तुझे माफ भी कर दिया। लेकिन रही बात साथ रहने की तो अब नहीं। एक बार बर्दाश्त कर चुके पर अब बर्दाश्त नहीं होगा। और वैसे भी तुम्हें गृहस्थी संभालनी आनी ही चाहिए। हम लोगों की छांव में तुम ये सब नहीं सीख पाए। एक ही मकान में तो है, माले अलग हुए तो क्या हुआ। भविष्य का मुझे पता नहीं। लेकिन अभी फिलहाल तो दोबारा एक साथ नहीं"
आखिर भंवर लाल जी के कहने पर सूरज उनकी बात को समझ गया और चुपचाप उनके पैर छूकर ऊपर वाले माले पर चला गया।
अब कम से कम एक ही बिल्डिंग में अलग-अलग माले पर रहने के बावजूद वो लोग एक तो थे।