31/05/2026
ईद-उल-अज़हा के तीनों दिन ऐसी मसरूफ़ियत में गुज़रे कि वक़्त कब सुबह से शाम और शाम से रात में बदल गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ। रिश्तेदारों, दोस्तों, अहबाब और चाहने वालों से मुलाक़ातों का सिलसिला लगातार जारी रहा। हर मुलाक़ात अपने साथ मोहब्बत, अपनापन और ख़ुलूस की ऐसी ख़ुशबू लेकर आई जिसने ईद की खुशियों को और भी ख़ूबसूरत बना दिया। जब इन तमाम ज़िम्मेदारियों और मुलाक़ातों से फ़ारिग़ होकर मैंने व्हाट्सऐप, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर के इनबॉक्स खोले, तो दिल बेज़ुबान होकर भी बहुत कुछ कहने लगा। हर तरफ़ ईद की मुबारकबाद, दुआओं और मोहब्बत से भरे पैग़ाम मौजूद थे। यह देखकर एहसास हुआ कि इंसान की असली दौलत न माल होता है, न शोहरत, बल्कि लोगों के दिलों में बसी मोहब्बत होती है। मैं अपने तमाम दोस्तों, मुहसिनों और चाहने वालों का तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ, जिन्होंने इस मुबारक मौके पर मुझे अपनी दुआओं और मोहब्बतों में याद रखा। यक़ीनन यह मेरे लिए किसी बड़े ख़ज़ाने से कम नहीं। दुआ है कि अल्लाह तआला मुझे मीडिया के ज़रिए मुल्क और क़ौम की ख़िदमत करने का हौसला, जज़्बा और सच्चाई के साथ काम करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। पटना की उस शाम में जब बचपन, स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दोस्तों से मुलाक़ात हुई, तो लगा जैसे वक़्त 35 साल पीछे लौट गया हो। पुरानी यादों के पन्ने खुलने लगे। कभी हँसी के ठहाके गूँजे, कभी शरारतों के किस्से ज़िंदा हुए, तो कभी संघर्षों और सपनों की बातें दिल को छू गईं। उस महफ़िल में एहसानुद्दीन मेहनत, सब्र और ख़ामोशी से आगे बढ़ने वाली शख़्सियत हैं। मुंबई की नौकरी से लेकर गल्फ़ के तजुर्बे और आज अपने आबाई वतन में अस्पताल और फ़ार्मेसी का काम—वाक़ई क़ाबिल-ए-तारीफ़ सफ़र। वहीं मुनाज़िर अशरफ़ उर्फ़ ताबिश मलिक की ज़िंदगी भी हौसले और जद्दोजहद की एक शानदार मिसाल है। मल्टीनेशनल कंपनी से लेकर विदेश और फिर पटना में अपने कारोबार को कामयाबी की बुलंदियों तक पहुँचाना उनकी मेहनत और क़ाबिलियत का सबूत है। लेकिन उस शाम की सबसे बड़ी खूबसूरती सिर्फ़ कामयाबियों की बातें नहीं थीं, बल्कि वह ख़ालिस दोस्ती थी जो आज भी उतनी ही मज़बूत, उतनी ही सच्ची और उतनी ही पाक है जितनी बरसों पहले थी। क्योंकि दोस्त सिर्फ़ लोग नहीं होते, दोस्त ज़िंदगी का सुकून होते हैं, दिल का सहारा होते हैं और यादों का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा होते हैं। ईद का असली पैग़ाम भी यही है—मोहब्बत, क़ुर्बानी, भाईचारा और रिश्तों की क़द्र। साल दर साल हम सब एक साथ ईद और बक़रीद की खुशियाँ मनाते आए हैं। क्या ख़ूबसूरत रिश्ता है यह, जिसमें न दूरी मायने रखती है, न वक़्त। बस दिलों में मोहब्बत और आँखों में एक-दूसरे के लिए ख़ुलूस होना चाहिए।
न दौलत की ख़ुशी थी, न शोहरत का नशा था,
दोस्तों के साथ गुज़रा जो वक़्त, वही सबसे बड़ा तोहफ़ा था।