Kolkata Rajasthan Sanskritik Vikas Parishad

Kolkata Rajasthan Sanskritik Vikas Parishad Developing relations of the culturally rich West Bengal & Rajasthan, path shown by Rabindranath Thakur, Satyajit Ray, and others.

Let us explore our heritage and know each other.Culture unites.
-Keshaw Kr Bhatter, Founder GS

आभार दोपहर को प्रकाशित डिजिटल दृष्टि परख
02/01/2026

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आभार सांध्य सेवा संसार
02/01/2026

आभार सांध्य सेवा संसार

बीकानेर में प्रत्येक मोहल्ले का अपना संवाद केंद्र। मोहल्ले के चौक में स्थापित लकड़ी या लोहे से बना पाटा।सामाजिक मेल-मुलाक...
02/01/2026

बीकानेर में प्रत्येक मोहल्ले का अपना संवाद केंद्र। मोहल्ले के चौक में स्थापित लकड़ी या लोहे से बना पाटा।
सामाजिक मेल-मुलाकात और संवाद का जीवंत केंद्र।

आभार कोलकाता हिंदी न्यूज़ पोर्टल का

केशव कुमार भट्टड़, कोलकाता। बीकानेर, राजस्थान का एक ऐतिहासिक शहर, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्य.....

आभार कोलकाता हिंदी न्यूज़ पोर्टल का।
02/01/2026

आभार कोलकाता हिंदी न्यूज़ पोर्टल का।

केशव कुमार भट्टड़, कोलकाता। सभी स्वागत करते हैं, तो नए साल को सबके यहाँ आना चाहिए, पर यह चकमा दे जाता है, बहुतों के यहा.....

स्वागत 2026नए संकल्पों का अभिवादन- अभिनंदन- केशव कुमार भट्टड़सभी स्वागत करते हैं, तो नए साल को सबके यहाँ आना चाहिए, पर यह...
31/12/2025

स्वागत 2026
नए संकल्पों का अभिवादन- अभिनंदन

- केशव कुमार भट्टड़

सभी स्वागत करते हैं, तो नए साल को सबके यहाँ आना चाहिए, पर यह चकमा दे जाता है, बहुतों के यहाँ नहीं आता। देश में सदियाँ बदल जाती है, पर साल वही का वही रह जाता है। हमारे देश में वह अधिकाँश के यहाँ आता ही नहीं। पता नहीं किसके यहाँ अटका पड़ा रहता है।

सोचने पर लगता है कि नया साल तो आता है, पर वह आकर सिर्फ कैलेण्डरों से चिपक जाता है, डायरियों के पन्नों में जाकर छिप जाता है, जीवन में नहीं आता है। याद है बेकेट का नाटक 'वेटिंग फ़ॉर गोडो', उसके दोनों दुःखी, बेरोजगार आवारे पात्र गोडो की प्रतीक्षा करते हैं कि वह आकर उन्हें दुःखों से मुक्त कर देगा, पर वह वायदा करके भी नहीं आता, हर शाम संदेश भेज देता है कि वह आज नहीं कल आएगा। लगता है, नया साल भी उसी तरह बार-बार आश्वासन देकर नहीं आता। वही सबकुछ- युद्ध, हत्याएं, बलात्कार, आत्महत्या, ठगी, तनाव भरी राजनीतिक बयानबाजी, घोटाले, चरित्रहनन, चीखते-मुर्गा लड़ाते न्यूज़ एंकर, दुर्घटनाएं, हल्की और उकसाती राजनीति। गिरता भाषाई स्तर। तनाव है। ओह नो!

बकौल शायर अमीर क़ज़लबख़्स - यकुम जनवरी है, नया साल है /दिसंबर में पूछूँगा क्या हाल है।

पर क्या किसी प्रतीक्षा में, किसी इंतज़ार में, किसी आशा में जीते जाना ही जीवन है ? इसी में जीते जाने का आनंद है ? यदि मुक्ति की प्रतीक्षा के साथ मुक्ति का संकल्प भी जुड़ जाये, तो क्या जीवन बदलेगा नहीं ? मुक्ति के लिए संघर्ष करनेवाला जीवन क्या सार्थक नहीं हो जाएगा ?
परेशानियों को जानते हुए भी, परेशानियों में रहते हुए भी एक दिन हंस-गा लेना, क्या यह बड़ी बात नहीं है ? मौत का एक दिन मुअय्यन है, तो क्या रात भर करवटें बदलते रहें, सोये नहीं ?

जिंदगी में एक क्षण की हंसी-खुशी का भी महत्व है। साल का पहला दिन संकल्पों का भी होता है-जिंदगी के बारे में जिंदादिली से सोचो- 'नहीं आने वाले नया-साल' को लाने का संकल्प- संकल्प करो- 'इसे' लाना ही है। संकल्प अपने लिए, अपने सुखी भविष्य के लिए करो। संकल्प देश के लिए, अपने देश की खुशहाली के लिए करो और किसी के समझाने से नहीं, अपनी खुशहाली को गहराई से खुद समझो। राजनीति की भेड़ नहीं, राजनीति का गड़रिया बनने का संकल्प करो। इतिहास का जीवन नहीं, आज का जीवन रचने का संकल्प करो। अपनी सामूहिकता की ताकत को पहचानो। देख लो - अरावली पर्वतमाला फिलहाल सुरक्षित है।सेंगर फिलहाल जेल में ही बंद है।गिग वर्कर्स अपने संघर्ष को सफलता की तरफ लेकर आगे बढ़ रहे हैं।

इन सब को भी देख लो - नया लेबर बिल शोषण का नया औजार है। बिजली कंपनियां पिछले दरवाजे से नया मीटर लगाने पर आमादा हैं। जंगल काटे जा रहें हैं। देश में आर्थिक असमानता और बेरोजगारी चरम पर हैं। मनरेगा को ध्वंश कर उससे गांधी बाहर निकाल दिए गए हैं। घुसपैठिया शब्द राजनीति का नया हथियार है। घुसपैठिये देश में जितने नहीं है उससे कई गुणा ज्यादा भाषणों में है। बिहार चुनाव में 10000 रुपये का मास्टरस्ट्रोक खेला गया। केंद्रीय चुनाव आयोग ने अपनी रीढ़ किसी म्यूजियम में रखवा दी है। बंगाल सरकार के मंत्री और नेता भ्रस्टाचार में धरें जा रहें हैं। शिक्षक भर्ती के लिए रिश्वत लेनेवाले पीड़ितों को अब नए आश्वासन बांट रहे हैं। डॉक्टरी हो या वकालात, छात्राएं सब जगह असुरक्षित हैं। संविधान भी लगता है मार्गदर्शन मंडल का सदस्य बना दिया गया है। विदेशी कहकर भारतीय भारतीयों को ही मार रहे हैं। बंगाल में शिक्षा और स्वास्थय व्यवस्था गंभीर संकट में है। क्या देश और क्या प्रदेश - समरथ को नहीं दोष गुसाईं- अब लोकतंत्र का नया मंत्र है। करन सके सोई कर ले, मन नहीं धड़काता, जय लक्ष्मी माता।

महिला विश्वकप क्रिकेट में भारत का परचम लहराया। पिछले साल चंद्र मिशन सफल हुआ था, अब हम मंगल की टोह ले रहे हैं, सूर्य को पढ़ रहे हैं, नीरज चोपड़ा ने पदक जीता था, देश की बेटियों ने हॉकी में भी परचम फहराया था। खेलों में, विज्ञान में जीवन का स्पंदन बचा हुआ है। राजनीति और सांप्रदायिकता का गठजोड़ जीवन के स्पंदन पर हमलावर है, इसे भी देख लो।

तो संकल्प करो नया साल लेकर आएंगे। वो सुबह हमीं से आएगी, वो सुबह हमीं तो लाएंगे। लानी ही है वो खुशगवार सुबह क्योंकि अब भी फूल खिल रहें हैं, बच्चे खेल रहे हैं, खिलखिला रहें हैं। यही शुकुन है। वाओ, यस! इनके सुखद भविष्य के लिए, जीवन के लिए नया साल मिलकर लाएंगे। लाना ही है।

तो बीत गयी सो बात गयी- कहकर आगे बढ़े। भोर हुई लो रात गयी, कहकर आगे बढ़ो। कुछ ना भूलते हुए, सबकुछ याद रखते हुए मिलकर आगे बढ़ो। इंकलाब को जिंदाबाद करो। अंगड़ाई लेकर उठ जाओ। उदासीनता तोड़कर आशा के गीत गाओ। जिंदा है तू जिंदगी की बात कर...

जिंदगी की बात करो। दुनिया अंधेरे के गर्त में नहीं डूबेगी,रोशनी अभी शेष है।

नए दिन की शुभकामनाएं। आपके 'आज' से संकल्पों के आगाज की शुभकामनाएं। ठक-ठक दस्तक देते 'नया-साल' की शुभकामनाएं।

कवि पंत के शब्दों में -
"नव-स्फूर्ति भर दे नव-चेतन /टूट पड़ें जड़ता के बंधन; शुद्ध, स्वतंत्र वायुमंडल में / निर्मल तन, निर्भय मन हो! प्रेम-पुलकमय जन-जन हो, नूतन का अभिनंदन हो!

नूतन वर्ष पर आपके नूतन संकल्पों का अभिवादन-अभिनंदन। प्रेम-पुलकमय जन-जन का, आप सबका अभिवादन-अभिनंदन।

साकारात्मक सोचें, नया रचें-निर्माण करें, सार्थक का चयन करें। जिंदगी बहुत खूबसूरत है।

केशव कुमार भट्टड़
महासचिव,
कोलकाता राजस्थान सांस्कृतिक विकास परिषद

31/12/2025
जनरोष का असर। आगे भी नजरदारी जरूरी है।
29/12/2025

जनरोष का असर। आगे भी नजरदारी जरूरी है।

Supreme Court on Aravalli Hills - सुप्रीम कोर्ट ने अरावली मामले में 20 नवंबर को दिए अपने ही फैसले पर रोक लगा दी है।

28/12/2025

बीकानेर की पाटा संस्कृति: सामाजिक संवाद का जीवंत प्रतीक
-केशव कुमार भट्टड़

बीकानेर, राजस्थान का एक ऐतिहासिक शहर, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है। यहां के भुजिया, रसगुल्ले और भव्य किले न केवल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, बल्कि शहर की अनूठी 'पाटा संस्कृति' भी इसकी पहचान का अभिन्न अंग है। पाटा संस्कृति, जिसे 'पाटे' के रूप में जाना जाता है, पुराने शहर के चौकों और मोहल्लों में स्थापित लकड़ी या लोहे के बड़े तख्तों पर आधारित सामूहिक बैठकों का प्राचीन चलन है। पाटा संस्कृति की नींव 1488 ई. में रखी गई, जब राव बीका ने इस सुनहरे शहर की स्थापना की। 1950 ई. से पूर्व शहर में लगभग 120 पाटे थे, जो सामाजिक एकता के प्रतीक बने। चांदी के पाटे उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा के द्योतक माने जाते थे। ये पाटे न केवल सुख-दुख साझा करने के स्थल हैं, अपितु सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संवाद के जीवंत केंद्र हैं।

पाटा संस्कृति बीकानेर की सामाजिक एकजुटता और बौद्धिक जागरूकता का प्रतीक है। ये पाटे शहर को 'मस्त मौला' (आनंदमय) और 'संतोषी' (संतुष्ट) बनाते हैं। ये जन्म, विवाह, मृत्यु जैसे संस्कारों से लेकर धार्मिक उत्सवों और होली के रम्मत आयोजनों तक का केंद्र रहते हैं। इनके माध्यम से सांस्कृतिक पोषण होता है, जैसे 'रम्मत' आयोजनों के माध्यम से ऐतिहासिक कथाओं का प्रसार। यात्री इन्हीं पर ठहरकर जिम्मेदार नागरिकों से जुड़ते हैं।

पाटे बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत के गवाह हैं, जहां 'अमर सिंह राठौड़' जैसे ऐतिहासिक पात्रों की कथाएं 'रम्मत' से जीवंत होती रही हैं। होली के रम्मत (नाटकीय प्रस्तुतियां) आचार्य चौक के पाटे पर 85 वर्षों से आयोजित हो रही हैं। 1970 में प्रदर्शित बॉलीवुड फिल्म 'यादगार' के गीत 'एक तारा बोले....' का फिल्मांकन दम्माणी चौक के 'छतरी वाले' पाटे पर किया गया। ये पाटे बीकानेर की सामूहिक चेतना को प्रतिबिंबित करते हैं, जहां पारंपरिक तख्तों पर बैठकर संवाद की परंपरा फली-फूली। वैश्विक स्तर पर, ये पाटे बीकानेर के सॉफ्ट-पावर के रूप में चर्चित हैं, जहां देश-विदेश के मुद्दों पर सार्थक संवाद होता है। जातीय पंचायतों में इनका उपयोग विवाद समाधान के लिए होता था। ये इस संस्कृति की लोकप्रियता का प्रमाण है।

लोक मान्यताओं के अनुसार, शासक पाटों पर विराजमान होकर शासन व्यवस्था संचालित करते थे। 1708 ई. के कवि उदयचंद की रचनाओं में चौकों और पाटों का उल्लेख मिलता है, जो इनकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है। प्रारंभ में ये पत्थर की चौकियां थीं, किंतु 18वीं शताब्दी से लकड़ी के कलात्मक पाटे प्रचलित हुए। यहां बुजुर्ग और युवा एकत्र होकर स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं, जो सार्थक संवाद को प्रोत्साहित करता है। पाटे पूर्वजों की कर्मभूमि के रूप में पवित्र माने जाते हैं, जहां महिलाएं भी घूंघट ओढ़ती हैं।

पाटे सामान्यतः लकड़ी या लोहे के बड़े और मजबूत तख्ते होते हैं, जो एक से चार की संख्या में चौकों या मोहल्लों के किनारे लगे रहते हैं। इनकी ऊंचाई और चौड़ाई ऐसी होती है कि दस से पंद्रह व्यक्ति आसानी से बैठ सकें। शाम ढलते ही, स्थानीय निवासी—बुजुर्ग से लेकर युवा तक—इन पर एकत्रित हो जाते हैं। चर्चा के विषय विविधतापूर्ण होते हैं: स्थानीय चुनावी मुद्दों से लेकर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं, जैसे अमेरिका की राजनीति या पाकिस्तान के हालात, तक। बॉलीवुड फिल्में, ज्योतिषीय भविष्यवाणियां और त्योहारों की तैयारियां भी इन महफिलों का हिस्सा बनती हैं। जहां गपशप से लेकर जीवन के गहन रहस्यों तक की बातें उभरती हैं।विदेश में बसे बीकानेरी भी इन चर्चाओं की जानकारी लेते रहते हैं, जो शहर की सामूहिक स्मृति को जीवित रखती हैं।

पाटे न केवल संवाद के केंद्र हैं, अपितु सामाजिक सुरक्षा के द्वारपाल भी, जहां अजनबी को रोका जाता है और अपराधों पर नजर रखी जाती है, और इस प्रकार अपराध दर को न्यूनतम रखने में सहायक सिद्ध होती हैं। यह आधुनिक डिजिटल संवाद के दौर में पारंपरिक मुखोन्मुखी संचार और व्यक्तिगत संपर्क की गरिमा को संरक्षित रखती है। पाटे पर होने वाली चर्चाएं सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देती हैं। इस प्रकार, पाटा संस्कृति बीकानेर की सामाजिक संरचना को मजबूत बनाती है।

बीकानेर की पाटा संस्कृति मात्र एक स्थानीय परंपरा नहीं, अपितु सामाजिक संवाद की जीवंत धरोहर है, जो शहर की आत्मा को प्रतिबिंबित करती है। ये पाटे सिखाते हैं कि सच्ची प्रगति संवाद और एकजुटता में निहित है। आधुनिक जीवनशैली और शहरीकरण चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं, लेकिन बीकानेर के निवासियों की प्रतिबद्धता से यह संस्कृति जीवित रहेगी।

बीकानेर की यह अनमोल धरोहर चिरकाल तक फलती-फूलती रहे। यदि अवसर मिले, तो इन पाटों पर जाकर अनुभव कीजिए।

-केशव कुमार भट्टड़
महासचिव
कोलकाता राजस्थान सांस्कृतिक विकास परिषद

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26/12/2025

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क्या आपने कभी सोचा है कि 150 करोड़ साल पुरानी पर्वत श्रृंखला को एक कागजी परिभाषा से “गायब” किया जा सकता है?20 नवंबर 2025 क.....

मणि कौल (जन्म: जोधपुर, राजस्थान (तब ब्रिटिश इंडिया में जोधपुर, राजपुताना एजेंसी) में 25 दिसंबर 1944 को– देहांत: गुड़गांव,...
25/12/2025

मणि कौल
(जन्म: जोधपुर, राजस्थान (तब ब्रिटिश इंडिया में जोधपुर, राजपुताना एजेंसी) में 25 दिसंबर 1944 को– देहांत: गुड़गांव, हरियाणा में 6 जुलाई 2011 को)

मणि कौल, जन्म से नाम रबीन्द्रनाथ कौल, हिंदी फिल्मों के एक भारतीय डायरेक्टर थे और इंडियन पैरेलल सिनेमा की एक जानी-मानी हस्ती थे। उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से ग्रेजुएशन किया, जहाँ वे प्रसिद्ध निर्देशक आदरणीय ऋत्विक घटक के स्टूडेंट थे, और बाद में वहीं टीचर बने।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 'उसकी रोटी' (1969) से की, जिसके लिए उन्हें बेस्ट मूवी का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड (1971) मिला। मोहन राकेश के नाटक पर 'आषाढ़ का एक दिन' के लिए 1972 में और 'दुविधा' के लिए 1974 में पुनः उन्हें यह अवार्ड मिला। 1993 में फ़िल्म 'इडियट' के लिए एकबार फिर उन्हें यह अवार्ड दिया गया। कुल मिलाकर उन्हें चार बार इस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

उन्हें 1974 में विजयदान देथा 'बिज्जी' की राजस्थानी कहानी 'दुविधा' के लिए बेस्ट डायरेक्शन का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला।1989 में अपनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म सिद्धेश्वरी के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला।

उन्हें स्मरण करते हुए कहना चाहूंगा कि मणि कौल ने कहानी को जरिया बनाकर, उससे आगे बढ़कर विज़ुअल रिदम, शांति और गहरे आत्मनिरीक्षण के ज़रिए समय, सोच और अंदरूनी अनुभवों को एक्सप्लोर किया। उन्होंने लीनियर कहानियों को चुनौती दी, फिक्शन और डॉक्यूमेंट्री को मिलाया, और ऋत्विक घटक और आंद्रेई तारकोवस्की से प्रभावित होकर, 'उसकी रोटी' और 'दुविधा' जैसी सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्में बनाईं, जिससे दुनिया भर के सिनेमा पर एक स्थायी छाप छोड़ी। मोहन राकेश के 'आषाढ़ का एक दिन' नाटक पर इसी नाम से बनाई फ़िल्म में नाटक के मूल तत्व को कायम रखते हुए संवादों के साथ लेंस, प्रकाश और खासकर ध्वनि के प्रयोग से उन्होंने एक अविष्मरणीय माया रची।

कोलकाता राजस्थान सांस्कृतिक विकास परिषद आदरणीय फ़िल्म निर्देशक मणि कौल के जन्मदिन पर उनको नमन करते हुए उनका सादर स्मरण करता है।

-केशव कुमार भट्टड़
महासचिव,
कोलकाता राजस्थान सांस्कृतिक विकास परिषद

अरावली पर्वतमाला: परिभाषा की चपेट में फँसी धरती की सबसे प्राचीन पर्यावरणीय विरासत-केशव कुमार भट्टड़----------------------...
20/12/2025

अरावली पर्वतमाला: परिभाषा की चपेट में फँसी धरती की सबसे प्राचीन पर्यावरणीय विरासत
-केशव कुमार भट्टड़

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राजस्थान में, जहाँ अरावली मानसून के प्रवाह को नियंत्रित करती है, इसका विनाश स्थानीय जलवायु को और असंतुलित करेगा। राजस्थान के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है।
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अरावली पर्वतमाला, जो विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, हिमालय से भी पुरानी है, सदियों से उत्तर भारत की पारिस्थितिक संतुलन की रक्षक रही है। यह न केवल राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र को थार रेगिस्तान के विस्तार से बचाती है, बल्कि वर्षा जल को संग्रहीत कर भूजल स्तर को पुनर्भरित-रिफिल-करती है, विभिन्न प्रजातियों के वन्यजीवों के लिए आवास प्रदान करती है तथा वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यह चुपचाप खड़ी रहने वाली संरचना आज एक कानूनी विवाद का शिकार हो चुकी है, जहाँ उसकी ऊँचाई को आधार बनाकर उसके अस्तित्व को ही चुनौती दी जा रही है। नवीनतम विकास के संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के फैसले ने अरावली की परिभाषा को स्थापित किया है, जिसके तहत केवल स्थानीय धरातल से 100 मीटर या इससे अधिक ऊँचाई वाली भूमि को ही 'अरावली हिल्स' माना जाएगा। इस फैसले से 90% अरावली पर्वत श्रृंखला पर्वतीय श्रेणी से बाहर हो जाती है। यह परिवर्तन न केवल पर्यावरणीय संरक्षण को प्रभावित करता है, बल्कि एक व्यापक बहस को जन्म दे रहा है कि क्या विकास की आड़ में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन न्यायोचित है? दोहन को प्रोत्साहन देने के लिए इस तरह की नीतियां बनाकर सीमित समय के स्वार्थ के लिए भविष्य को बर्बाद कर देना आत्महत्या नहीं तो और क्या है ?

आधुनिक भारत में, मौन रहना ही अपराध का पर्याय बन गया है। अरावली पर्वतमाला ने न तो राजनीतिक मंचों पर भाषण दिए, न चुनाव लड़े, न ही सोशल मीडिया पर अभियान चलाए। यह मात्र अपनी मौजूदगी से रेगिस्तान को रोकती रही, दिल्ली-एनसीआर में वायु की गुणवत्ता सुधारती रही तथा जैव-विविधता को संरक्षित करती रही। तो इसके सरंक्षण के लिए आवाज़ उठाना किसकी जिम्मेदारी है ?- मेरी, आपकी, हमारी, हमसब की। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) के अनुसार, अरावली की 31 प्रमुख चोटियाँ पहले ही अवैध खनन के कारण विलुप्त हो चुकी हैं, और यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो यह संख्या और बढ़ सकती है। है ना गज़ब की बात!

परंतु अब, कानूनी दृष्टि से, हर ऊँचाई 'पहाड़' नहीं होती। विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाई गई इस नई परिभाषा के फलस्वरूप, अरावली पर्वतमाला का लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षण कवच से बाहर हो सकता है, जिससे अवैध खनन और निर्माण गतिविधियों के लिए द्वार खुल सकते हैं। प्रश्न अब यह नहीं रह गया कि अरावली क्यों कट रही है, बल्कि यह है कि इतने दशकों तक यह कैसे बची रही? सरकार ही भक्षक बन गयी हो तो रक्षा कौन करे - जबाब एक ही है, उम्मीद एक ही है - आम आदमी, आगे आना होगा और संगठित विरोध करना होगा। खुला मैदान नहीं दिया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नए खनन पट्टों या उनके नवीनीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा, किंतु मौजूदा वैध पट्टों को जारी रखने की अनुमति दी गई है। तथापि, विशेषज्ञों का मत है कि यह 'वैज्ञानिक' परिभाषा वास्तव में खनन उद्योग के हितों को प्राथमिकता देती है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन भंग हो सकता है। 31 शिखर कंज्यूम हो चुके हैं। अरे कहीं तो, कभी तो इस पर रोक लगे। आवाज़ उठाइये।

अरावली के ह्रास के परिणाम गंभीर हैं। यदि यह पर्वतमाला और क्षतिग्रस्त हुई, तो दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र थार रेगिस्तान के विस्तार का शिकार होगा, जिससे वायु प्रदूषण में वृद्धि होगी और ग्रीष्मकालीन तापमान असहनीय स्तर तक पहुँच जाएगा। भूजल स्तर में गिरावट के कारण टैंकर-आधारित जल आपूर्ति प्रथा और मजबूत होगी, तथा जैव-विविधता—जिसमें दुर्लभ प्रजातियाँ जैसे तेंदुआ और हिरण तथा कई अन्य प्रजातियां और वनस्पतियां शामिल हैं—पर भयानक प्रभाव पड़ेगा, ये जैव-विविधता और दुर्लभ वनस्पतियां नष्ट हो जाएगी।

राजस्थान में, जहाँ अरावली मानसून के प्रवाह को नियंत्रित करती है, इसका विनाश स्थानीय जलवायु को और असंतुलित करेगा। राजस्थान के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है।

इस संकट का प्रतिकार अभियान के रूप में सोशल मीडिया पर तेजी से उभर रहा है, जहाँ पर्यावरणविद्, राजनीतिक दल तथा सामान्य नागरिक न्यायालय के फैसले की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। सड़क, न्यायालय, विधान सभाओं और संसद तक इस लड़ाई को ले जाना होगा।

भारत एक समाधान-उन्मुख राष्ट्र है, किंतु अक्सर यहां समाधान सतही सिद्ध होता है और उद्देश्य वास्तविक सुधार कम, प्रचार और उससे राजनीतिक बढ़त का उद्देश्य अधिक रहता है। वास्तविक संरक्षण के लिए आवश्यक है कि कागजी परिभाषाओं से परे जाकर, सख्त निगरानी, वैकल्पिक खनन स्रोतों की खोज तथा सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया जाए। अरावली अभी भी खड़ी है, किंतु यह मात्र एक भूगोलिक संरचना नहीं, अपितु हमारी पर्यावरणीय जिम्मेदारी का प्रतीक है। जब किसी प्राकृतिक तत्व को परिभाषित कर सीमित कर दिया जाता है, तो उसके संरक्षण की प्राथमिकता भी कम हो जाती है। सच्चा विकास वही है, जहाँ प्रकृति कागजों तक सीमित न रहे, अपितु जीवंत बनी रहे।

अरावली कोई केक नहीं है प्रभु! कैसे भी लाभ के लिए इसकी बलि नहीं दी जा सकती। आह्वान है कि आवाज़ उठाओ - अरावली पर्वतमाला को बचाओ।

-केशव कुमार भट्टड़
महासचिव
कोलकाता राजस्थान सांस्कृतिक विकास परिषद

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