01/06/2024
महान स्वातंत्र्य वीर सावरकर-
वीर सावरकर का व्यक्तित्व बहुआयामी था. वे एक साथ स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, लेखक, कवि, इतिहासकार, राजनेता और दार्शनिक थे. उनकी 141वीं जयंती के अवसर पर हमें यह समझने की जरूरत है कि एक वैज्ञानिक चेतना के मानववादी और जाति प्रथा जैसी कुरीतियों से लड़ने वाले योद्धा एवं अपने संगठन पतित पावन संगठन के माध्यम से मंदिरों में दलितों के प्रवेश के लिए संघर्ष करने वाले व्यक्ति को रूढ़िवादी और कायर क्यों कहा जाता है.
वे एक महान समाज सुधारक थे, जिनका विचार था कि जाति व्यवस्था को इतिहास के कचरे में फेंक देना चाहिए. स्वतंत्रता के बाद नेहरूवादी राजसत्ता के षड्यंत्र ने उनकी छवि सांप्रदायिक एवं रूढ़िवादी की बना दी, जबकि वे संशयवादी थे, जो पुणे में ‘क्या ईश्वर है?’ विषय पर साप्ताहिक व्याख्यान देते थे. उन्होंने सभी धर्मों की निंदा की, इसीलिए नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षतावादियों ने उनकी निंदा की क्योंकि उनके लिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल हिंदुओं की आलोचना है, अब्राहिमी धर्मों की नहीं.
समय आ गया है कि सावरकर के योगदान का मूल्यांकन हो और उसे सराहा जाए.
सावरकर के कार्य और गतिविधियां राष्ट्रवाद की वास्तविक परिभाषा को परिलक्षित करती हैं. वे मुश्किलों के सामने डटे रहे और ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ते रहे. वे युवावस्था के प्रारंभ से ही औपनिवेशिक शासन को नापसंद करने लगे और उच्च शिक्षा के लिए जब ब्रिटेन गये थे, तो वहां भी इंडिया हाउस और फ्री इंडिया सोसायटी जैसी संस्थाओं के माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान दिया. भारत में उनपर राजद्रोह का आरोप लगाकर कालापानी की सबसे कठोर सजा दी गयी और वे 1911 से 1921 तक अंडमान के सेलुलर जेल में रहे.
इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता से वे मुख्यभूमि लौटने में सफल रहे, पर उनकी गतिविधियों पर पाबंदी थी. उनके प्रारंभिक कार्यों में एक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘भारत का स्वतंत्रता संग्राम’ है, जिसने 1857 के विद्रोह का भारतीय आख्यान प्रस्तुत किया. ब्रिटिश शासन ने इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया. सावरकर ने हिंदुत्व पर एक पुस्तक लिखी, जो हिंदू राष्ट्र की उनकी दृष्टि का वैचारिक आधार बनी. उन्होंने अन्य अहम किताबों की रचना भी की, जो भारत के बौद्धिक आयाम में उनके योगदान को रेखांकित करती हैं.