12/02/2025
*MAN 2032 की आप सभी से विनम्र अपील* 🙏 💖 🙏
हिमाचल प्रदेश देव भूमि है...इसे नशे की भूमि मत बनाओ ।
*नशा* नशा एक एसी बुरी लत है जिससे इंसान का शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से,आर्थिक रूप से पतन हो जाता है।
नशा निवारण करने के लिए हम सभी को अपनी सहभागिता दर्शाने की आवश्यकता है। हमें खुद स्वयं को बदलना होगा।
अन्यथा नशा खत्म नहीं होगा बल्कि और बढ़ेगा....यदि अभी भी नहीं जागे तो इस पर अंकुश लगाना लगभग असंभव हो जाएगा ।
क्यों, क्योंकि लगभग 70% लोग नशेड़ी हैं....?
सोशल मिडिया पर जिस भी साथी ने पहले यह पोस्ट शेयर की है आज के वर्तमान परिदृश्य को सामने रखकर ही विचार सांझा किए हैं ।
मैं इसमें कुछ विचार जोड़कर आप सभी से सांझा कर रहा हूँ।
कुछ लोग नशे के खिलाफ मुखर होकर सड़कों पर उतर रहे हैं तो कुछ लोगों ने सुर्खियां बटोरने के लिए ईनाम की घोषणा भी कर रहे हैं। हर कोई चिट्टे के खात्मे का संकल्प ले रहा है। सवाल यह है कि यह कैसे होगा जब हम स्वयं नशे के पोषक बने हुए हैं।
लोगों की सामूहिक भागेदारी के बिना हमारे समाज से नशा खत्म करना संभव नहीं है। देव कार्य, भंडारा, मुंडन या शादी विवाह सब जगह खुलेआम शराब नशा चलती है। हमारा समाज इतना तामसिक हो गया है कि हम शराब पीने के बहाने ढूंढने लगते हैं, नई गाड़ी ली, नया घर बनाया, आईफोन लिया, नये जूते लिए यहां तक कि गाड़ी बेचने पर भी पार्टी करते हैं। शराब हमारी संस्कृति में ऐसा रच बस गया है कि मरग(किसी की मौत पर) को छोड़कर कोई भी कारज इसके बिना पूरा नहीं होता। अपनी शादी में संतरा पीलाने वाला भी दूसरे व्याह में ब्लैंडर प्राइड की फरमाइश करता है। हद तो तब होती है जब किसी कारज के लिए लकड़ी काटने वाले जुआरे भी आने से पहले चिकन बोतल की शर्त रखते हैं। कारज चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो अगर उसमें दारू न मिले तो सब कोई न कोई मीन-मेख निकाल कर उलाहना देते हैं। जिसके घर में फंक्शन होता है वह भी दारू परोसने को अपनी शान समझता है, नशे में धुत्त होकर जब तक दो चार लमलेट न हो जाए उसे तसल्ली नहीं होती। भले ही उसने कर्ज लेकर अपना फंक्शन निपटाया हो।
एक जमाना था जब फंक्शन की जानकारी सबसे पहले पंडित जी को होती थी लेकिन अब ठेके वाले को रहती है। वह ठेके की आड़ में ब्लैक की दारू डिस्काउंट पर घर पहुंचा देता है। अगर उसने डिस्काउंट नहीं दिया तो दूसरा फ्री होम डिलीवरी के लिए तैयार बैठा रहता है। हम भी ब्लैक मिली मुफ्त की दारू के चार पैग एक्स्ट्रा गटक जाते हैं, कौन पूछता है। कुछ जगहों पर अब तो महिलाएं भी दो चार पैग खींच लेती हैं। भला वह इस मामले में पुरुषों से पीछे कैसे रहें। रही सही कसर यह शराब पर गाने बनाने वाले तथाकथित कलाकार करते हैं, मजाल है इन कमीनों ने अपने गानों में शराब और भांग की बुराई की हो कभी।
दूसरा नशा हमारे पहाड़ में सुल्फा यानी चरस है। इसे भी हम भोले का प्रसाद बताकर अपने समाज में खूब बांटते हैं। मैंने स्वयं इसका इस्तेमाल किया है इसलिए अनुभव से कह रहा हूं। सुल्फा पीने वालों के अपने ही तर्क रहते हैं। वह कहते हैं चरस पीकर क्या कभी किसी ने लड़ाई झगड़ा किया है? क्या चरस पीकर किसी ने एक्सिडेंट किया है? हम सुटा लगाकर शांत रहते हैं इसलिए पीते हैं। सुटेरिये भूल जाते हैं कि समाज का जो एक्सिडेंट वह कर रहें हैं शायद ही कोई दूसरा करता होगा। देवी देवताओं के साथ चलने वाले देवलु भी इसकी चपेट में हैं, उनको लगता है कि वह भोले की बूटी पी रहे हैं। खुलेआम पीकर वह असल में वह समाज में जहर बो रहे हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि यह सब हम खुलेआम करते हैं, बच्चे, बुजुर्ग यहां तक कि मां बाप के सामने। हमारी यह करतूतें देखकर बच्चे क्या सीखेंगे? जाहिर है वह हमसे एडवांस है तो एडवांस नशा ही करेंगे इसलिए ही वह भांग, सुल्फे से आगे बढ़कर फैंटालिन जैसे घातक सिंथेटिक ड्रग्स का इस्तेमाल करने लगे हैं। जैसे हमने शराब और भांग को अपनी संस्कृति में शामिल कर लिया है ठीक वैसे ही युवा पीढ़ी ने चिट्टे को अपना लिया है। अब जब चिट्टे की ओवरडोज से बच्चे मरने लगे हैं तो हम खुद सुधरने की बजाए खूब हो हल्ला मचा रहे हैं। कुछ शराबी और भंगेड़ियों ने तो नशे नशे में चिट्टा की जानकारी देने वालों को ईनाम देने की घोषणा भी कर डाली है। लॉजिक यह कि शराब और भांग इतनी खराब नहीं है जितना यह चिट्टा है।
अरे भई! जब हमारा पूरा समाज ही नशेड़ी बन गया है तो सिर्फ चिट्टेरियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। पहले हमें खुद सुधरना होगा शादी व्याह, देऊली/देऊजी सहित सभी कार्यक्रमों में शराब परोसना बंद करना होगा। चरस का सेवन बंद करना होगा। अपने घर को ऐशट्रे फ्री बनाना होगा। जब हम खुद नशा नहीं करेंगे और न ही परोसेंगे तो हमारे बच्चे भी हमसे यही सीखेंगे। अन्यथा आज चिट्टा है कल कोई दूसरा नशा आएगा और हमारी नस्लों को तबाह कर जाएगा। नशा और इसका कारोबार और बढ़ता जाएगा जिसे कोई नहीं रोक पाएगा क्योंकि सोशल मिडिया, व न्यूज के माध्यम से पता चल रहा है कि अब तो हर कोई इसमें संलिप्त होता जा रहा है यहां तक कि राजनेता से लेकर पुलिस भी?
अब नशे को न कहने का समय आ गया है।
यह मैसेज हर युवा वर्ग तक और समस्त अभिभावकों तक पहुंच जाना चाहिए।
मिलकर हम हिमाचल प्रदेश को 2032 तक आत्मनिर्भर और नशा मुक्त प्रदेश बना सकते हैं ।
*आप स्वयं विचार कीजिए*
💖🙏