11/04/2026
ध्यान योग यज्ञ अभ्यास के साधना कैसे करें?
ध्यान योग यज्ञ, राजयोग, सहजयोग, पंतजलियोग, सांख्ययोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, अष्टांगयोग आदि-- ये सब वेद के अनुसार ही साधना बताते है। अब पातंजल योग सूत्रों का विस्तार से अन्य ग्रंथों से मिलान करते हुए व्याख्या करते है। इसको चार भागों में बांटा गया है। 1. समाधिपाद 2. साधनापाद 3. विभूतिपाद 4. कैवल्यपाद ।, जैसे भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए उसे तैयार करके उसमे श्रेष्ठ बीज बोते है, उसी प्रकार ध्यानयोगयज्ञ अभ्यास के लिए अपने शरीर को कैसे तैयार करना है, इसके लिए महान ऋषि पंतजली जी सम चित्त वाले उत्तम साधकों के लिए सबसे प्रथम ,”समाधिपाद “ का आरंभ करते है। अर्थात परमात्मा की उपासना अपने शरीर के अंदर कैसे करनी है? इसके लिए योग के ग्रंथ का आरंभ किया जाता है।
समाधिपाद
समाधिपाद सूत्र .1 अथ योगानुशासनम
शब्दार्थ: (अथ )=अब आरंभ करते है। (अनुशासनम)=योग की शिक्षा देने वाले ग्रंथ को।
अर्थात योग की व्याख्या करते है। योग आत्मा और परमात्मा के मिलन को कहते है। जो मिलन समाधि अवस्था में होता है। यह योग की शिक्षा प्राचीन परंपरा से चली आ रही है। श्रुति और स्मृतियों अर्थात वेदों और उपनिषदों मे इस योग का वर्णन किया गया है। जैसे श्वेतातरउपनिषद अ.2/8,” शरीर के तीन अंगों (छाती, गर्दन, और सिर ) को सीधा रखकर इंद्रियों को मन के साथ अंतःकरण में प्रवेश करके, ॐ की नौका पर सवार होकर भय के लाने वाले सारे प्रवाहों से पार उतर जाए,”। अ.2/9,” शरीर की सारी चेसटाओ को वश में करके प्राणों की गति को धीमी करके रोके और प्राण के क्षीण होने पर नासिका से श्वाश ले। सचेत सारथी जैसे घोड़ों की चंचलता रोकता है, उस प्रकार बाहर जाने वाले मन को अंदर रोके। अ.2/10,” ऐसे स्थान पर योग का अभ्यास करें, जो सम है, शुद्ध है, कंकड़, बालू, और अग्नि से रहित है, जो शब्द, जलाशय और लता आदि से मन के अनुकूल है, आँखों को पीड़ा देने वाला नहीं हो, एकांत हो और वायु के झोंकों से रहित हो। अ.2/11,” जब अभ्यास का प्रभाव होने लगता है, तब पहले यह रूप दिखते है—कुहरा, धुआ, सूर्य, वायु, अग्नि, विद्धुत, जुगनू, बिल्लौर और चंद्र आदि—यह सब दीख कर जब शांत हो जाते है, तब ब्रह्म रूपी चेतन परमात्मा का प्रकाश होता है।“ अ.2/12,” जब पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश प्रकट होते है, अर्थात पांचों तत्वों का जय (विजय) हो जाता है, तब फिर योगी के लिए न रोग है, न जरा है, न दुख है, क्योंकि उसने वह शरीर पा लिया है, जो योग की अग्नि से बना है,” अ.2/13,” योग का पहला फल यह कहते है, की शरीर हल्का हो जाता है, आरोग्य रहता है, विषयों की लालसा मिट जाती है, कान्ति बढ़ जाती है, स्वर मधुर हो जाता है, गंध शुद्ध होता है और मल-मूत्र थोड़ा होता है।“ अ.2/14,” इसके पीछे उस आत्मा के शुद्ध स्वरूप का साक्षात होता है, जैसे वह रत्न जो मिट्टी से लिथड़ा हुआ होता हो, जब धोया जाता है तो फिर तेजोमय होकर चमकता है, इस प्रकार साधक आत्मतत्व (आत्मा के असली स्वरूप) को देख कर शोक से पार हुआ करिथार्थ हो जाता है”। अ.2/15,” फिर जब योग युक्त होकर दीपक के तुल्य आत्म तत्व से ब्रह्मतत्व को देखता है, जो अजन्मा, अटल (कूटस्थ) और सब तत्वों से विशुद्ध है, तब उस शुद्ध स्वरूप प्रमात्मतत्व को जान कर सब फाँसों से छूट जाता है,”। सारांश यह है की अपने शरीर के अंदर जाकर, मस्तिसक के आकाश मे बैठ कर अंतःकरण (मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार) की गति को ठहराना है, चुप कराना है, समाधिस्थ होना है, यही परमात्मा की तरफ योग (मिलन) का कदम है, उसकी ओर चलना है। इसी प्रकार कठोउपनिषद: अ.2, वल्ली 3, मंत्र: 10-, 11,” जब पांचों ज्ञान इंद्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती है और बुद्धि भी चेष्टारहित हो जाती है, उसको परमगति (सबसे उच्ची अवस्था) कहते है। उसी को योग मानते है, जो इंद्रियों की निश्चल धारणा है, उस समय वह योगी प्रमाद से रहित होता है, अर्थात शुद्ध परमात्मा के स्वरूप मे अवस्थितः होता है, क्योंकि योग मे इंद्रियों, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार की गति का निरोध (ठहराव) करना होता है,”। इसी प्रकार मंत्र 12,13,” वह आत्मा न वाणी से, न मन से, न आँखों से पाया जा सकता है ,” वह है” ऐसा कहने के सिवा उसे कैसे उपलब्ध करे। ,” वह है” इस रूप से और तत्व रूप से उसको जानना चाहिए। जब ,”वह है”- इस प्रकार अनुभव कर लिया है, तब उसका तत्व स्वरूप सपस्ट हो जाता है,”। सारांश यही है की योग में अपने शरीर के अंदर मस्तिसक के आकाश मे बैठ कर अपने अंतःकरण और प्राणों की गति को ठहराना है, रोकना है। जैसे ही अंतःकरण की गति ठहरती है, आत्मा प्रकाशित हो जाती है।