ओसियां की दिव्या

ओसियां की दिव्या ओसियां की दिव्या
राजस्थान की लोकप्रिय, जनता से जुड़ी विधायिका
जनता की आवाज
राजस्थान की आन-बान शान

24/01/2026

अब तो विपक्षी भी तारीफ़ कर रहे है...😱😱

सच में हमनें सिर्फ़ एक सच्चा विधायक नहीं "हीरा" खोया है।

जयपुर में जाट महिला शक्ति संगम कार्यक्रम में ओसियां से पूर्व कांग्रेस विधायक दिव्या मदेरणा की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे ने जमकर तारीफ की।

दिव्या मदेरणा के बहाने आई लक्ष्मी कुमारी चूंड़ावत की यादकभी-कभी राजनीति के शोर में एक वाक्य या एक लेख ऐसा उतरता है जैसे ...
25/12/2025

दिव्या मदेरणा के बहाने आई लक्ष्मी कुमारी चूंड़ावत की याद

कभी-कभी राजनीति के शोर में एक वाक्य या एक लेख ऐसा उतरता है जैसे किसी सूखे टीले पर अचानक कोई पगला बादल तरसाकर बरस पड़े। ऐसे कि टीला गीली मिट्टी का पिंड बन जाए।

इस कालखंड के अप्रतिम साहित्यकार विनोदकुमार शुक्ल पर युवा नेता दिव्या मदेरणा का आज का लेख और उससे पहले पोस्ट किया गया उनका वीडियो, इसी तरह ध्यान खींचते हैं। कारण सरल है, आज की राजनीति में साहित्य की चिंता करने वाले चेहरे दुर्लभ हैं। आज अज्ञान भरी बातें करना ज्ञान माना जाता है और मूर्खता सार्वजिनक आभूषण हो गया है।

सत्ता-रणनीति, जोड़-तोड़ और तात्कालिक लाभ के इस दौर में कोई सार्वजनिक जीवन का व्यक्ति भाषा, कल्पना और संवेदना की बात करे तो वह केवल “साहित्य-प्रेम” नहीं, लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है।
और यही बात मुझे दिव्या के बहाने लक्ष्मी कुमारी चूंडावत की तरफ ले गई।

एक ऐसी नेता, जिन्हें याद करना अपने आप में राजनीतिक संस्कृति की परीक्षा है। रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत केवल अनुभवी राजनेता नहीं थीं; वे विदुषी, लेखिका और लोक-स्मृति की संरक्षक थीं।

वे भीम विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहीं (1962–1972), राजस्थान से राज्यसभा सदस्य रहीं (1972–1978) और कुछ समय के लिए राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी रहीं (1971–1972)।

पद्मश्री (1984) और राजस्थान रत्न (2012) जैसे सम्मान उनके लिए बहुत छोटी बात हैं।

हैरानी है कि आजकल हमारे समाज जातिगत तौर पर गुंडों, असामाजिक तत्वों और समाज कंटकों को तो नायकों की तरह प्रस्तुत करते हैं; लेकिन उन्हें कला, इतिहास, संस्कृति, शिक्षा, पुरातत्त्व, व्याकरण आदि में काम करने वाले लोगों की तरफ देखने-झांकने और याद करने की फुरसत नहीं होती।

आज का दु:ख यह नहीं कि ऐसी नेता इतिहास में थीं और आज नहीं है। दु:ख यह है कि हमारे राजनीतिक समाज में और ख़ासकर पार्टियों के भीतर ऐसी दुर्लभ प्रतिभाओं को याद रखने की नैतिक क्षमता कम होती गई है।

हम अच्छे लोगों की पहचान करने में बार-बार चूकते हैं; और जब पहचानते भी हैं, तब तक देर हो चुकी होती है।

लक्ष्मी कुमारी चूंडावत का जीवन इसी संक्रमण का दस्तावेज़ है “पर्दा प्रथा से जनता तक” की यात्रा।

उनके बारे में यह अक्सर उल्लेखित रहा है कि बिना किसी स्कूली शिक्षा के वे आज की इंग्लिश स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी शिक्षित युवतियों से अधिक मॉडर्न थीं। वे संस्कृति के नाम पर पर्दाप्रथा जैसी कितनी ही संकीर्णताओं के दायरे में कभी नहीं आईं और उन्होंने संस्कृति को एक मानवीय गरिमा के हिसाब से गर्वीली तरह जिया। हैरानी है कि कांग्रेस की सरकारों के समय उनके नाम पर किसी तरह की कोई स्थायी स्मृति नहीं गढ़ी गई।

लक्ष्मीकुमारी के विद्रोह में भी एक गरिमा थी और उनकी गरिमा में भी एक विद्रोह रहता था। सच कहा जाए तो वे विनोदकुमार शुक्ल का स्त्री रूप ही थीं।

यह कोई निजी शैली का निर्णय नहीं था; यह उस दौर की स्त्री के लिए सामाजिक सत्ता से टकराने का निर्णय था। और उनका प्रसिद्ध प्रत्युत्तर घूंघट को लेकर आज भी हमारे समाज के पुरुषों को आईना दिखाता है: “आप भी घूंघट पहन लो, फिर मैं भी पहन लूंगी।”

इस एक वाक्य में बराबरी की मांग भी है और पितृसत्ता पर करारी चोट भी।

दिव्या मदेरणा का संदर्भ यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण है कि वे भी अपने तरीके से इसी तरह के “असुविधाजनक” गुणों के साथ राजनीति में दिखती रही हैं। बोलने की दृढ़ता, मुद्दों पर टिकने की जिद और क्षेत्र की समस्याओं को विधानसभा-सार्वजनिक मंचों पर उठाने का आत्मविश्वास।

लेकिन राजनीति अक्सर योग्यता का उत्सव नहीं मनाती; वह समीकरणों की कै़द भी है। कई बार पार्टी के भीतर ही संकीर्णताएँ, गुटबाजी और स्थानीय स्वार्थ किसी उभरते नेतृत्व को चोट पहुँचाते हैं। यह कहानी नई नहीं, कहीं न कहीं लक्ष्मी कुमारी चूंडावत के जीवन में भी इसकी छाया रही होगी; और यही निरंतरता आज के लोकतांत्रिक दु:ख को और स्पष्ट कर देती है।

हम जब ओसियां को देखते हैं तो देखते हैं कि वहाँ लोग एक युवा बेटी पर एक पुरुष को महत्त्व देते हैं। कांग्रेस के लोग भी उन्हें पीछे करने में पीछे नहीं रहते। और आम मतदाता भी किसे चुनता है?

यह भी याद रखने की बात है कि साहित्य-प्रेमी नेता केवल “संस्कृति” का सौंदर्य-प्रसाधन नहीं होते। वे राजनीतिक भाषा को मानवीय बनाते हैं। वे सत्ता के वाक्यों में संवेदना का ताप जोड़ते हैं। वे बतलाते हैं कि जनता केवल संख्या नहीं, एक जीवित अनुभव है; और विकास केवल आँकड़ा नहीं; जीवन-गुणवत्ता का प्रश्न है। इसी अर्थ में, किसी दल में एक साहित्य-सचेतन नेता का उभरना राजनीति के लिए बेहतर बात है।

कभी कांग्रेस में श्रीकांत वर्मा जैसे लोग थे। राजनीति के भीतर कविता, और कविता के भीतर राजनीति की समझ। वे राजनीति में सक्रिय नहीं होते तो आज हिन्दी साहित्य के पास "मगध" नहीं होता।

आज यदि दिव्या मदेरणा जैसे लोग किसी लेखक पर लिखते हैं, किसी साहित्यकार को सार्वजनिक स्मृति में रखते हैं, तो यह केवल श्रद्धांजलि नहीं, राजनीतिक समाज की भाषा को थोड़ा कम क्रूर, थोड़ा अधिक सभ्य बनाने की कोशिश है।

लक्ष्मी कुमारी चूंडावत को याद करना एक विनम्र आग्रह भी है। हम अपने समय के “औसत” को इतना सामान्य मान चुके हैं कि “असाधारण” हमें अनावश्यक लगता है। लोकतंत्र इसी आदत से कमजोर होता है। अच्छे लोगों की पहचान करना और उन्हें बचाए रखना केवल मतदाता का काम नहीं, पार्टियों का भी धर्म है।

-Tribhuwan ji

"दिसंबर की ठंडी रात, खाली सड़कें और दिव्या मदेरणा की आवाज़।"प्रिय दिव्या मदेरणा,  रात के ठीक बारह बज रहे हैं। मैंने आपका...
24/12/2025

"दिसंबर की ठंडी रात, खाली सड़कें और दिव्या मदेरणा की आवाज़।"

प्रिय दिव्या मदेरणा,

रात के ठीक बारह बज रहे हैं। मैंने आपका कहीं कोई भाषण नहीं ,बस एक छोटा-सा वीडियो देखा, और फिर देर तक आपके बारे में सोचता रहा।
आपसे कभी मिला नहीं, ना आपको निजी तौर पर जानता हूँ।फिर भी आपकी आवाज़ सुनकर ऐसा लगा जैसे ईश्वर ने गले में जो स्वर दिया है, वह यूँ ही नहीं दिया गया, वह किसी वक्ता को ही दिया जा सकता था। ऐसी आवाज़ जो बोलने के साथ ठहर भी जाती है।

बाहर रात खामोश है। सड़कों पर दिसंबर बिताने वालों के लिए यह महीना पूरे एक साल जितना लंबा होता है। ठंडी ज़मीन, खुले आसमान के नीचे सिमटी ज़िंदगियाँ,और एक देश जो रात में और ज़्यादा नंगा दिखाई देता है। शायद इसी सन्नाटे में आपकी आवाज़ और साफ़ सुनाई देती है।

2018 में जब आप ओसियां से पहली बार विधायक बनीं, तो लगा कि राजनीति के राजस्थान में कुछ नया हो रहा, क्योंकि उस इलाके की आवाज़ जो अब तक काग़ज़ों में ज़्यादा और ज़मीन पर कम मौजूद था। उसे आपने अपने विधानसभा ओसियां में पीड़ा की तरह रखा।

आप उन नेताओं में नहीं रहीं जो फाइल देखकर विकास तय करते हैं। आप अधिकारियों से भिड़ीं, क्योंकि कई बार विकास के लिए नरमी से ज़्यादा, ईमानदार टकराव चाहिए होता है।और उसी टकराव से सैटेलाइट अस्पताल खड़े हुए ,खेल मैदान बने, पानी की टंकियाँ आईं, जो उस समय की ज़रूरतें थीं।
राजनीति में समुदाय अक्सर गिनती बन जाते हैं। लेकिन आपने जाट समाज के साथ गिनती नहीं, संवाद बनाया।कांग्रेस और जाट समाज के बीच जो दूरी थी, उसे आपने धीरे-धीरे भरोसे में बदला। वो भरोसा, जो नियत से बनता है।

आपका काम सिर्फ़ ओसियां ने नहीं देखा। पुणे में भारतीय छात्र संसद ने आपको आदर्श युवा विधायक कहा, यह उस पीढ़ी की तरफ़ से एक स्वीकारोक्ति थी जो राजनीति में शोर से थक चुकी है।

2019 में फोकस इंडिया का महिला राजनीतिक नेतृत्व पुरस्कार और हाल ही में हेसेन इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी की मानद डॉक्टरेट, ये सम्मान आपकी निरंतरता के गवाह हैं।

भारत जोड़ो यात्रा में आपको देखकर यह कभी नहीं लगा कि आप किसी औपचारिक कतार में चल रही हैं। आप वहाँ थीं, जहाँ राजनीति फिर से पैदल हो गई थी। जहाँ नेता, इंसान बनकर चल रहे थे। आप युवाओं और महिलाओं के बीच संभावना की तरह मौजूद थीं।

आपको सुनते हुए कभी यह महसूस नहीं होता कि आप किसी को डराकर जीतना चाहती हैं। आप सवाल करती हैं,लेकिन अपमान नहीं करतीं। आप असहमति रखती हैं,लेकिन संवेदना नहीं छोड़तीं। आज की राजनीति में यह एक दुर्लभ गुण है।

मुझे नहीं पता आपका राजनीतिक भविष्य किस पद तक जाएगा। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि अगर इस देश में और ज़्यादा नेता आपकी तरह बोलने लगें, तो शायद राजनीति थोड़ी कम क्रूर हो जाए।

यह ख़त किसी समर्थक का नहीं है। यह उस आदमी का ख़त है, जो आधी रात एक अनजान नेता की आवाज़ सुनकर यह सोचने लगा कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।

आप यूँ ही बोलती रहें, धीरे,साफ़,और इंसान की तरह। क्योंकि कभी-कभी एक सही आवाज़ पूरी रात को थोड़ा कम ठंडा बना देती है।

- एक भारतीय नागरिक

18/12/2025
दिव्या जी की दमदार दहाड़!  रैली में सिर्फ इसी बात की चर्चा थी। चैनल को सबस्क्राइब जरूर कर लें।
15/12/2025

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शहादत का सम्मान वही करता है जो शहादत समझता है
13/12/2025

शहादत का सम्मान वही करता है जो शहादत समझता है

08/11/2025

प्रदेश में बीजेपी की सरकार हैं लेकिन राजस्थान में जातीय ज़हर फैलाने वाली बीजेपी की बी टीम अपने प्रत्येक मंच पर कांग्रेस पर सवाल खड़ा कर रही हैं।

बीजेपी को सत्ता में आए हुए को करीबन ढाई साल होने को हैं लेकिन बीजेपी के शासन पर प्रश्नचिह्न लगाने से ये बचते हुए दिखाई देते हैं।

आज बड़ी तहज़ीब से वसुंधरा राजे जी, भजनलाल जी.. सबके पीछे जी लगाकर बुलाया जा रहा था खैर राजनीति में ऐसी सुचिता होनी भी चाहिए, व्यक्तिगत ना होकर विचारधारा आधारित होनी चाहिए।

लेकिन जैसे ही इस बी टीम को कांग्रेस नेताओं का नाम लेना होता हैं तो....गोविन्द डोटासरा तू.... तेरा.... तू हैं क्या... इसकी क्या औकाद है.. कांग्रेस में भी विशेषकर इन्हें किसान वर्ग से जुड़े नेताओं से नफरत हैं इतनी निम्नस्तर की शब्दावली....

अगर इन नेताओं का इतिहास खंगाला जाए तो इनकी शुरुआत बड़ी जातियों में आपस में फूट डालने से लेकर हुई हैं नागौर वाले नेता ने राजपूत समाज पर खूब अभद्र टिप्पणियां की जितना इसका मन भरता था उतनी अभद्र टिप्पणियां...
नतीजन समाज के युवाओं का ब्रेनवाश किया...
ख्याली पुलाव दिखाए गए और जब इन्हें लगा एक अभद्र टिप्पणियों की ब्लॉक चैन बन गई हैं तो इन्होंने अपनी स्ट्रेटजी के अनुसार अपने ही समाज के नेताओं को कमजोर करने का काम शुरू कर दिया जो इनका वास्तविक टारगेट था। चूंकि कांग्रेस में किसान वर्ग का दबदबा हैं तो जाहिर सी बात हैं बीजेपी के इन लोगों का कांग्रेस के वोट बैंक को कमजोर करना मुख्य उद्देश्य है।

इस राजेंद्र गुढ़ा की हिस्ट्री भी आप देख सकते हो इसके प्रत्येक पुराने भाषण में जाट एसडीएम, सीआई, अन्य कर्मचारियों पर रौब जमाने की गाथाएं भरी पड़ी हैं लेकिन जैसे ही बीजेपी के टारगेट के नजदीक आए तो देखिए कैसे धुरविरोधी अपने ही समाज के नेताओं को गालियां निकालकर एक साथ बैठकर तालियां पीठ रहे हैं।

राजस्थान में राजपूत समाज की बेटी वर्तमान उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी के खिलाफ इन दिनों ये क्या क्या नहीं बोल रहे हैं।

पढ़ने लायक पोस्ट: 2013 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले की बात है। ETV Rajasthan पर मैंने दिव्या मदेरणा की एक बाइट सुन...
05/11/2025

पढ़ने लायक पोस्ट:

2013 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले की बात है। ETV Rajasthan पर मैंने दिव्या मदेरणा की एक बाइट सुनी थी। उस दिन दिव्या मदेरणा जेल में बंद अपने पिता महिपाल मदेरणा से मिलकर आई थीं। पत्रकार के पूछने पर दिव्या मदेरणा ने बताया कि उनके पिता ने उन्हें बेनजीर भुट्टो की बायोग्राफी दी है और कहा है कि बेनजीर की तरह लड़ना और कभी अपनी जमीन मत छोड़ना।

मैं तब स्कूल में पढ़ता था और सियासत की कोई बहुत ज्यादा समझ नहीं थी। लेकिन 2018 के साल में मैंने बेनजीर भुट्टो की बायोग्राफी पढ़ी। वहीं किताब जो महिपाल मदेरणा ने दिव्या मदेरणा को जेल में दी थी। "बेनजीर भुट्टो : डॉटर ऑफ डेस्टिनी"

बेनजीर की बायोग्राफी पढ़ने के बाद मेरे दिमाग में सबसे पहले दिव्या मदेरणा की एक तस्वीर खिंच आई। मुझे 2013 में ETV Rajasthan पर दिया गया उनका वह इंटरव्यू याद आया और मेरा कौतूहल दिव्या मदेरणा को लेकर अधिक बढ़ गया।

शायद ईश्वर ने मुझे एक अच्छी याददाश्त उपहार में दी है और मैं ध्यान से जो पढ़ता या सुनता हूँ वह मुझे लंबे वक्त तक ज्यों का त्यों याद रहता है। पांच बरस बाद भी मुझे दिव्या मदेरणा का वह बोल्ड स्टेटमेंट एकदम ठीक से याद था और फिर मैंने दो सियासी महिलाओं के बारे में खोजबीन शुरू कर दी। मैंने बेनजीर को फिर विस्तार से पढ़ा और दिव्या मदेरणा की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखने लगा।

बेनजीर भुट्टो अक्सर इंदिरा गांधी और अपने पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को अपना आदर्श मानती थीं। फिर दिव्या मदेरणा ने भी एक बार ऐसा ही ऐलान किया और कहा कि वे भी इंदिरा गांधी और अपने पिता को खुद का आदर्श मानती हैं। चूंकि वे हिंदुस्तान की सरजमीं पर सियासत कर रही हैं इसलिए शायद यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई कि दिव्या मदेरणा बेनजीर भुट्टो को भी अपना आदर्श मानती हैं। लेकिन मेरा भरोसा पक्का है कि बेनजीर की बायोग्राफी ने दिव्या मदेरणा को सबसे अधिक प्रभावित किया होगा।

बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान के दकियानूसी समाज में पैदा हुई एक ऐसी जुझारू महिला रहीं जिन्होंने मर्दों की सत्ता से टकराने की हमेशा जुर्रत की और करती रहीं। बीते कार्यकाल में टकराने का बेखौफ अंदाज पूरे राजस्थान ने दिव्या मदेरणा के भीतर भी देखा।

फिर दूसरी समानता यह भी कि बेनजीर और दिव्या दोनों सियासी खानदान में पैदा हुई। लेकिन दोनों ने तब अपने खानदान की बागडोर संभाली जब ये दोनों खानदान ही सियासी तौर पर खत्म हो चुके थे। बेनजीर ने हर जुल्म को सहा और इतना सहा कि उन्होंने अपने बच्चे बिलावल को भी जेल में ही जन्म दिया। लेकिन फिर जो इतिहास बेनजीर ने पाकिस्तान की सियासत में लिखा वह इतिहास आज तक पाकिस्तान के दकियानूसी समाज में एक भी महिला नहीं लिख पाई है।

हां ये सच है कि महिपाल मदेरणा अदालत से सजायप्त व्यक्ति थे। लेकिन एक बेटी के दृष्टिकोण से देखें तो दिव्या मदेरणा के लिए उन हालातों का संघर्ष आसान तो बिल्कुल भी नहीं रहा होगा। लेकिन दिव्या मदेरणा ने ठीक बेनजीर की तरह अपने घर की उस महफिल में रौनक लौटा दी जहां सबकुछ तबाह हो चुका था।

PC: Lokendra Singh Kilanaut

अख़बारों की सुर्खियां! दिव्या जी मदेरणा का जन्मदिवस विशेष।
01/11/2025

अख़बारों की सुर्खियां!

दिव्या जी मदेरणा का जन्मदिवस विशेष।

जन्मदिन की हार्दिक बधाई दिव्या जी।
25/10/2025

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सुश्री दिव्या मदेरणा जी को हेसेन अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (जर्मनी) द्वारा विधि के क्षेत्र में डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी की म...
25/10/2024

सुश्री दिव्या मदेरणा जी को हेसेन अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (जर्मनी) द्वारा विधि के क्षेत्र में डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया, यह एक ऐतिहासिक और गौरवशाली पल है । यह उनकी असाधारण प्रतिभा और विधि के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान का प्रमाण है।

इस मानद उपाधि के साथ, दिव्या मदेरणा जी ने न केवल अपने परिवार और संगठन को बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया है। उनकी इस उपलब्धि से युवाओं को प्रेरणा मिलेगी और वे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित होंगे।

आशा है कि दिव्या मदेरणा जी आगे भी विधि के क्षेत्र में नवाचार और जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रयासों को जारी रखेंगी। उनकी यह उपलब्धि एक मिसाल है कि कैसे मेहनत, समर्पण और जुनून से सफलता प्राप्त की जा सकती है।

हम दिव्या मदेरणा जी को उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए हृदय से बधाई देते हैं और उनके भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामनाएं देते हैं।

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ओसियां
Jodhpur
342303

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