01/01/2023
पहाड़ी काष्ट्कला और वास्तुशास्त्र का अद्भुत नमुना करशाला चौकी
चौकी का इतिहास
कहानी शुरू होती है 17वीं शताब्दी से
कुल्लू जिले के रायसन में एक परिवार रहता है जिसमे 8 भाई होते हैं। पारिवारिक संपत्ति कम होने के कारण 3 भाई पलायन कर जाते हैं और मंडी जिले के जंजहली के सगेति नामक गांव आ जाते हैं।
जाति प्रथा चरम पर थी जिस कारण एक भाई क्षेत्रीय लोगों के दवाव में जाति परिवर्तन कर लेता है लेकिन अन्य दो भाईयों को यह फैसला नागवार गुजरता है और रातोंरात परिवार सहित भाग जाते हैं। और करशाला पहुँच जाते हैं। बड़ा भाई परिवार सहित करशाला के थाछ मे बस जाता है और कुंडल नाम का छोटा भाई मध्य करशाला जहाँ आज के समय में उनकी हवेली मौजूद है जिसे चौकी कहा जाता है में अपना आशियाना स्थापित करते हैं। उनके पुत्र केसर के दो बेटे जिनका नाम राम दास और देवी राम बताया जाता है उन्होंने ही चौकी हवेली का निर्माण किया।
उस समय के नजरिये से देखा जाए तो ये निश्चित ही एक विशालकाय भवन है। चारों तरफ चौकोर भवन है बीच में खाली जगह है जिसे रण कहते हैं। रण में जाने के दो ही दरवाजे हैं जिनको प्रौल कहते हैं। हवेली साढ़े तीन मंजिला है और हर मंजिल में 9 कमरे हैं। रण का आकार भी छोटा नहीं है लगभग वॉल्लीबॉल की फील्ड के बराबर है।
ष्ठगढ़ाधीपति खुडिजल जी के अलावा किसी भी देवी देवताओं का रण में प्रवेश निषेध है। खुडिजल महाराज दाहिनी प्रौल से अंदर जाते हैं और नृत्य करने के पश्चात दूसरी प्रौल से बाहर निकलते हैं। महाराज इसे अपना विशेष स्थान कहते हैं तथा जो भी यहाँ के वंशज हैं उन्हें अपना कमरा खाली रखने की इजाजत नहीं है। सभी परिवारों के किसी न किसी सदस्य को यहाँ रहना ही पड़ता है तथा रोज़ चूल्हा जलाना ही पड़ता है हवेली के बाहर की चारों तरफ तथा अंदर की चारों तरफ भी बालकोनि है जिसे चाउलि कहते हैं। चाउलि पहले सिर्फ ऊपरी मंजिल में ही हुआ करती थी लेकिन जैसे जैसे बंटवारा हुआ लोगों ने अपने-अपने तरीकों से मोडिफाइ कर कुछ बदलाव भी किये हैं। कहा जाता है कि 1905 में जब हिमाचल में भयानक भूकंप आया तो पूरे रघुपुर क्षेत्र में कुछ ही भवन गिरने से बच पाए थे जिनमे से ये हवेली एक है। कुल मिलाकर देखा जाए तो करशाला चौकी पौराणिक हिंदू वास्तुशास्त्र और पहाड़ी काश्तकला का एक अद्भुत नमुना है।
सौजन्य- Tek ThakRay