20/11/2020
सीमांचल में AIMIM मजबूत या लोगों की मजबूरी...
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अभी हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में किशनगंज क्षेत्र में AIMIM के 5 विधायकों का चुना जाना ये कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। अगर जीत के कारणों की समीक्षा की जाए तो ये महज़ परिवर्तन संसार का नियम है इस कहावत को चरितार्थ करता है। जबकि पार्टी और समर्थक मुस्लिम कयादत को खड़ा करने का एक मज़बूत आधार मान रहे हैं। अगर हम पांचों विधानसभावार नवनिर्वाचित विधायकों के परिणाम को देखें तो हमें परिवर्तन और आक्रोश में हुए मतदान और उनसे जुड़े सभी तथ्य मिल जाएंगे।
#किशनगंज_विधानसभा की बात करें तो 2019 विधानसभा उपचुनाव में AIMIM की जीत कांग्रेस समर्पित कार्यकर्ताओं एवं मतदाताओं के आक्रोश का प्रतिफल था दूसरी तरफ भाजपा को हराने का संकल्प, लोग एक जुट हो कर AIMIM को वोट दे दिए और कांग्रेस के आलाकमान तक ये मैसेज पहुंचा दिया कि जनता के इच्छा के विरुद्ध पार्टी टिकट देती है तो परिणाम ऐसे ही होंगे लेकिन इस बार AIMIM के तमाम हथकंडे जैसे धनबल, मुस्लिम कयादत, जुल्म, नाइंसाफी, बदहाली, बेरोजगारी तमाम तरह के मुद्दों को दर किनार करते हुए लोग महागठबंधन के नाम पर कांग्रेस को वोट दिए। साथ साथ बीजेपी को हराने का संकल्प तो हमेशा के तरह रहता ही है।
यहाँ ओवैसी और मुस्लिम कयादत को लोग ठुकरा दिया।
#बहादुरगंज_विधानसभा से कांग्रेस के 4 बार रहे विधायक से और उनके कार्यप्रणाली से लोग ऊब गए थे यहाँ परिवर्तन संसार का नियम है बिल्कुल फिट बैठता है। महागठबंधन का आंधी तूफान होने के बावजूद कांग्रेस के हारने की दूसरी सबसे बड़ी वजह यह रही है कि हर छोटे छोटे काम को लेकर विधायक के आगे पीछे करने वाले लोगों का मनोबल इतना बढ़ गया था कि गलत ढंग से उगाही को अपना धन्दा बना लिया था। तमाम तरह के कारणों में यह भी एक वजह रही है कि जब दुनिया कागज़ और कलम से अपनी लड़ाई लड़ रही है तो ऐसे में इस क्षेत्र में अपने प्रतिनिधि को कमज़ोर होना भी लोगों को बदलाव की ओर सोचने पर मजबूर कर दिया। जब परिस्थिति ऐसी बन जाए तो विकल्प के तौर पर जो भी सीरियस राजनीतिक दल सामने होगा लोग उसे वोट करेंगे।
#बहादुरगंज और #अमौर विधानसभा की कहानी लगभग एक जैसी है। anti incumbency और अपने प्रतिनिधियों का कागज़ कलम में कमज़ोर होना, पारंपरिक विकास कार्यों के एलावे नए योजनाओं का न लाना, प्रशासनिक तंत्रों में कमज़ोर पकड़, dynamic leadership की कमी और भ्रष्टाचार से ग्रसित जनता को बेसहारा छोड़ देना, इन्ही सब कारणों से AIMIM को एक बार जनता ने मौका दिया है। अगर इन पहलुओं पर कारगर साबित नहीं होता है तो AIMIM को भी लोग नकार देंगे।
#कोचाधामन विधानसभा की बात करें तो #मास्टर_मुजाहिद_आलम के लगातार जन सम्पर्क, सभी प्रकार के विकास कार्यों को सिर्फ पार्टी के नाम पर नकार दिया। यह भी नहीं सोचा कि नीतीश कुमार के 900 करोड़ से बने कृषि विश्वविद्यालय, AMUK के लिए जमीन के साथ साथ वहां बच्चों के रहने के लिए माइनॉरिटी होस्टल अलॉट करना, SSB और पुलिस लाइन के लिए जमीन अधिग्रहण को रोकना, बहन बेटियों के लिए साईकल, पोशाक,आदि प्रोग्राम चला कर निर्भय होकर बच्ची स्कूल जाने लगी, समाज में जो डर का माहौल था उसे खत्म किया, और यही कोचाधामन था जहां से मुजाहिद आलम ने सत्ता में रह कर CAA NRC NPR के खेलाफ आवाज़ उठाया, बीजेपी के काला कानून के खेलाफ नीतीश कुमार ने विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया इन तमाम एहसानों को भुलाकर, धनबल के दलदल में कोचाधामन धंस गया। सीमांचल की बदनसीबी यह है कि आज कोई भी अनहोनी घटना घटती है या किसी खास काम को लेकर नीतीश कुमार के पास जाने लायक कोई नेता नहीं बचा है।
#ठाकुरगंज विधानसभा में सत्ताधारी दल के नेता का हारना उनके अयोग्य होने का सबसे बड़ा कारण है। साथ साथ निर्दलीय उमीदवार के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, दूसरी तरफ AIMIM पार्टी के राज्य अध्यक्ष का संसदीय चुनाव में देवबंदी जमात का समर्थन पाने के लिए, राजद के प्रत्याशी के साथ राजनीतिक सांठगांठ के कारण AIMIM का कमज़ोर प्रत्याशी देना। तमाम तर कारणों से महागठबंधन की हवा तैयार हुई और ओवैसी फैक्टर नाकाम हो गया।
जिस तस्लीमुद्दीन को सीमांचल का गांधी कहा जाता है उनके के परिवार से लोगों को बहुत उमीदें हैं। #जोकिहाट_विधानसभा में AIMIM का जीतना राजद के अयोग्य कैंडिडेट को टिकट देना सबसे बड़ा कारण था। एक ही परिवार से दो भाई अलग अलग राजनीतिक दलों से चुनाव लड़े तो जनता उन दोनों में बेहतर कौन है उसे वोट देती है इसमें AIMIM का कोई कमाल नहीं है। हाँ नवनिर्वाचित विधायकों पर खुद को ईमानदार साबित करने और पहले के मुकाबले ज्यादा विकास कार्य लाने की जिम्मेवारी बढ़ गई है लोग उमीद भी करते हैं। अगर ये उल्टा साबित हुआ तो इसका परिणाम लोकसभा चुनाव में देखने मिलेगा।