07/01/2023
आज बात करते हैं अपने किशनगंज की ऐतिहासिक पहचान रखने वाले "खगड़ा मेला" की, जो बिहार सहित सम्पूर्ण देश-विदेश में अपने बीते समय में प्रसिद्ध था।
सन 1883 में तत्कालीन खगड़ा नवाब सैय्यद अता हुसैन ने पूर्णिया के अंग्रेज़ अधिकारी ए. वीक्स के सहयोग से खगड़ा मेला की बुनियादी नींव रखी थी।
सोनपुर मेला के बाद एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला, किशनगंज का ऐतिहासिक खगड़ा मेला इन दिनों अपना अस्तित्व बचाने में जुटा है। कोरोना काल में पिछले दो वर्षों से मेले का आयोजन जिला प्रशासन के द्वारा नहीं किया गया था, वहीं इस वर्ष भी मेले का आयोजन नहीं होने से स्थानीय व्यापारी के साथ-साथ लोगों में भी मायूसी छायी हुई है।
सन 1883 में तत्कालीन खगड़ा नवाब सैय्यद अता हुसैन ने पूर्णिया के अंग्रेज़ अधिकारी ए. वीक्स के सहयोग से खगड़ा मेला की बुनियादी नींव रखी थी। तत्कालीन पूर्णिया समाहर्ता ए. वीक्स के नाम से पहली बार इस मेले का नाम ‘वीक्स मेला’ रखा गया था। एक माह तक चलने वाली इस मेले में भारत के अलावे श्रीलंका, नेपाल, बंगलादेश, मलेशिया और अफगानिस्तान से व्यापारी व्यापार करने आते थे। वही 1953 में जमींदारी प्रथा उन्मूलन के बाद मेला चलाने का जिम्मा राजस्व विभाग को मिला। इस मेले हाथी, घोड़ा, ऊंट, पक्षियों की भी खरीद बिक्री के साथ आम ज़रूरियात के समान भी मेले में बिकती थी। खगड़ा मेले के प्रवेश द्वार के नजदीक लगे स्तूप के मुताबिक 1950 ई. में पशुओं की खरीद बिक्री से 80 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ था। वही मेले में आये व्यापारियों को अच्छी आमदनी हो जाती थी।
मेला परिसर में लगातार प्रशासनिक भवन और क्वाटर के निर्माण होने से यह ऐतिहासिक मेला दिन प्रतिदिन सिकुड़ता जा रहा है। वर्ष 2020 के बाद दो वर्षों तक कोरोना काल की वजह से मेले का आयोजन नहीं किया गया। इस वर्ष भी मेले में ग्रहण लगा हुआ है।
जानकार बताते हैं कि वर्ष 2020 में दो भाइयों की बीच बर्चस्व की लड़ाई को लेकर मेले का डाक करोड़ो रूपये पार कर गया था, इस वर्ष लोग मेले का डाक एक करोड़ रुपये में लेने को तैयार में नहीं है। जिस वजह से मेले का आयोजन इस वर्ष अब तक नहीं हो पाया है।