Politics in Kishanganj

Politics in Kishanganj Think, Express and Act

16/08/2022

किशनगंज वाले सिर्फ भाजपा के हारने का खुशी मना ले, लड्डू बांटे और सड़क पर लुंगी डांस करते रहे बाकी मातम तो 15 साल जंगल राज में भी मनाते थे और आगे भी मनाते ही रहेंगे। यहाँ के नेताओं को राजनीति नहीं दलाली आती है जनता को चाहिए चुनाव खर्च ठीक है।

कभी उसे भी बहुत गुरुर था=========================जब कोई चुनाव लड़ता है या लड़ चुका होता है तो लाल फीताशाही की तानाशाही और ...
10/04/2022

कभी उसे भी बहुत गुरुर था
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जब कोई चुनाव लड़ता है या लड़ चुका होता है तो लाल फीताशाही की तानाशाही और बर्बरता को लेकर अक्सर शिकायतें आती रहती हैं। लोग इस उमीद से नेताओं को याद करते हैं कि इंसाफ मिल सके। इस इंसाफ की जद्दोजहद और मदद की उमीद में अक्सर किसी न किसी अधिकारी से बात होते रहता है, कभी गुस्सा तो कभी नफरत या फिर कभी एहसानमंद महसूस होता है।

वो लाख #ईमानदारी का ढिंढोरा पिटवा ले, फोटो खिंचाले पर शरीर के भीतर जो बईमानी का कीड़ा है वो क्रोना से भी #खतरनाक है। कुछ खास विभाग के जुल्म व सितम के दास्तान इतिहास के पन्नों में भी लिखा हुआ है और वर्तमान में जो हो रहा है उसे भी हम देख रहे हैं। लाख दिखावे की ईमानदारी हो पर गरीबों को इंसाफ दिलाने की भूमिका दुनियाँ के सामने नंगी हो चुकी है। देश के आम नागरिकों के बीच फर्क सिर्फ खाकी के सिले कपड़े और जुल्म करने वाली मानसिकता का है। इस जिश्म में भी उतनी ही हड्डी हैं, वही शारीरिक ढांचा है, दर्द सहने और मुहब्बत करने के लिए वही दिल है, लेकिन याद रखना सरकारी लीबादा ओढे वाले से ज्यादा आज़ाद एक रिक्शेवाला है।

आप चादर ओढ़ कर भी गुलाम हैं हम कम कपड़ों में भी आज़ाद हैं।

जिस तरह संकट के नाम पर गरीबों पर जुल्म हुए है याद रख एक दिन अमेरिका भी अपने सुपर पावर होने पर गुरुर कर रहा था और आतंकवाद के नाम पर ऐसे ऐसे बम गिरा कर हज़ारों बेगुनाह मार रहे रहे थे एक तरफ लोग मातम मना रहे थे दूसरी तरफ सेटेलाइट तस्वीरों को देखकर वो जश्न मना रहे थे। आज एक कोरोना के सामने नतमस्तक है।

बात #मौत_के_बदले_मौत की नहीं है पर #दर्द_के_बदले_दर्द की जरूर है।

06/04/2022

किशनगंज जिला प्रशासन के खेलाफ ई रिक्शा चालकों का एक दिवसीय प्रदर्शन।

सीमांचल में AIMIM मजबूत या लोगों की मजबूरी...*******************************अभी हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में किशनगंज क्...
20/11/2020

सीमांचल में AIMIM मजबूत या लोगों की मजबूरी...
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अभी हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में किशनगंज क्षेत्र में AIMIM के 5 विधायकों का चुना जाना ये कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। अगर जीत के कारणों की समीक्षा की जाए तो ये महज़ परिवर्तन संसार का नियम है इस कहावत को चरितार्थ करता है। जबकि पार्टी और समर्थक मुस्लिम कयादत को खड़ा करने का एक मज़बूत आधार मान रहे हैं। अगर हम पांचों विधानसभावार नवनिर्वाचित विधायकों के परिणाम को देखें तो हमें परिवर्तन और आक्रोश में हुए मतदान और उनसे जुड़े सभी तथ्य मिल जाएंगे।

#किशनगंज_विधानसभा की बात करें तो 2019 विधानसभा उपचुनाव में AIMIM की जीत कांग्रेस समर्पित कार्यकर्ताओं एवं मतदाताओं के आक्रोश का प्रतिफल था दूसरी तरफ भाजपा को हराने का संकल्प, लोग एक जुट हो कर AIMIM को वोट दे दिए और कांग्रेस के आलाकमान तक ये मैसेज पहुंचा दिया कि जनता के इच्छा के विरुद्ध पार्टी टिकट देती है तो परिणाम ऐसे ही होंगे लेकिन इस बार AIMIM के तमाम हथकंडे जैसे धनबल, मुस्लिम कयादत, जुल्म, नाइंसाफी, बदहाली, बेरोजगारी तमाम तरह के मुद्दों को दर किनार करते हुए लोग महागठबंधन के नाम पर कांग्रेस को वोट दिए। साथ साथ बीजेपी को हराने का संकल्प तो हमेशा के तरह रहता ही है।
यहाँ ओवैसी और मुस्लिम कयादत को लोग ठुकरा दिया।

#बहादुरगंज_विधानसभा से कांग्रेस के 4 बार रहे विधायक से और उनके कार्यप्रणाली से लोग ऊब गए थे यहाँ परिवर्तन संसार का नियम है बिल्कुल फिट बैठता है। महागठबंधन का आंधी तूफान होने के बावजूद कांग्रेस के हारने की दूसरी सबसे बड़ी वजह यह रही है कि हर छोटे छोटे काम को लेकर विधायक के आगे पीछे करने वाले लोगों का मनोबल इतना बढ़ गया था कि गलत ढंग से उगाही को अपना धन्दा बना लिया था। तमाम तरह के कारणों में यह भी एक वजह रही है कि जब दुनिया कागज़ और कलम से अपनी लड़ाई लड़ रही है तो ऐसे में इस क्षेत्र में अपने प्रतिनिधि को कमज़ोर होना भी लोगों को बदलाव की ओर सोचने पर मजबूर कर दिया। जब परिस्थिति ऐसी बन जाए तो विकल्प के तौर पर जो भी सीरियस राजनीतिक दल सामने होगा लोग उसे वोट करेंगे।

#बहादुरगंज और #अमौर विधानसभा की कहानी लगभग एक जैसी है। anti incumbency और अपने प्रतिनिधियों का कागज़ कलम में कमज़ोर होना, पारंपरिक विकास कार्यों के एलावे नए योजनाओं का न लाना, प्रशासनिक तंत्रों में कमज़ोर पकड़, dynamic leadership की कमी और भ्रष्टाचार से ग्रसित जनता को बेसहारा छोड़ देना, इन्ही सब कारणों से AIMIM को एक बार जनता ने मौका दिया है। अगर इन पहलुओं पर कारगर साबित नहीं होता है तो AIMIM को भी लोग नकार देंगे।

#कोचाधामन विधानसभा की बात करें तो #मास्टर_मुजाहिद_आलम के लगातार जन सम्पर्क, सभी प्रकार के विकास कार्यों को सिर्फ पार्टी के नाम पर नकार दिया। यह भी नहीं सोचा कि नीतीश कुमार के 900 करोड़ से बने कृषि विश्वविद्यालय, AMUK के लिए जमीन के साथ साथ वहां बच्चों के रहने के लिए माइनॉरिटी होस्टल अलॉट करना, SSB और पुलिस लाइन के लिए जमीन अधिग्रहण को रोकना, बहन बेटियों के लिए साईकल, पोशाक,आदि प्रोग्राम चला कर निर्भय होकर बच्ची स्कूल जाने लगी, समाज में जो डर का माहौल था उसे खत्म किया, और यही कोचाधामन था जहां से मुजाहिद आलम ने सत्ता में रह कर CAA NRC NPR के खेलाफ आवाज़ उठाया, बीजेपी के काला कानून के खेलाफ नीतीश कुमार ने विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया इन तमाम एहसानों को भुलाकर, धनबल के दलदल में कोचाधामन धंस गया। सीमांचल की बदनसीबी यह है कि आज कोई भी अनहोनी घटना घटती है या किसी खास काम को लेकर नीतीश कुमार के पास जाने लायक कोई नेता नहीं बचा है।

#ठाकुरगंज विधानसभा में सत्ताधारी दल के नेता का हारना उनके अयोग्य होने का सबसे बड़ा कारण है। साथ साथ निर्दलीय उमीदवार के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, दूसरी तरफ AIMIM पार्टी के राज्य अध्यक्ष का संसदीय चुनाव में देवबंदी जमात का समर्थन पाने के लिए, राजद के प्रत्याशी के साथ राजनीतिक सांठगांठ के कारण AIMIM का कमज़ोर प्रत्याशी देना। तमाम तर कारणों से महागठबंधन की हवा तैयार हुई और ओवैसी फैक्टर नाकाम हो गया।

जिस तस्लीमुद्दीन को सीमांचल का गांधी कहा जाता है उनके के परिवार से लोगों को बहुत उमीदें हैं। #जोकिहाट_विधानसभा में AIMIM का जीतना राजद के अयोग्य कैंडिडेट को टिकट देना सबसे बड़ा कारण था। एक ही परिवार से दो भाई अलग अलग राजनीतिक दलों से चुनाव लड़े तो जनता उन दोनों में बेहतर कौन है उसे वोट देती है इसमें AIMIM का कोई कमाल नहीं है। हाँ नवनिर्वाचित विधायकों पर खुद को ईमानदार साबित करने और पहले के मुकाबले ज्यादा विकास कार्य लाने की जिम्मेवारी बढ़ गई है लोग उमीद भी करते हैं। अगर ये उल्टा साबित हुआ तो इसका परिणाम लोकसभा चुनाव में देखने मिलेगा।

29/09/2020

किशनगंज विधानसभा में कांग्रेस के डमी कैंडिडेट देने से एक बार फिर बीजेपी और मीम का रास्ता आसान कर दिया। कांग्रेस का रवैया ऐसा रहा तो सीमांचल में नाम लेने वाला कोई नहीं होगा।

17/07/2020
26/03/2020
मिमया का शगूफा।पिछले 1-2 दिनों से ये पोस्ट किया जा रहा है जो बहुत ही घटिया सोच और गिरा हुआ मानसिकता का है जो इस पोस्ट से...
27/02/2020

मिमया का शगूफा।

पिछले 1-2 दिनों से ये पोस्ट किया जा रहा है जो बहुत ही घटिया सोच और गिरा हुआ मानसिकता का है जो इस पोस्ट से झलक रही है जिसने भी इस पोस्ट को लिखा है उसके आंखों में रतौंधी की बीमारी है शकील अहमद खान मुसलमान नहीं नज़र आता है अली इमरान रमज़ आतंकी लगता है, नज़ीब की माँ कहीं नहीं दिखाई देता है। अख्तरुल ईमान साहब खुद बताए कि उसे जन गण मन यात्रा से क्यों बाहर किया गया था। जन गण मन यात्रा को कन्हैया कुमार जरूर लीड कर रहे थे पर इसके पीछे सभी सेक्युलर माइंडेड लोग थे, पार्टीयां थी, कांग्रेस हो, लेफ्ट हो या फिर कोई और। ऐरे गैरे को जब बुलाया नहीं जाता है तो इस तरह की बातें बनाता है हिन्दू और मुसलमान का शगूफा ढूंढता है।

दूसरी बात ये लड़ाई हिन्दू मुस्लिम की नहीं है संविधान और नागरिकता बचाव की लड़ाई है जिन्हें लगता है संविधान और नागरिकता खतरे में है वो साथ हैं और साथ रहेंगे। जिन्हें अपने वोट बैंक की चिन्ता थी हिन्दू मुसलमान की सोच थी उसे यात्रा से भगाया गया। इस तरह के नकारात्मक सोच, प्रचार से कुछ बिगड़ने वाला नहीं है ये लड़ाई हम लड़ें हैं और जीतेंगे।

सीमांचल में जिन्ना और बिन लादेन वाली सोच रखने वाले को नेता तो हरगिज़ नहीं बनाना चाहिए नहीं तो सीमांचल का हाल कश्मीर से बदतर हो जाएगा नेपाल, भूटान जैसे देश भी सहानुभूति में दो शब्द नहीं बोलेंगे। कुछ लोग अपनी स्वार्थ के लिए सीमांचल को नफरत के आग में झोंकने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी कोशिश यही रहेगी कि ऐसे लोगों के नापाक मंसूबे को कामयाब न होने दें। मुसलमान तिरंगा उठाए, लाल झण्डा उठाए पर कभी ISiS का झण्डा न उठाए इसके लिए हम प्रतिबद्ध हैं।

कन्हैया कुमार संघी मानसिकता से हमेशा लड़ा है और आगे भी लड़ता रहेगा। जिन्हें संघ पाल रहा है उससे भी उसी ताकत से लड़ेगा इसलिए संघी गुण्डे कन्हैया को मारना चाहता है। एक महीने में 8 बार जानलेवा हमला, कन्हैया के 12 लोगों को हॉस्पिटल भेजना इस बात की दलील है।

संघ या NDA से लड़ने के नतीजे सामने है इस को साबित करने के लिए कोई चश्मदीद गवाह की जरूरत नहीं है। आज़म खान पर किताब चोरी का केस, कन्हैया पर सेडिशन, जान लेवा हमला, वहीं किशनगंज के रुहीधासा मैदान जहां ओवैसी सभा करे तो जमीन पवित्र और कन्हैया करे तो अपवित्र जिसे संघी गंगा जल से धोए, संघ के दो अनमोल रत्न एक अकबर दूसरा असद। कोई ED, कोई CBI, कोई इंकॉमेटैक्स, हैदराबाद का नाम सुन्नते ही सभी ऐजेंसी काम करना बंद कर देती है। ओवैसी को संघ पाल रहा है ये बात मैं इसलिए कह रहा हूँ जब बाबरी मस्जिद टूटी थी तब सरकार में ओवैसी के वालिद साहब भी थे। वो खामोश इसलिए थे कि ओवैसी मेडिकल कॉलेज का MCI से मान्यता रद्द न हो जाए। मतलब हज़ारों लोगों के खून के बदले खामोशी का सौदा किया और आज भी पठान अकबर जैसे लोग हैं जो कुछ न कुछ बोल कर आग लगा रहे हैं।

आज सीमांचल में युवाओं को जज़्बाती बना कर कश्मीर बनाने की तैयारी चल रही है क्या आप इस बात से इनकार कर सकते हैं? मैं जज़्बात में नहीं बहा हूँ समाज के बारे में अच्छा सोचता हूँ दूरगामी परिणाम के बारे में सोचता हूँ, मुझे लगा कि सीमांचल कट्टरपंथी के ओर बढ़ रहा है तो खामोश नहीं रहा जाता।

CPI अगर किसी सीमांचल के युवाओं को नक्सली बनाएगी तो सबसे पहले मैं विरोध में खड़ा रहूँगा। आज तक का सीपीआई का इतिहास देख लें ये पार्टी मुद्दों पर राजनीति की है हिन्दू मुसलमान पर तो कभी नहीं। इसलिए 1925 से आज तक केरला हो या बंगाल मणिपुर और बहुत राज्यों में जिन्दा है और नेशनल पार्टी है पर 1927 की AIMIM को हैदराबाद से बाहर निकलने के लिए कई दशक लग गए शायद इसी हिन्दू मुसलमान के सोच रखने के कारण।

बाकी मिलते हैं चुनाव के मैदान में वहीं सारी बातें होगी जनता के सामने।

फ़िरोज़ आलम
किशनगंज विधानसभा प्रत्याशी (सीपीआई)

12/02/2020

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