12/11/2025
नेताजी का विरोध!
नेताजी सांप्रदायिक राजनीति के धुर विरोधी थे। इसीलिए जब वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो कांग्रेस में लीग और हिंदू महासभा की दोहरी सदस्यता रखने वाले सदस्यों को चेतावनी देते हुए कहा कि आपको कांग्रेस की सदस्यता छोड़नी होगी यदि आप इन संगठनों के भी सदस्य हैं। कांग्रेस में दोहरी सदस्यता नहीं चलेगी। उन्होंने इसे सख्ती से लागू किया।
हालांकि कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि बोस ने कुछ मौकों पर सांप्रदायिक नेताओं से भी मुलाकात की थी या मिलने की कोशिश की थी। ऐसा कहकर वे अपने नेताओं की अहमियत और आंदोलन में अपनी सहभागिता की वैधता को सुनिश्चित करना चाहते हैं। जबकि बोस का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करना था। उनके लिए भारत की स्वतंत्रता सर्वोपरि थी, बाकी सब बाद में। उन्होंने जर्मनी के तानाशाह हिटलर से भी मिलना तय किया, क्योंकि उनको लगता था कि उसकी सहायता से वे अपने उद्देश्य को पाने में सफल होंगे।
इसी भावना के चलते ही उन्होंने 1939 में संघ के हेडगेवार से मिलना तय किया, क्योंकि सबके सहयोग से वे ब्रिटिश सत्ता को कड़ी चुनौती दे सकते थे। यहां भी उनका मुख्य उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने से था, कोई राजनीतिक सत्ता हासिल करना नहीं।
बोस ने हेमू हुद्दार (Hemu Hudedar), से हेडगेवार से मुलाकात कराने को कहा। हुड्डार जो आरएसएस के प्रारंभिक सदस्य थे और हेडगेवार के बहुत करीबी थे। ये संघ के पहले महासचिव भी रहे थे। लेकिन बाद में वे संघ से अलग हो गए थे। भारतीय स्वतंत्रता अब उनका मुख्य लक्ष्य हो गया था। हुद्दार ने बोस के अनुरोध पर हेडगेवार से मिलने का फैसला किया। वे बोस के प्रति सद्भावना रखते थे। हुद्दार हेडगेवार के साथ अपने पुराने संबंधों के कारण इस भूमिका के लिए उपयुक्त थे। वे नागपुर पहुंचे, जहां हेडगेवार के सहयोगी एम.एन. घाटे ने उनका स्वागत किया। हुद्दार ने हेडगेवार के कमरे में प्रवेश किया, जहां वे कुछ युवा स्वयंसेवकों के साथ हंसते-बोलते मिले। हुद्दार ने बोस का संदेश दिया: "मैं सुभाष बाबू द्वारा भेजा गया हूं, जो आपसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक हैं।" लेकिन हेडगेवार ने कहाकि वे "बहुत बीमार" हैं और किसी से मिल नहीं सकते। हुड्डार लिखते हैं कि वास्तव में, हेडगेवार स्वस्थ दिख रहे थे, लेकिन आरएसएस की नीति के अनुसार, वे संगठन को प्रत्यक्ष राजनीतिक आंदोलन से अलग रखना चाहते थे। हुद्दार ने बहुत अनुरोध किया, लेकिन हेडगेवार अडिग रहे। हुद्दार ने हेडगेवार से अनुरोध किया कि वे कम से कम बाहर इंतजार कर रहे एक अन्य व्यक्ति (शाह) को अपनी "शारीरिक बीमारी" के बारे में बताएं, ताकि बोस को संदेह न हो कि हुद्दार ने ही मिशन विफल कर दिया। हालांकि, हेडगेवार ने ऐसा नहीं किया। बाद में हुद्दार ने इस मुलाकात का ज़िक्र किया, जिससे तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य को समझा जा सकता है। सुभाष सहयोग की आकांक्षा से सावरकर से भी मिलते हैं।
बोस सांप्रदायिक राजनीति के तौर-तरीके बखूबी जानते थे। 1940 में हिंदू महासभा के संदर्भ में उनका यह बयान देखें, जो आनंद बाज़ार पत्रिका में छपा था- "हिंदू महासभा ने त्रिशूलधारी संन्यासी और संन्यासिनों को वोट मांगने के लिए लगा दिया है। त्रिशूल और भगवा लबादा देखते ही हिंदू सम्मान में सिर झुका देते हैं। धर्म का फायदा उठाकर इसे अपवित्र करते हुए हिंदू महासभा ने राजनीति में प्रवेश किया है। सभी हिंदुओं का कर्तव्य है कि इसकी निंदा करे।"
बोस सांप्रदायिक सद्भाव के पक्षधर थे। उन्होंने अपनी आजाद हिंद फौज़ की ब्रिगेड के नाम झांसी की रानी, गांधी, नेहरू और आजाद के नाम पर रखे न कि मजहबी नेताओं के नाम पर।
बोस अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते थे। इसीलिए बोस जब भी
कोई स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य धारा से अलग हुआ, उसकी तीव्र भर्त्सना करते हैं। 1 जनवरी 1943 को सिंगापुर में आज़ाद हिंद फौज के एक महत्वपूर्ण समारोह में नेताजी ने स्पष्ट कहा कि “जो भारतीय स्वतंत्रता के युद्ध में शरीक होने से इनकार करते हैं, वे देशद्रोही हैं।”
सुभाष बाबू के ये तीखे शब्द तब आए जब भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। ध्यातव्य है कि इस दौरान द्विराष्ट्रवाद के प्रबल पैरोकार जिन्ना भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध कर रहे थे। हिंदू महासभा भी इस आंदोलन से गैरहाजिर रही थी।मुखर्जी ने तो जो कि बंगाल में लीग की सहयोगी सरकार में वित्तमंत्री और उप प्रधान थे, ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने की सलाह दी थी।
नेताजी सावरकर और जिन्ना दोनों की राजनीति से खिन्न थे। 31 अगस्त 1942 को बर्लिन से प्रसारित अपने रेडियो संदेश में नेताजी ने जिन्ना और सावरकर दोनों का नाम लेते हुए स्पष्ट कहा था कि - “वे लोग जो ब्रिटिश साम्राज्य के साथ समझौते का स्वप्न देख रहे हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि ब्रिटिश साम्राज्य का अंत निकट है।
जिन्ना ने भारत छोड़ो आंदोलन को
“मुस्लिम हितों के लिए हानिकारक” बताया।
जिन्ना और सावरकर दोनों के निशाने पर इस समय कांग्रेस थी। ये दोनों इस दौर में ब्रिटिश शासन के सहयोगी की भूमिका में थे।
सावरकर ने भारत छोड़ो आंदोलन का खुला विरोध किया और ब्रिटिश शासन से “सैन्य प्रशिक्षण” के नाम पर सहयोग का आह्वान किया। सावरकर के 1942 के पुणे के एक भाषण को देखें , जिसमें वे कहते हैं —“युवक ब्रिटिश सेना में भर्ती हों ताकि वे सैन्य कौशल प्राप्त कर सकें और भविष्य में हिंदू राष्ट्र की रक्षा कर सकें।”
सुभाष चंद्र बोस ने इस क्षुद्र राजनीति का विरोध करते हुए कहा कि, “केवल वही व्यक्ति स्वतंत्र भारत में सम्मान का अधिकारी होगा, जिसने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया हो।”
लेकिन विडंबना है कि तब नेताजी और भगतसिंह की बात न मानने वाले, उनकी राह के उलट चलने वाले सांप्रदायिक संगठन आज राजनीति की मुख्यधारा के नायक बनने की इच्छा से उन्हींको अपनाने की बात कर रहे हैं। हालांकि इसका यह मतलब कतई न निकाला जाय कि इन सांप्रदायिक संगठनों का हृदय परिवर्तन हो गया है। नेताजी, भगतसिंह और पटेल इनके लिए पॉलिटिकल टूल से ज्यादा नहीं। ये इन राष्ट्रनायकों का इस्तेमाल नेहरू पर निशाना साधने के लिए करते हैं। उनकी सांप्रदायिक राजनीति आज और ज्यादा घृणा के स्तर पर पहुंच गई है। अगर प्रधानमंत्री सुभाष या भगतसिंह बने होते तो वे भी आज इनके निशाने पर उसी तरह होते जैसे आज नेहरू हैं। वे सभी नेता जो सांप्रदायिक सद्भाव की बात करते थे, तब भी इन सांप्रदायिक संगठनों के नेताओं को पसंद नहीं आते थे। इसे गोडसे के अग्रणी अख़बार में छपे उस चित्र के जरिए समझा जा सकता है, जिसमें गांधी को दशानन के रूप में दिखाया गया है जबकि सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी गांधी पर शर संधान करते हुए दिखते हैं। रावण के दस सिरों में पटेल, नेहरू और सुभाष भी शामिल हैं।
आज जिस तरह से नेहरू बनाम बोस, नेहरू बनाम पटेल और नेहरू बनाम भगतसिंह किया जाता है, उसके अपने निहितार्थ हैं। ये सब कवायद उनकी तरफ से होती है, जिनकी स्वतंत्रता आंदोलन में पूरी तरह से गैर मौजूदगी रही है। बोस और भगतसिंह निःसंदेह अनमोल रत्न हैं। लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि ये फलां बनाम फलां की राजनीति करने वाले खुद बोस और भगतसिंह की विचारधारा के कितने नजदीक हैं।
साभार Sanjeev Shukla