24/12/2025
"दिसंबर की ठंडी रात, खाली सड़कें और दिव्या मदेरणा की आवाज़।"
प्रिय दिव्या मदेरणा,
रात के ठीक बारह बज रहे हैं। मैंने आपका कहीं कोई भाषण नहीं ,बस एक छोटा-सा वीडियो देखा, और फिर देर तक आपके बारे में सोचता रहा।
आपसे कभी मिला नहीं, ना आपको निजी तौर पर जानता हूँ।फिर भी आपकी आवाज़ सुनकर ऐसा लगा जैसे ईश्वर ने गले में जो स्वर दिया है, वह यूँ ही नहीं दिया गया, वह किसी वक्ता को ही दिया जा सकता था। ऐसी आवाज़ जो बोलने के साथ ठहर भी जाती है।
बाहर रात खामोश है। सड़कों पर दिसंबर बिताने वालों के लिए यह महीना पूरे एक साल जितना लंबा होता है। ठंडी ज़मीन, खुले आसमान के नीचे सिमटी ज़िंदगियाँ,और एक देश जो रात में और ज़्यादा नंगा दिखाई देता है। शायद इसी सन्नाटे में आपकी आवाज़ और साफ़ सुनाई देती है।
2018 में जब आप ओसियां से पहली बार विधायक बनीं, तो लगा कि राजनीति के राजस्थान में कुछ नया हो रहा, क्योंकि उस इलाके की आवाज़ जो अब तक काग़ज़ों में ज़्यादा और ज़मीन पर कम मौजूद था। उसे आपने अपने विधानसभा ओसियां में पीड़ा की तरह रखा।
आप उन नेताओं में नहीं रहीं जो फाइल देखकर विकास तय करते हैं। आप अधिकारियों से भिड़ीं, क्योंकि कई बार विकास के लिए नरमी से ज़्यादा, ईमानदार टकराव चाहिए होता है।और उसी टकराव से सैटेलाइट अस्पताल खड़े हुए ,खेल मैदान बने, पानी की टंकियाँ आईं, जो उस समय की ज़रूरतें थीं।
राजनीति में समुदाय अक्सर गिनती बन जाते हैं। लेकिन आपने जाट समाज के साथ गिनती नहीं, संवाद बनाया।कांग्रेस और जाट समाज के बीच जो दूरी थी, उसे आपने धीरे-धीरे भरोसे में बदला। वो भरोसा, जो नियत से बनता है।
आपका काम सिर्फ़ ओसियां ने नहीं देखा। पुणे में भारतीय छात्र संसद ने आपको आदर्श युवा विधायक कहा, यह उस पीढ़ी की तरफ़ से एक स्वीकारोक्ति थी जो राजनीति में शोर से थक चुकी है।
2019 में फोकस इंडिया का महिला राजनीतिक नेतृत्व पुरस्कार और हाल ही में हेसेन इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी की मानद डॉक्टरेट, ये सम्मान आपकी निरंतरता के गवाह हैं।
भारत जोड़ो यात्रा में आपको देखकर यह कभी नहीं लगा कि आप किसी औपचारिक कतार में चल रही हैं। आप वहाँ थीं, जहाँ राजनीति फिर से पैदल हो गई थी। जहाँ नेता, इंसान बनकर चल रहे थे। आप युवाओं और महिलाओं के बीच संभावना की तरह मौजूद थीं।
आपको सुनते हुए कभी यह महसूस नहीं होता कि आप किसी को डराकर जीतना चाहती हैं। आप सवाल करती हैं,लेकिन अपमान नहीं करतीं। आप असहमति रखती हैं,लेकिन संवेदना नहीं छोड़तीं। आज की राजनीति में यह एक दुर्लभ गुण है।
मुझे नहीं पता आपका राजनीतिक भविष्य किस पद तक जाएगा। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि अगर इस देश में और ज़्यादा नेता आपकी तरह बोलने लगें, तो शायद राजनीति थोड़ी कम क्रूर हो जाए।
यह ख़त किसी समर्थक का नहीं है। यह उस आदमी का ख़त है, जो आधी रात एक अनजान नेता की आवाज़ सुनकर यह सोचने लगा कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।
आप यूँ ही बोलती रहें, धीरे,साफ़,और इंसान की तरह। क्योंकि कभी-कभी एक सही आवाज़ पूरी रात को थोड़ा कम ठंडा बना देती है।
- एक भारतीय नागरिक