Sarvjanik Vikas Sansthan

Sarvjanik Vikas Sansthan मानव सेवा परमो धर्म:
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आप सभी लोगों को साहस, गौरव और शौर्य का प्रतीक राष्ट्रीय पर्व  #80वां...15 अगस्त 2026 भारतीय स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक ब...
15/08/2026

आप सभी लोगों को साहस, गौरव और शौर्य का प्रतीक राष्ट्रीय पर्व #80वां...15 अगस्त 2026 भारतीय स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !! 🇮🇳🎉💐🇮🇳 #आजादी_की_80वां वर्षगांठ स्वतंत्रता_दिवस

21/05/2026

हा हम कॉकरोच है साहब....Sarvjanik Vikas Sansthan

  ❤️🎉🥰💐
10/05/2026

❤️🎉🥰💐

संघर्षों की समर भूमि में, हमसे पूछो हम कैसे हैं, कालचक्र के चक्रव्यूह में, हम भी अभिमन्यु जैसे हैं !!----- ✍️
01/05/2026

संघर्षों की समर भूमि में, हमसे पूछो हम कैसे हैं,
कालचक्र के चक्रव्यूह में, हम भी अभिमन्यु जैसे हैं !!
----- ✍️

भारतीय संस्कृति में समृद्धि, शुभता और नव आरंभ के प्रतीक पावन पर्व अक्षय तृतीया की समस्त देश एवं प्रदेशवासियों को हार्दिक...
19/04/2026

भारतीय संस्कृति में समृद्धि, शुभता और नव आरंभ के प्रतीक पावन पर्व अक्षय तृतीया की समस्त देश एवं प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं.... 🎉💐🙏

भगवान श्रीहरि विष्णु एवं माता लक्ष्मी की कृपा से आप सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य का वास हो तथा हर कार्य में निरंतर प्रगति और सफलता के नए आयाम स्थापित हों.... 🚩💐🥰😊🙏

जय भगवान परशुराम....समस्त देश एवं प्रदेशवासियों को पराक्रम, धर्मनिष्ठा और न्याय के प्रतीक भगवान परशुराम जी की जयंती की ह...
19/04/2026

जय भगवान परशुराम....समस्त देश एवं प्रदेशवासियों को पराक्रम, धर्मनिष्ठा और न्याय के प्रतीक भगवान परशुराम जी की जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं.... 🚩💐🙏

भगवान परशुराम जी की कृपा से सभी के जीवन में साहस और सफलता का संचार हो तथा हर अन्याय के विरुद्ध सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की शक्ति प्राप्त हो...:!!🚩💐🙏

28/03/2026

भले ही यह कविता है लेकिन गांव के लोगों की सरकारी नौकरी के प्रति यह सच्चाई है।

25/03/2026

मरकहवा साँढ
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गाँव में कहा जा रहा है—
वह मरकहवा साँढ है।
खेतों की मेंड़ें तोड़ देता है,
हाट में उतरकर टोकरी उलट देता है,
और कभी-कभी
धूल का बवंडर बनकर
गलियों में दौड़ जाता है—
जैसे धरती का कोई पुराना ऋण
एक साथ वसूलना हो।

बच्चे दीवारों पर चढ़ जाते हैं,
और औरतें द्वार बंद कर लेती हैं।
उसके खुरों की चोट से
मिट्टी काँपती है—
और लोग कहते हैं,
“आतंक है… आतंक!”

पर क्या आतंक
सिर्फ़ सींगों से उपजता है?
या उस खालीपन से
जिसे हमने उसके भीतर बो दिया है?

⸻————

एक समय था—
जब वही देह
धान की बालियों में हवा-सी बहती थी।
उसके कंधों पर बलिष्ठ बादल थे,
और सींगों पर उगता हुआ चाँद।
पंचईयाँ के मेले में
उसके गले की घंटियाँ
मानो पृथ्वी का हृदय थीं—
धड़कती हुई, आश्वस्त।

वह खेतों की लय था,
हल की रेखाओं में उतरती कविता था।
उसकी चाल में विश्वास था—
कि ऋतु लौटेगी,
और अन्न उगेगा।

⸻————-

फिर समय ने करवट ली।
हल की लकड़ी
लोहे की गर्जना में बदल गई।
उसकी देह का सामर्थ्य
बाज़ार की दृष्टि में
“अनुपयोगी” घोषित हुआ।

जिसे कभी देवता की तरह
खुला छोड़ा गया,
वही आज
खुलेपन का अपराधी है।

उसकी आँखों में जो लालिमा है—
वह रक्त नहीं,
विस्थापन की संध्या है।
वह जब मेंड़ तोड़ता है,
तो दरअसल अपनी ही स्मृतियों की
बंदीगृह-दीवारें तोड़ता है।

हाट में टोकरी उलटना
उसका उन्माद नहीं—
उस व्यवस्था पर प्रहार है
जिसने उसे
अचानक अनावश्यक बना दिया।

⸻————

अब वह पीपल के नीचे खड़ा रहता है—
देवत्व और दुत्कारे जाने के बीच
अटका हुआ।
उसकी देह पर समय की दरारें हैं,
और सींगों पर
सूखे उत्सवों की राख।

कभी सांझ के धुँधलके में
वह अचानक दहाड़ उठता है—
और वह दहाड़
गाँव के कच्चे घरों से टकराकर
लौट आती है,
जैसे कोई प्रश्न
जिसका उत्तर
किसी के पास नहीं।

वह मरकहवा नहीं है—
वह एक युग का परित्यक्त शिलालेख है।
उसका आतंक
दरअसल उस स्मृति की अंतिम चिंगारी है
जिसे हम बुझा देना चाहते हैं।

और जब वह दौड़ता है—
तो धरती नहीं काँपती,
काँपती है हमारी वह सुविधा
जिसने शक्ति को पहले पूजा,
फिर इस्तेमाल किया,
और अंततः
उसे भय का नाम दे दिया।

23/03/2026

एक सुनने , समझने और सोचने लायक़ वीडियो, जरूर देखें, और अपने आप में बदलाव लाएं ,और आपकी आने वाली पीढ़ी को सबकुछ सिखाए, उनके साथ कुछ कठोर भी बनें...!! 🙏❤️

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