03/06/2026
चमत्कार का कारोबार: भारत में बाबाओं की फौज और अंधविश्वास का उद्योग
मथुरा में एक कथित साधु की गिरफ्तारी की खबर फिर वही पुराना प्रश्न खड़ा करती है—आखिर भारत में ऐसे बाबाओं की फौज खड़ी कैसे हो जाती है?
हर कुछ महीनों में कोई न कोई बाबा, संत, गुरु, आचार्य या धर्मगुरु किसी न किसी आपराधिक मामले में पकड़ा जाता है। कहीं यौन शोषण, कहीं भूमि कब्जा, कहीं आर्थिक धोखाधड़ी, कहीं अवैध साम्राज्य, कहीं ब्लैकमेलिंग। नाम बदलते रहते हैं, चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन कहानी वही रहती है।
समस्या केवल कुछ अपराधियों की नहीं है। समस्या उस सामाजिक मानसिकता की है जो बिना सवाल पूछे किसी भी व्यक्ति को "महात्मा" घोषित कर देती है।
भारत शायद दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहाँ इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर, आईएएस अधिकारी और वैज्ञानिक तक किसी बाबा के चरणों में बैठकर अपनी बुद्धि गिरवी रख देते हैं। आधुनिक शिक्षा प्राप्त लोग भी चमत्कार, भविष्यवाणी, कर्मकांड और अलौकिक शक्तियों के दावों के सामने आलोचनात्मक सोच छोड़ देते हैं।
विडंबना यह है कि जो समाज विज्ञान और तकनीक की मदद से चंद्रमा और मंगल तक पहुँच रहा है, वही समाज किसी साधु के वस्त्र, दाढ़ी और प्रवचन को उसके चरित्र का प्रमाण मान लेता है।
अधिकांश फर्जी बाबाओं की ताकत धर्म नहीं, मनोविज्ञान है।
वे लोगों की कमजोरियों को पहचानते हैं—अकेलापन, भय, बीमारी, नौकरी की चिंता, पारिवारिक संकट, प्रेम में असफलता, मृत्यु का डर। फिर वे इन समस्याओं का आसान समाधान बेचते हैं। जहाँ विज्ञान कठिन उत्तर देता है, वहाँ बाबा आसान उत्तर देता है। जहाँ वास्तविक जीवन संघर्ष मांगता है, वहाँ बाबा चमत्कार का वादा करता है।
धीरे-धीरे आश्रम उद्योग बन जाता है। श्रद्धा पूंजी में बदल जाती है। भक्त ग्राहक बन जाता है। और गुरु एक ब्रांड।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर साधु या धार्मिक व्यक्ति अपराधी है। भारत की आध्यात्मिक परंपरा में असंख्य ईमानदार संत, समाज सुधारक और विचारक हुए हैं। लेकिन किसी व्यक्ति को केवल भगवा वस्त्र, लंबी दाढ़ी या धार्मिक भाषा के आधार पर नैतिक प्रमाणपत्र दे देना खतरनाक है।
लोकतंत्र में किसी नेता से सवाल पूछे जाते हैं। विज्ञान में किसी सिद्धांत की जांच होती है। अदालत में सबूत मांगे जाते हैं। लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति "बाबा" बन जाता है, समाज सवाल पूछना छोड़ देता है।
यहीं से शोषण शुरू होता है।
किसी भी सभ्य समाज की पहचान यह नहीं है कि वहाँ कितने बाबा हैं। उसकी पहचान यह है कि वहाँ लोग कितने प्रश्न पूछते हैं।
भारत को धर्म से नहीं, अंधभक्ति से खतरा है। और जब तक लोग श्रद्धा और समर्पण के नाम पर अपनी विवेकशक्ति किसी दूसरे के चरणों में रखते रहेंगे, तब तक फर्जी बाबाओं की फसल उगती रहेगी।
समस्या बाबा नहीं हैं।
समस्या वह समाज है जो हर बार नया बाबा पैदा कर देता है।