Kolkata Rajasthan Sanskritik Vikas Parishad

Kolkata Rajasthan Sanskritik Vikas Parishad Developing relations of the culturally rich West Bengal & Rajasthan, path shown by Rabindranath Thakur, Satyajit Ray, and others.

Let us explore our heritage and know each other.Culture unites.
-Keshaw Kr Bhatter, Founder GS

05/09/2026
05/09/2026

बिज्जी शताब्दी वर्ष

सही मायनों में बिज्जी राजस्थानी भाषा के भारतेंदु हरिश्चंद्र थे, जिन्होंने उस अनथक भाषा में आधुनिक गद्य और समकालीन चेतना की नींव डाली। अपने लेखन के बारे में उनका कहना था- "हवाई शब्द-जाल व विदेशी लेखकों के अपच का वमन करने में मुझे कोई सार नज़र नहीं आता। आकाशगंगा से कोई अजूबा खोजने की बजाय मुझे पाँवों के नीचे की धरती से कुछ कण बटोरना ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है, अन्यथा इन कहानियों को गढ़ने वाले लेखक की कहानी तो अनकही रह जाएगी।" विजयदान देथा की कहानियाँ पढ़कर एफटीआईआई में महान फिल्मकार ऋत्विक घटक के छात्र रहे विख्यात फिल्मकार मणि कौल इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने तत्काल उन्हें लिखा- ‘तुम तो छुपे हुए ही ठीक हो। ...तुम्हारी कहानियाँ शहरी जानवरों तक पहुँच गयीं तो वे कुत्तों की तरह उन पर टूट पड़ेंगे। ...गिद्ध हैं नोच खाएँगे। तुम्हारी नम्रता है कि तुमने अपने रत्नों को गाँव की झीनी धूल से ढँक रखा है।‘ हुआ भी यही, अपनी ही एक कहानी के दलित पात्र की तरह- जिसने जब देखा कि उसके द्वारा उपजाए खीरे में बीज की जगह 'कंकड़-पत्थर' भरे हैं तो उसने उन्हें घर के एक कोने में फेंक दिया, किंतु बाद में एक जौहरी की निगाह उन पर पड़ी तो उसकी आँखें चौंधिया गयीं, क्योंकि वे कंकड़-पत्थर नहीं, कीमती हीरे थे। विजयदान देथा के साथ भी यही हुआ। उनकी कहानियाँ अनूदित होकर जब हिंदी में आयीं तो हिंदी-संसार की आँखें चौंधिया गयीं। विजयदान देथा एक 'मैक्सिको के कवि' की कहानी सुनाना पसंद करते थे- 'एक मैक्सिकन लेखक अर्जेंटीना के दूरदराज गांव में था और वहां उसने कुछ मछुआरों को समुद्र में जाल फेंकते देखा। मछुआरे एक गीत गा रहे थे। उसने आश्चर्य से पूछा, "क्या तुम जानते हो यह किसका गीत है? क्या तुम पाब्लो नेरुदा को जानते हो?" अनपढ़ मछुआरों ने जवाब दिया, "नेरुदा कौन? हमें तो सिर्फ यह गीत पता है।" अपने आंसू पोंछते हुए मैक्सिकन लेखक ने कहा, "कितना महान कवि था, जिससे अनजान रहकर भी उसके गीत दूसरे देशों के मछुआरे गाते हैं!" यह किस्सा देथा की रचनाओं का मूल है, उन्होंने अपनी कहानियां चाची, पड़ोसी कुम्हारों, किसानों, दरबारी नौकरों और चोरों तक से सुनी थीं। ये उनकी कहानियां थीं जब वे सुनाते थे, और अब उनकी कहानियां जब वे लिखते हैं। वास्तव में, देथा की कहानियां भी दुनिया भर में सुनाई जाती हैं, लेकिन कम लोग जानते हैं कि लेखक कौन है। उदाहरण लीजिए बॉलीवुड फिल्म 'पहेली' (शाहरुख खान अभिनीत और अमोल पालेकर निर्देशित) या थिएटर गुरु हबीब तनवीर का सदाबहार नाटक 'चरनदास चोर'—बहुत से लोग इन प्रोडक्शंस को जानते हैं या देख चुके हैं, लेकिन कम लोग जानते हैं कि ये बिज्जी की कहानियों 'दुविधा' और 'खंटीलो चोर' पर आधारित थे। लोककथा अमर है; कहानीकार हमेशा नहीं।

(लेख का एक अंश)

आभार दैनिक छपते-छपते

केशव भट्टड़
महासचिव
कोलकाता राजस्थान संस्कृतिक विकास परिषद

04/09/2026

निर्गुण, निराकार ब्रह्म का
पूर्णावतार श्रीकृष्ण,
के जन्मोत्सव की हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं 🙏🏻

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल
05/05/2026

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' -
बंगाल की सांस्कृतिक विरासत
और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल

15/04/2026
आभार दोपहर को प्रकाशित डिजिटल दृष्टि परख
02/01/2026

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आभार सांध्य सेवा संसार
02/01/2026

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बीकानेर में प्रत्येक मोहल्ले का अपना संवाद केंद्र। मोहल्ले के चौक में स्थापित लकड़ी या लोहे से बना पाटा।सामाजिक मेल-मुलाक...
02/01/2026

बीकानेर में प्रत्येक मोहल्ले का अपना संवाद केंद्र। मोहल्ले के चौक में स्थापित लकड़ी या लोहे से बना पाटा।
सामाजिक मेल-मुलाकात और संवाद का जीवंत केंद्र।

आभार कोलकाता हिंदी न्यूज़ पोर्टल का

केशव कुमार भट्टड़, कोलकाता। बीकानेर, राजस्थान का एक ऐतिहासिक शहर, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्य.....

आभार कोलकाता हिंदी न्यूज़ पोर्टल का।
02/01/2026

आभार कोलकाता हिंदी न्यूज़ पोर्टल का।

केशव कुमार भट्टड़, कोलकाता। सभी स्वागत करते हैं, तो नए साल को सबके यहाँ आना चाहिए, पर यह चकमा दे जाता है, बहुतों के यहा.....

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31/12/2025

स्वागत 2026
नए संकल्पों का अभिवादन- अभिनंदन

- केशव कुमार भट्टड़

सभी स्वागत करते हैं, तो नए साल को सबके यहाँ आना चाहिए, पर यह चकमा दे जाता है, बहुतों के यहाँ नहीं आता। देश में सदियाँ बदल जाती है, पर साल वही का वही रह जाता है। हमारे देश में वह अधिकाँश के यहाँ आता ही नहीं। पता नहीं किसके यहाँ अटका पड़ा रहता है।

सोचने पर लगता है कि नया साल तो आता है, पर वह आकर सिर्फ कैलेण्डरों से चिपक जाता है, डायरियों के पन्नों में जाकर छिप जाता है, जीवन में नहीं आता है। याद है बेकेट का नाटक 'वेटिंग फ़ॉर गोडो', उसके दोनों दुःखी, बेरोजगार आवारे पात्र गोडो की प्रतीक्षा करते हैं कि वह आकर उन्हें दुःखों से मुक्त कर देगा, पर वह वायदा करके भी नहीं आता, हर शाम संदेश भेज देता है कि वह आज नहीं कल आएगा। लगता है, नया साल भी उसी तरह बार-बार आश्वासन देकर नहीं आता। वही सबकुछ- युद्ध, हत्याएं, बलात्कार, आत्महत्या, ठगी, तनाव भरी राजनीतिक बयानबाजी, घोटाले, चरित्रहनन, चीखते-मुर्गा लड़ाते न्यूज़ एंकर, दुर्घटनाएं, हल्की और उकसाती राजनीति। गिरता भाषाई स्तर। तनाव है। ओह नो!

बकौल शायर अमीर क़ज़लबख़्स - यकुम जनवरी है, नया साल है /दिसंबर में पूछूँगा क्या हाल है।

पर क्या किसी प्रतीक्षा में, किसी इंतज़ार में, किसी आशा में जीते जाना ही जीवन है ? इसी में जीते जाने का आनंद है ? यदि मुक्ति की प्रतीक्षा के साथ मुक्ति का संकल्प भी जुड़ जाये, तो क्या जीवन बदलेगा नहीं ? मुक्ति के लिए संघर्ष करनेवाला जीवन क्या सार्थक नहीं हो जाएगा ?
परेशानियों को जानते हुए भी, परेशानियों में रहते हुए भी एक दिन हंस-गा लेना, क्या यह बड़ी बात नहीं है ? मौत का एक दिन मुअय्यन है, तो क्या रात भर करवटें बदलते रहें, सोये नहीं ?

जिंदगी में एक क्षण की हंसी-खुशी का भी महत्व है। साल का पहला दिन संकल्पों का भी होता है-जिंदगी के बारे में जिंदादिली से सोचो- 'नहीं आने वाले नया-साल' को लाने का संकल्प- संकल्प करो- 'इसे' लाना ही है। संकल्प अपने लिए, अपने सुखी भविष्य के लिए करो। संकल्प देश के लिए, अपने देश की खुशहाली के लिए करो और किसी के समझाने से नहीं, अपनी खुशहाली को गहराई से खुद समझो। राजनीति की भेड़ नहीं, राजनीति का गड़रिया बनने का संकल्प करो। इतिहास का जीवन नहीं, आज का जीवन रचने का संकल्प करो। अपनी सामूहिकता की ताकत को पहचानो। देख लो - अरावली पर्वतमाला फिलहाल सुरक्षित है।सेंगर फिलहाल जेल में ही बंद है।गिग वर्कर्स अपने संघर्ष को सफलता की तरफ लेकर आगे बढ़ रहे हैं।

इन सब को भी देख लो - नया लेबर बिल शोषण का नया औजार है। बिजली कंपनियां पिछले दरवाजे से नया मीटर लगाने पर आमादा हैं। जंगल काटे जा रहें हैं। देश में आर्थिक असमानता और बेरोजगारी चरम पर हैं। मनरेगा को ध्वंश कर उससे गांधी बाहर निकाल दिए गए हैं। घुसपैठिया शब्द राजनीति का नया हथियार है। घुसपैठिये देश में जितने नहीं है उससे कई गुणा ज्यादा भाषणों में है। बिहार चुनाव में 10000 रुपये का मास्टरस्ट्रोक खेला गया। केंद्रीय चुनाव आयोग ने अपनी रीढ़ किसी म्यूजियम में रखवा दी है। बंगाल सरकार के मंत्री और नेता भ्रस्टाचार में धरें जा रहें हैं। शिक्षक भर्ती के लिए रिश्वत लेनेवाले पीड़ितों को अब नए आश्वासन बांट रहे हैं। डॉक्टरी हो या वकालात, छात्राएं सब जगह असुरक्षित हैं। संविधान भी लगता है मार्गदर्शन मंडल का सदस्य बना दिया गया है। विदेशी कहकर भारतीय भारतीयों को ही मार रहे हैं। बंगाल में शिक्षा और स्वास्थय व्यवस्था गंभीर संकट में है। क्या देश और क्या प्रदेश - समरथ को नहीं दोष गुसाईं- अब लोकतंत्र का नया मंत्र है। करन सके सोई कर ले, मन नहीं धड़काता, जय लक्ष्मी माता।

महिला विश्वकप क्रिकेट में भारत का परचम लहराया। पिछले साल चंद्र मिशन सफल हुआ था, अब हम मंगल की टोह ले रहे हैं, सूर्य को पढ़ रहे हैं, नीरज चोपड़ा ने पदक जीता था, देश की बेटियों ने हॉकी में भी परचम फहराया था। खेलों में, विज्ञान में जीवन का स्पंदन बचा हुआ है। राजनीति और सांप्रदायिकता का गठजोड़ जीवन के स्पंदन पर हमलावर है, इसे भी देख लो।

तो संकल्प करो नया साल लेकर आएंगे। वो सुबह हमीं से आएगी, वो सुबह हमीं तो लाएंगे। लानी ही है वो खुशगवार सुबह क्योंकि अब भी फूल खिल रहें हैं, बच्चे खेल रहे हैं, खिलखिला रहें हैं। यही शुकुन है। वाओ, यस! इनके सुखद भविष्य के लिए, जीवन के लिए नया साल मिलकर लाएंगे। लाना ही है।

तो बीत गयी सो बात गयी- कहकर आगे बढ़े। भोर हुई लो रात गयी, कहकर आगे बढ़ो। कुछ ना भूलते हुए, सबकुछ याद रखते हुए मिलकर आगे बढ़ो। इंकलाब को जिंदाबाद करो। अंगड़ाई लेकर उठ जाओ। उदासीनता तोड़कर आशा के गीत गाओ। जिंदा है तू जिंदगी की बात कर...

जिंदगी की बात करो। दुनिया अंधेरे के गर्त में नहीं डूबेगी,रोशनी अभी शेष है।

नए दिन की शुभकामनाएं। आपके 'आज' से संकल्पों के आगाज की शुभकामनाएं। ठक-ठक दस्तक देते 'नया-साल' की शुभकामनाएं।

कवि पंत के शब्दों में -
"नव-स्फूर्ति भर दे नव-चेतन /टूट पड़ें जड़ता के बंधन; शुद्ध, स्वतंत्र वायुमंडल में / निर्मल तन, निर्भय मन हो! प्रेम-पुलकमय जन-जन हो, नूतन का अभिनंदन हो!

नूतन वर्ष पर आपके नूतन संकल्पों का अभिवादन-अभिनंदन। प्रेम-पुलकमय जन-जन का, आप सबका अभिवादन-अभिनंदन।

साकारात्मक सोचें, नया रचें-निर्माण करें, सार्थक का चयन करें। जिंदगी बहुत खूबसूरत है।

केशव कुमार भट्टड़
महासचिव,
कोलकाता राजस्थान सांस्कृतिक विकास परिषद

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C/o Keshaw Kumar Bhatter
Kolkata

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