12/04/2021
#जीवन_परिचय भाग ५
संघ के संस्थापक - डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
भेद उत्पन्न करने की अंग्रेजों की नीति थी।लोगों में आपसी झगड़े लगा देना और खुद उसका लाभ उठाना ऐसी उनकी रीति थी।इसी दुष्ट हेतु को मन मे रखकर अंग्रेज़ों ने सन 1905 में बंगाल प्रान्त के दो भाग करने का निश्चय किया।बंगाल प्रान्त के नेताओं ने इसके विरुद्ध एआम जनता को जागृत किया। सब लोग क्रुद्ध हो गए। सभाएं होने लगी। जुलूस निकलने लगे। घोषणाएं होने लगी , " नही , हम बंगाल के टुकड़े नही होने देंगे।" बंकिम बाबू का वंदे मातरम गीत राष्ट्र गीत बन गया। वनडे मातरम के उच्चारण मात्र से लोगों में नाव चैतन्य उत्पन्न होने लगा ।
वह आंदोलन केवल बंगाल का नही रहा। भारतवर्ष के कोने कोने से " वन्दे मातरम की ध्वनि गूंजने लगी और लोग कहने लगे , " नही , हम बंगाल के टुकड़े नही होने देंगे। यह केवल बंगाल का प्रश्न नही है , सम्पूर्ण देश का प्रश्न हैं। वन्दे मातरम । भारत माता की जय । "
इस प्रकार के विचार सुनकर और घोषणाएं सुनकर , अंग्रेज अधिकारी चिड़ने लगे , वे जुल्म ढाने लगे। जबरदस्ती करने लगे। अन्याय पूर्ण आदेश देने लगे। उन्होंने कहा कि, " जो भी भारत माता की जय कहेगा , उसे कड़ी सजा दी जाएगी।"
परंतु देशभक्ति की लहर अंग्रेजो के रोके रुकी नही।वह सुदूर ग्रामों एवं नगरों में पहुंची। भावनाशील केशव उससे बहुत प्रभावित हुआ।
सन 1907 ईस्वी के अक्टूबर मास की घटना है सर्वत्र लोकमान्य तिलक के भाषण गूंज रहे थे। स्वदेश भक्ति की हवा देशभर में बह रही थी। ऐसे वातावरण में विजयादशमी को अर्थात दशहरे के त्यौहार पर केशव अपने चाचा श्री आबा जी हेडगेवार के पास रामपायली में पहुंचा।
केशव की विशेषता यह थी कि वह जहां भी जाता था अपने समवयस्कों को बहुत प्रभावित करता था ।वह सब अल्पकाल में ही उसके मित्र ही नहीं , अनुयाई बन जाते थे ।रामपायली में भी यही हुआ ।बहुत बड़ी संख्या में उसने वहां मित्र बनाएं। सबसे विचार विनिमय करने के बाद उसने दशहरा मनाने के संबंध में एक विशेष योजना बनाई।
महाराष्ट्र में दशहरे का त्यौहार विशेष ढंग से और बड़े उत्साह से मनाया जाता है उस दिन नए कपड़े पहन कर सब लोग गांव की सीमा के बाहर जाकर "सीमोल्लंघन" करते है । यहां पर शमी पूजन होता है रावण का पुतला जलाया जाता है। शमी और आपटा वृक्ष के पत्तों को उस दिन सोना कहते हैं ।जैसे सचमुच रावण को मारकर लंका से सोना लूट कर लाया हो ।इस ढंग से सब लोग घर घर जाते हैं , बड़ों के पैर छूते हैं और उन्हें सोना देते है और मिठाइयां खाते हैं।
रामपायली में दशहरे के दिन शाम को जब लोग सीमोल्लंघन करने के लिए जाने लगे। तब उनके साथ केशव भी था और उसके मित्र भी थे। नित्य की प्रथा के अनुसार जब शमी पूजन हुआ और लोग रावण के पुतले की ओर बढ़ने लगे तब केशव जोर से गरज उठा - " वंदे मातरम" तब उसके सब मित्र और उनके साथियों ने भी गर्जना की - " वंदे मातरम" एकाएक वहां का वायुमंडल मानो बदल गया सब लोग अपने अंतःकरण में नवचेतना का अनुभव करने लगे। सामने छोटा सा टीला था। केशव उस पर जाकर खड़ा हुआ और सब को संबोधित कर उसने कहा -
आज हमें अनेक प्रकार की सीमाओं ने कसकर बांध रखा है ।उन्हें पार करना हमारा कर्तव्य है ।हमें आज पारतंत्र्य , कायरता , अज्ञान और निपट स्वार्थ ने घेर रखा है ।इस घेरे को हमें तोड़ना होगा ।रावण प्रतिनिधित्व करता है अन्याय का, जुल्म जबरदस्ती का, क्रूर साम्राज्यवाद का और कुटिल राज्यकर्ताओं का। उसे हमें जलाना होगा ।यह पवित्र देश कार्य है , देव कार्य है। बोलिए "वंदे मातरम ! भारत माता की जय!"
सब लोगों में आवेश आ गया बालक और किशोर तेजी से आगे बढ़े रावण को तोड़ा , फोड़ा तथा जलाया गया । प्रभु रामचंद्र और भारत माता की जय जय कार करते हुए सब लोग अपने अपने घर लौटे । इस प्रकार इस वर्ष रामपायली की जनता को केवल पेड़ के पत्तों का नहीं नव विचारों का "सुवर्ण" प्राप्त हुआ। उस वर्ष रामपायली की जनता ने पुरानी सीमाएं लांग कर वास्तव में टीम उल्लंघन किया।